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Archive for April, 2009

> हंसता हुआ एक खूबसूरत आंसू kab se संभालकर रखा था एक आंसू. वो आखिरी आंसू था. कितनी ही बदलियां आंखों से होकर बरसती रहीं बरसों. लेकिन ये एक आंसू. इसे जमाने की नजर से बचाया. अपनी ही नजर से भी. झाड़-पोंछकर रख दिया मन के सबसे भीतर वाले कोने में।

पूरी ताकीद की थी उसे, देखो तुम यहीं रहो. तुम्हें जाया नहीं करना है मुझे. औरों के लिए नहीं, अपने लिए बचाया है तुम्हें. मेरी मजार पर चढऩे वाला पहला आंसू. क्या पता आखिरी भी. फूल की तरह खिला हुआ, हीरे की तरह चमकता हुआ. मेरा खुद का आंसू, मेरे खुद के लिए।

उसकी चमक में कैसा तो सम्मोहन था. उसका सौंदर्य अप्रतिम था. लोग इल्जाम लगा सकते हैं कि सबसे सुंदर और अनमोल आंसू तो मैंने बचा लिया अपने लिए, इसीलिए मोहब्बतों की मिठास फीकी ही रही. जिंदगी की भी. लेकिन आज यह अपनी पूरी शानो-शौकत के साथ बाहर क्यों आ पहुंचा है।

जरा तेवर तो देखिये इनके और मुस्कुराहट. इतिहास बदल देगा ये कम्बख्त तो. मुस्कुराता हुआ आंसू. कभी देखा है किसी ने? डांटकर पूछा- क्यों मना किया था न तुम्हें? क्या तुमने भी मेरी बात न मानने की ठान ली है. बोलो?

हंसा वो जोर से. उसके हंसने से उसकी चमक झिलमिला उठी. पास में खिले हुए फूलों की आंखें चुंधियाने लगीं उस झिलमिलाहट में. वो बोला, तुमने मुझे अपनी मजार के लिए ही तो बचाकर रखा था ना?
क्या तुम अब मजार ही नहीं बन चुकी हो अपनी?

मैं खामोश, हीरे से चमकते उस एक आंसू में डूबते हुए अजब सा सुख महसूस करने लगी.

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लो फूल सारे तुम रख लो अब से। मुझे नहीं चाहिए। कांटे ठीक हैं मेरे लिए। कांटों के मुरझाने का कोई खतरा नहीं होता. न ही इनकी परवरिश करनी पड़ती है.

सुख तुम पर खूब खिलते हैं. ये तुम्हारे ही लिये बने लगते हैं सारे के सारे. सच्ची, इनका तुम्हारा नाता पुराना है. ये भी तुम्हारे हुए. मैं क्या करूंगी इनका. मेरे लिए इनकी कोई अहमियत नहीं. बेजार हूं मैं सुखों से। इनके होने न होने से कोई फर्क नहीं पड़ता है मुझे। बल्कि कभी कोई सुख गलती से टकरा जाता है, तो उसके टूटने का भय खाये रहता है हरदम.

चांद-वांद, चांदनी-वांदनी इनमें में भी कोई रुचि नहीं रही अब मुझे. लो सारी चांद रातें तुम रख लो. मैं अमावस की रातों पर अपने गम का चांद उगा लूंगी। बरसती हुई अमावस की रातों का स्वाद बहुत भाता है मुझे. कभी चखा है तुमने? नहीं…नहीं…ये स्वाद तुम्हारे लिए नहीं है.

धरती भी तुम रख लो, आसमान भी। मेरे लिए तो क्षितिज ही काफी है. अनंत के छोर पर दिखता एक ख्वाब सा क्षितिज.

देह भी तुम ही धरो प्रिय। निर्मल, कोमल, सुंदर देह। सजाओ, संवारो इसे। मेरे लिए तो मेरी रूह ही भली। जल्दी करो, समेटो अपनी चीजें। किसी के बूटों की आवाज आ रही है। सिपाही होगा शायद, या फिर कोई चोर-उचक्का भी हो सकता है.

मांगने लगेगा वो भी हिस्सा या फिर छीन ही लेगा वो तो सारी चीजें. तुम जल्दी से चले जाओ सब लेकर यहां से.

मुझे कुछ नहीं होगा. मेरी चीजों में कोई दिलचस्पी नहीं होगी किसी को जरा भी नहीं. मैं आजाद हूं अब दुनिया के हर ख़ौफ से।

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धीरे-धीरे खत्म हो रहा sab कुछ,
जीवन में घुलने लगा है
मीठा जहर
प्रेम ने कर लिया है किनारा।
कलाएं औंधे मुंह पड़ी हैं,
व्यावसायिकता सिर पर सवार है
लेकिन है वह भी खोखली ही।
घटनाएं अब हादसों मेंतब्दील हो चुकी हैं,
यातनाएं आदत में ही गई हैं शुमार।
दरख्तों पर चिडिय़ा नहीं
भय बैठता है इन दिनों।
खत्म हो रहा है सब कुछ
धीरे-धीरे और
ऐसे में हम लिख रहे हैं कविताएं
क्योंकि इस नष्ट होती धरती को
कविता ही बचायेगी एक दिन
देख लेना….
– प्रतिभा

