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Archive for November, 2008

>mumbai

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मुंबई में जो हुआ उसके बाद बस यही ख्याल आया की

क्या कहें और कहने को क्या रह गया ….

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मित्र आलोक श्रीवास्तव की एक और कविता…

तुम्हारे पास आकाश था

मेरे पास एक टेकरी

तुम्हारे पास उड़ान थी

मेरे पास

सुनसान में हिलती पत्तियां

तुम जन्मी थीं हँसी के लिए

इस कठोर धरती पर

तुमने रोपीं

कोमल फूलों की बेलें

मैं देखता था

और सोचता था

बहुत पुराने दरख्तों की

एक दुनिया थी charon or

थके परिंदों वाली

शाम थी मेरे पास

कुछ धुनें थीं

मैं चाहता था की तुम उन्हें सुनो

मैं चाहता था की एक पूरी शाम तुम

थके परिंदों का

पेड़ पर लौटना देखो

मैं तुम्हें दिखाना चाहता था

अपने शहर की नदी में

धुंधलती रात दुखों से भरी एक दुनिया

मैं भूल गया था

तुम्हारी भी एक दुनिया है

जिसमे कई और नदियाँ हैं

कई और दरखत

कुछ दूसरे ही रंग

कुछ दूसरे ही स्वर

शायद कुछ दूसरे ही

दुःख भी।

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>जेवर

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ना ना मत मांगो

ये कोई जेवर नहीं

मेरा गम है ये

मेरी तन्हाई है

तुम्हारे बाज़ार में कोई

कीमत नहीं इसकी

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>हँसी

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धुप में बारिश होते देख के

हैरत करने वाले!

शायद तुने मेरी हँसी को

छूकर

कभी नहीं देखा

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>उड़ान

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जो देखनी हो मेरी उड़ान
आसमान से कहो थोड़ा और ऊंचा हो जाए…

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हरे लान में

सुर्ख फूलों की छांव में बैठी हुई

मई तुझे सोचती हूँ

मेरी उंगलियाँ

सब्ज पत्तों को छूती हुई

तेरे हमराह गुजरे हुए मौसमों की महक चुन रही हैं

वो दिलकश महक

जो मेरे होठों पे आके हलकी gulabi हँसी बन गई है

दूर अपने ख्यालों में गम

शाख दर शाख

एक तीतरी खुशनुमा पर समेटे हुए उड़ रही है

मुझे ऐसा महसूस होने लगा है

जैसे मुझको पर मिल गए हों।

परवीन शाकिर भी क्या खूब लिखती है….

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वे दोनों मानते हैं

की अचानक एक ज्वार उठा

और उन्हें हमेशा के लिए एक कर गया

कितना खूबसूरत है शंशय हीन विश्वास

पर शंशय इससे भी खूबसूरत है

अब चूँकि वे पहले कभी नहीं मिले

इसलिए उन्हें विश्वास है

की उनके बीच कभी कुछ नहीं था इससे पहले

तो फ़िर वह शब्द क्या था

जो गलियों, गलियारों या सीढियों पर

फुसफुसाया गया था?

क्या पता वे कितनी बार एक दूसरे के

एक-दूसरे के kareeb से गुजरे हों

mai उनसे पूछना चाहती हूँ

क्या उन्हें याद नहीं

रिवाल्विंग दरवाजे में घुसते हुए सामने पड़ा एक चेहरा

या भीड़ में कोई sorry कहते हुए आगे बढ़ गया था

या शायद किसी ने रौंग नम्बर कहकर फोन रख दिया था

लेकिन mai जानती हूँ उनका जवाब

नहीं उन्हें कुछ भी याद नहीं

उन्हें ये जानकर ताज्जुब होगा

की अरसे से संयोग उनसे आन्ख्मिचोनीखेल रहा था

पर अभी वक़्त नहीं आया था

की वह उनकी नियति बन जाए

वह उन्हें बार- बार करीब लाया

और दूर ले गया

अपनी हँसी दबाये उसने उनका रास्ता रोका

और फ़िर उछालकर दूर हट गया

नियति ने उन्हें बार-बार संकेत दिए

चाहे वे उन्हें न समझ पाए हों

तीन साल पहले की बात है

या फ़िर pichale मंगल की

जब एक सूखा हुआ पत्ता

किसी एक के कंधे को छूते

दूसरे के दामन में जा गिरा था

किसी के हांथों से कुछ गिरा

किसी ने कुच उठाया

कौन जाने वह एक गेंद ही हो

बचपन की झाडियों में खोई हुई

कई दरवाजे होंगे

जहाँ एक की दस्तक पर

दूसरे की दस्तक पड़ी होंगी

हवाई-अड्डे होंगे

जहाँ पास-पास खड़े होकर

सामान की जाँच करवाई होगी

और किसी रात देखा होगा एक ही सपना

सुबह की रौशनी में धुंधला पड़ता हुआ

और फ़िर हर शुरुआत

किसी न किसी सिलसिले की

एक कड़ी ही तो होती है

क्योंकि घटनाओं की किताब

जब देखो अधखुली ही मिलती है…..

शिम्बोर्स्का की यह कविता हर प्यार करने वाले

को बेहद अजीज लगती है…यही शिम्बोर्स्का का

जादू है जो एक बार सर चढ़ जाए तो फ़िर कभी नहीं

उतरता….

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