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Archive for January, 2009

>पहला वसंत

>

जब आँख खुली तो सिरहाने वसंत को पाया

उसकी खुशबु से पूरा कमरा

महक रहा था न जाने कब और कैसे

मेरे सिरहाने

कोई चुपके से वसंत सजा गया।

इतने वर्षों से तो मैंने

कभी पहचाना नहीं इसे

और आज जब देखती हूँ

तो लगता है सदियों पुरानी है

पहचान

महकती अम्रैयाँ, कूकती कोयलें

और खिलखिलाता बचपन

सबकुछ बेहद करीबी से

लगते हैं आज

क्या मेरे जीवन का

पहला वसंत है…..

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>यार जुलाहे!

>मुझको भी तरकीब सिखा
कोई यार जुलाहे
अक्सर तुझको देखा है की
ताना बुनते
जब कोई तागा टूट गया या ख़त्म हुआ
फ़िर से बाँध के
और सिरा कोई जोड़ के उसमे
आगे बुनने लगते हो
तेरे इस ताने में लेकिन
एक भी गांठ गिरह बुन्तर की
देख नहीं सकता है कोई
मैंने तो एक बार ही बुना था
एक ही रिश्ता
लेकिन उसकी सारी गिरहें
साफ़ नजर आती हैं मेरे यार जुलाहे……

– गुलजार

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>इंतजार

>

किसकी खातिर धूप के गजरे

इन शाखों ने पहने थे

जंगल जंगल मीरा रोई

कोई न आया रात हुई …..

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>

रोज सबेरे धरती के एक छोर से सूरज उगता है और रोज ही शाम को किसी नदी, पोखर, समंदर में गिरकर बुझ जाता है। रोज ही हवाएं चलती हैं, जिस्म को छूते हुए निकल जाती हैं. रोज हमारी जिंदगी में अनगिनत अजनबी चेहरे आते हैं, जिन पर हमारा ध्यान तक नहीं जाता. रोज ही बहुत कुछ होता है जो बेहद कॉमन सा होता है. हमारा बोलना, काम करना, सोचना, आगे बढ़ना और अगले दिन की तैयारी करते हुए आज के दिन को गुड बॉय कहना. अचानक इस कॉमन सी लाइफ का हर लम्हा महकने लगता है. अचानक एक दिन हमारा एनर्जी लेवल बढ़ जाता है. अचानक दिन सुनहरे हो उठते हैं. अचानक हम खुद को आम से खास होता हुआ महसूस करने लगते हैं. अचानक हवाओं को मुट्ठियों में भींच लेने का, सूरज को आंखों में कैद कर लेने का हौसला हमारे भीतर जन्म लेने लगता है. अचानक ढेरों फूल हमारे भीतर खिलने लगते हैं. कैसे होने लगता है यह सब? दरअसल, ये सारे चेंजेस होने लगते हैं हमारी खुद से मुलाकात होने के बाद. खुद से मुलाकात यानी अपने बारे में कुछ जानना, समझना और खुद पर बिलीव करना. दौड़भाग में हम खुद को ही इस कदर इग्नोर करने लगते हैं कि अपने ही लिए अजनबी हो जाते हैं. हमें ध्यान ही नहीं रहता कि हमारे अंदर कितनी संभावनायें हैं. द मोमेंट वी बिलीव इन अवरसेल्फ, वी बिकम लिटिल डिफरेंट. हमारा सोचना, हमारा काम करना, हमारी जिंदगी का पूरा ऩजरिया बदल जाता है. आम होने से खास होने तक का रास्ता इस बिलीव से होकर ही तो गुजरता है. पर हममें से बहुत कम लोग इस बात को जान या समझ पाते हैं. वक्त ही नहीं मिलता. हमसे, हमारी मुलाकात करवाने का क्रेडिट जिन चीजों के हिस्से जाता है, वे भी कम दिलचस्प नहीं हैं. कभी किसी की टूटती हुई उम्मीदों को सहेजते हुए हम चुपके से खुद की उम्मीदों को भी सहेज लेते हैं. किसी के आंसुओं को पोंछते हुए हम खुद अपना दर्द भी कम कर ही लेते हैं. दूसरों से बात करते समय हम खुद से भी बात करते हैं. यानी जो हमें लगता है हम दूसरों के लिए कर रहे हैं दरअसल, वह हम अपने लिए कर रहे होते हैं. अच्छा या बुरा, गलत या सही. यही है हमारी खुद से मुलाकात, बस इतना सा है जिंदगी का फलसफा. लेकिन यहीं, ठीक इसी जगह पर ़जरा सा ब्रेक लेने की जरूरत है. ये सेल्फ बिलीव कहीं ओवर कॉन्फिडेंस न बन जाये यह ध्यान रखना कम जरूरी नहीं है. ़जरा सी लापरवाही डेंजरस हो सकती है. हम सब जानते हैं कि जो पेड़ फलों से जितना लदा होता है, उतना ही झुकता चला जाता है. लता मंगेशकर हों, भीमसेन जोशी, पं. हरि प्रसाद चौरसिया या कोई और सेलिब्रिटी, ये सब अपनी हर परफॉर्मेस से पहले अब तक नर्वस होते हैं. उनका यह नर्वस होना उन्हें परफेक्ट होने के गुमान से बचाता है और हर पल कुछ नया करने को उकसाता है. अपने ऊपर विश्वास करने के साथ ही अपनी जिंदगी में अपने सपनों को भी जगह देना कम जरूरी नहीं है. सपने, जो आंख खुलने पर आंखों से गिरकर टूटते नहीं. सपने जो हमारी स्ट्रेंथ बन जाते हैं, सपने जो हर पल हमारे साथ चलते हैं. हमारे आम से काम को खास बनाते हैं. अपने सपनों की उंगली थामकर अपने सेल्फ बिलीव के साथ कदम बढ़ाते ही दुनिया सचमुच बदलने लगती है. चांद फिर आसमान में चमकने वाला दूर का राही नहीं, हमसफर सा लगने लगता है. हमारे और हमारे सपनों के बीच के फासले घटने लगते हैं. जिंदगी सचमुच खूबसूरत होने लगती है, महकने लगती है. रोजमर्रा की कॉमन सी जिंदगी ही दरअसल सबसे खास होती है. बस, हमें इसकी अहमियत को रिकॅग्नाइज करने की देर है. विश्व का बेस्ट लिटरेचर, ब्लॉक बस्टर फिल्में, ढेरों कैनवास आम जिंदगी की खुशबू से ही तो महक रहे हैं. आइये, इस आम जिंदगी की अहमियत को पहचानें और बना लें इसे सचमुच खास.

