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Archive for March 16th, 2009

>हर प्रेम

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हर प्रेम सबसे पहले यही पूछता है, तुम्हारी चौखट तक आकर….क्या तुम मेरे लिए कूद सकते हो खिड़की से नीचे? कर सकते हो छलनी अपना सीना? हर प्रेम पूछता है यही…उड़ सकते हो क्या मेरे साथ ?
प्रेम जब आता है तुम्हारी चौखट तक, तो जल्दी चले जाने के लिए नहीं….उसे जाना होता है किसी पर्वत या घाटी की तरफ़। समुद्र या नदी की तरफ़। वह बिना किसी पूर्वा योजना के आ निकलता है तुम्हारे घर की तरफ़ और जानना चाहता है, तुम उसके साथ डूबने चल रहे हो या नहीं…

प्रेम तुम्हें भली-भांति मरने की पूरी मोहलत देता है….

– गगन गिल

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