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Archive for March 3rd, 2009

> उड़ने की, आसमान की ऊंचाइयों, आसमान के विस्तार को पार करने की स्ट्रांग फीलिंग किसमें होती है? उस पक्षी में जो पिंजड़े में होता है। रात-दिन, सोते-जागते उसे बस आसमान दिखता है। भूख, प्यास तक उसके लिए इंपॉर्टेट नहीं रहती. ऐसी ही कामना, उड़ने की ऐसी ही विलपावर पिछले दिनों दिखी पाकिस्तान (स्वात घाटी) की लड़कियों में. वे देश की तकदीर बदल देना चाहती हैं. पॉलिटिक्स, मेडिकल, इंजीनियरिंग, सेना हर जगह की कमान अपने हाथ में लेना चाहती हैं. आंखों में चमक है और दिल में ह़जारों ख्वाहिशें. जबकि सच्चाई यह है कि पाकिस्तान की स्वात घाटी में तालिबान का कब्जा हो चुका है. सिर्फ पाकिस्तान में ही नहीं, पूरी दुनिया में खलबली है, अब क्या होगा? हवा में हथियार लहराते हुए अपनी विजय का पर्व मनाते उन खूंखार लोगों को देखकर न जाने क्यों लगा कि इनके इस जश्न पर उस मासूम लड़की की एक मुस्कान भारी है. दुनिया का कोई भी खौ़फ अगर सपनों को आखों में आने से रोक नहीं पाता है तो य़कीन मानिए उसकी उम्र ज्यादा नहीं है. बहरहाल, आज सवाल यह भी है कि क्या तालिबान का कब्जा सिर्फ स्वात में हुआ है, वह भी अभी? क्या होता है तालिबान? कैसे होते हैं तालिबान के नाम पर दहशत पैदा करने वाले लोग? जितना मेरी समझ में आता है उसके हिसाब से तो मुझे यह तालिबान हर जगह ऩजर आता है. हिंदुस्तान में, अमेरिका में, बांग्लादेश में, पाकिस्तान में हर जगह. हमारे घर में, घर से बाहर निकलते ही, सड़कों पर, चौराहों पर, दफ्तरों में. कहां नहीं है तालिबान? हर वक्त, हर मोड़ पर किसी न किसी रूप में शिकंजा कसने की कवायद लगातार चल रही है. मंगलौर में जो हुआ उसे भला और क्या नाम दिया जा सकता है? वैलेंटाइंस डे पर पार्को में, सड़कों पर जो होता है, वो क्या है? सौम्या विश्वनाथन के साथ जो हुआ, वो क्या था? वह तो काम के बाद घर लौट रही थी. मुझे याद है उसकी हत्या के बाद किस तरह की बातें हुई थीं. उन बातों में मुख्य बात यह थी कि एक लड़की होने के नाते उसे देर रात निकलना ही नहीं चाहिए था. एक न्यूजपेपर ने तो सौम्या के कैरेक्टर का पोस्टमार्टम करने से भी गुरेज नहीं किया था. यानी उसके साथ जो हुआ, वह ठीक ही हुआ. गोया कि कोई लड़की सिर्फ इसलिए मार दी जा सकती है क्योंकि उसका कैरेक्टर गड़बड़ है. किसी लड़की के बारे में कुछ भी अनाप-शनाप बकवास करना, क्या पत्थर मारकर घायल करने या मार डालने की सजा से कम बड़ी सजा है? हर मोड़ पर कोई न कोई कैरेक्टर सर्टिफिकेट देने को तैयार खड़ा है. क्या तालिबानी सोच का ही दूसरा संस्करण नहीं हैं ये लोग? हद तो यह है कि जहां इन लोगों को घर से बाहर निकलने वाली सारी औरतों को कैरेक्टरलेस कहने में कोई संकोच नहीं है, वहीं दूसरी ओर घर में रहने वाली औरतों के बारे में भी कोई खास अच्छी राय नहीं है इनकी. पढ़े-लिखे समाज में ये चेहरे इस कदर डिजॉल्व हो चुके हैं कि इन्हें पहचानना भी मुश्किल है. एक सूडोइज़्म हर जगह है. वो कहते हैं, हम तुम्हारे साथ हैं, तुम चलो॥पर ऐसे नहीं, वैसे॥इतनी तेज नहीं ़जरा धीरे, इधर नहीं उधर..यह कैसी डेमोक्रेसी है, जहां आजादी के बाद बंदिशें और बढ़ रही हैं? मुझे लगता है कि वह दुश्मन फिर भी ठीक है, जिसका चेहरा आप पहचान सकते हैं. ऐसे दुश्मन तो और भी खतरनाक हैं, जो दोस्त बनकर गला काट रहे हैं. हर वक्त एक घुटन, उदासी, उपेक्षा और नकारेपन का अहसास करा रहे हैं. पाकिस्तान में तालिबान के घुसने के बाद हम सब कम से कम वहां के लोगों की स्थिति को समझने की कोशिश तो कर रहे हैं, कुछ हद तक ही सही लेकिन अपने आसपास के तालिबानी चेहरों को पहचान पा रहे हैं क्या? तालिबान और कुछ नहीं एक क्रूर सोच है जो हर सूरत में अपना प्रभुत्व बनाये रखना चाहती है. अपने नियम, ़कायदे, कानूनों में लोगों को जकड़ देती है. जिसका शिकार सबसे ज्यादा औरतें होती हैं. वक्त आ गया है खुद को समझने का, अपने भीतर जन्म लेती तालिबानी सोच को झटककर फेंक देने का. साथ ही आसपास उग आये तालिबानी चेहरों के इरादों को नाकाम करते हुए इस आसमान की ऊंचाइयों से भी पार….

प्रतिभा कटियार

आई नेक्स्ट के एडिट पेज पर प्रकाशित लेख…

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