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> दिल धक् से रह गया जब एक ब्लॉग की इस पोस्ट पर नजर पड़ी की लवलीन नहीं रहीं। न जाने क्या क्या आंखों में तैर गया। आंसुओं का अर्घ्य लवलीन जैसी जीवट महिला के लिए बहुत कम है। लवलीन उन स्त्रियों में

से हैं जिन्हें मेरी स्म्रतियों में ख़ास जगह मिली है। मैं उनसे बस एक बार ही मिली हूँ। धनबाद में। शायद १९९९ की बात है। संगमन था साहित्यकारों का। मै badi सहमी सहमी सी रहा करती थी, सारे सवाल अन्दर ही अन्दर बुनते हुए। लवलीन मेरी जिंदगी की पहली mahila थीं जिन्हें मैंने बिंदास सिगरेट और शराब पीते देखा था। मेरे घर में ya aas paas मैंने कभी किसी को पान tak खाते नहीं देखा था मेरे लिए बड़ा अजीब अनुभव था। लेकिन na jane kyon मुझे ख़राब बिल्कुल नहीं लगा। मैंने देखा मेरी ही तरह वे भी कुछ कुछ खामोश सी ही रहती हैं। मैं उन्हें ओब्सेर्वे
करती रही और उनकी कहनियों से उन्हें मिलाती रही। एक रात उन्होंने अपने कमरे में बुलाया। मै गई। सिगरेट के धुँए से मुझे परेशानी हो रही थी जिसे मै जाहिर नही होने देना चाहती थी। वे अपना ड्रिंक बना चुकी थीं। जाने क्या था की मैंने उनसे कोई सवाल नहीं किया। काफी देर तक खामोशी हमारे बीच डोलती रही फ़िर वे बोलीं, प्रतिभा इस दुनिया में जीने के लिए कठोर बनना। झुकना नहीं। मै खामोश रही। वे भी कम ही bolti thi पर बहुत कुछ कह रही हैं। उन्होंने आशीर्वाद दिया था न मानने का और लगातार लिखने का। रात के दो बजे तक हम बातें करते रहे। unhonne जयपुर aane की दावतk भी di। अगले दिन धनबाद घूमने निकले। कोयले की khanon ke andar jane ke लिए राजेंद्र यादव जी हों या संजीव, priyamvad hon ya देवेन्द्र सब के सब उत्सुक थे। हम सबने जाने कितनी सहितियिक चर्चाएँ की पर उस खामोश और सिगरेट की तलब की तलबगार लवलीन का चेहरा ज्यादातर खामोश ही था।
वापस आने के बाद उनका एक khat आया ढेरों आशीषों भरा। लिखने की राह में कोई रोड़ा न आए लिखते हुए उन्होंने अपनी कुछ कहानिया भी भेजी थीं जिनका मैंने आग्रह किया था। फ़िर हमारा khato किताबत का सिलसिला चला जो आगे जाकर रुक गया। अपने व्यस्तताओं पत्रकारिता के झमेले और हम पास होते हुए दूर हो गए। जब कभी उनका लिखा कुछ पढ़ती अपने अन्दर एक हौसला महसूस होता। आज उन्हें इस रूप में याद करना सचमुच बहुत बुरा लग रहा है। लवलीन ने संघर्ष का जीवन जिया और कभी किसी से कोई शिकायत नहीं की। लवलीन, आज अपने आपसे ये वादा दोहराती हूँ
की रहूंगी और बिना समझोतों के अपना रास्ता तय करूंगीआप हमेश याद आएँगी लवलीन.

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>रौशनी

>

बहुत प्यार से

बाद मुद्दत के

जबसे किसी शख्श ने

चाँद कहकर बुलाया है

तब से

अंधेरों की आदी निगाहों को

हर रोशनी अच्छी लगने लगी है

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>

पता नहीं

वह उस जगह को याद भी करती हो

या…नहीं

जहाँ बैठ हम दोनों ने

प्रेम की ऊष्मा से

घास की हरियाली पर

सपनों का बुना था कुंकुनापन

हाथों में थाम हाथ

आत्मा को जागते हुए

कहा था एक दूजे के लिए

छुओ….

जागो….

और, भीग जाओ…..

वे सुख के पल

क्या उसे अभी भी

याद हैं?

यह मैं नहीं जनता

यद्यपि आज भी आती पड़ी हैं

मेरी कवितायें

उन भीगे पलों से

संचित करने जिनको

मैं जगा हूँ

न जाने कितनी रातें।

krishn कान्त निलोसे की कविता

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