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> कल लखनऊ के सारे अखबार खून से रंगे होंगे। लॉमार्टीनियर स्कूल के बच्चों की वैन सुबह-सुबह रोडवेज की बस से टकरा गई और पूरी सुबह में, शहर में दर्द घुल गया। एक बच्चे की मौत हो गई. कई घायल हुए. अखबार की दुनिया भी अजीब होती है. संवेदनशील होने के लिए कितनी बार संवेदनाओं का गला दबाना पड़ता है. सारा दिन एक्सीडेंट की फोटो, कवरेज, वर्जन, खबरों के एंगल इन्हीं सब में दिन बीता। कैसी मजबूरी है कि फिर उन्हीं हाथों में अगली सुबह अपने कलेजे के टुकड़ों को सौंपना है. जिं़दगी को फिर चलना है. ऊपरवाले का यह कैसा इंसाफ है? दिल दर्द से भरा है. काश! कोई कुछ कर पाता. कम कर पाता उन मां-बाप का दर्द. काश!
श्रधांजलि…..

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>कितने असहाय, कितने कमजोर, कितने निरीह हो गये दुनिया के सारे शब्द, जब दिल के भावों को जस का तस पहुंचने की बारी आयी. दुनिया का हर शब्दकोश निरर्थक, सारी भाषायें बौनी. कांपते होठ लेकिन शब्द खामोश. कोरों पर अटका हुआ एक आंसू ही काफी. दुनिया के सारे रूमानी शब्दों ने उस अनमोल आंसू के आगे सजदा किया और कहा प्रेम! सचमुच भाषाओं में, शब्दों में कहां समा पाते हैं भाव, जब बात प्रेम की होती है. तभी तो दुनिया के बड़े से बड़े साहित्यकार प्रेम का इजहार करते समय निरे मूरख ही नजर आये. किसी ने प्रेम में अपने भीतर के भय को व्यक्त किया, किसी ने अनंत की यात्रायें कीं. किसी ने शब्दों को आत्मा की तपिश में तपाकर सोना बना दिया, ताकि वे रूह में जज्ब हो सकें सदियों तक के लिए. कोई तो गुस्से में बिफर ही पड़ा कि तुम समझ जाओ ना सब कुछ, मुझसे नहीं कहा जा रहा कुछ भी.ऊंची-नीची, टेढ़ी-मेढ़ी गलियों से गुजरते प्रेम को दुनिया के मशहूर लोगों के करीब जाकरमहसूस करने का मकसद सिर्फ इतना सा था कि देखें तो जरा इनका क्या हाल हुआ था जब ये प्रेम में थे. बात साफ नजर आई कि सब के सब औंधे मुंह ही पड़े नजर आये। अव्यक्त को व्यक्त करने की पीड़ा में उलझे हुए. अनाड़ीपन में, उलझन में जो कुछ संप्रेषित हुआ वह दरअसल प्रेम की उदात्तता का एक जरा सा हिस्सा भर है.मेरे प्रिय कथाकार प्रियंवद कहते हैं कि प्रेम मनुष्य की स्वतंत्रता की प्रखरतम अभिव्यक्ति है. लेकिन देखिये जरा ये अभिव्यक्तियां इन पत्रों में कितनी कम अभिव्यक्त हो सकी हैं. यह प्रेम ही है जो इतना उदार हो सकता है कि दे सब कुछ और मांगे कुछ भी नहीं. कैसा होता है ये प्रेम है जो ईश्वर के करीब ले जाकर खड़ा कर देता है. जितना देता है, उतना ही मन भरता जाता है. सृष्टिकर्ता खुद सर पर हाथ फेरने को व्याकुल हो उठे, ऐसे प्रेम की पात्रता आसान तो नहीं. प्रेम अतिरेक है, जोखिम है, स्वतंत्रता है. अपने क्षुद्रतम से उठकर अपने ही उच्चतम की ओर जाने का प्रयत्न. खुद से खुद का मिलन. कोई नियम नहीं, कोई बंधन नहीं. हम सब कहीं न कहीं ऐसे गहन प्रेम की एक बूंद के अभिलाषी हैं, जो हमारे जीवन के मरुस्थल को समंदर बना दे. लेकिन प्रेम तो नसीब है और नसीब सबका कहां होता है. हम बस दुआ कर सकते हैं कि जब, कभी यह नसीब हमारे करीब से होकर गुजरे, तो कहीं हमसे ही टकराकर टूट न जाये, बिखर न जाये.
प्रेम से भरे इन पत्रों का ब्लॉग जगत में जिस तरह से स्वागत हुआ, उससे एक बात साफ जाहिर होती है कि भीतर ही भीतर ऐसे सच्चे प्रेम की कामना में सब कहीं न कहीं तरस रहे हैं. कॉफी के झाग में प्रेम का असल रूप गुमा नहीं है अभी तक। ब्लॉग जगत के नये दोस्तों का आभार, जिन्होंने पढऩे में दिलचस्पी दिखाकर हौसला बनाये रखा.रवींद्र व्यास जी का खासतौर पर शुक्रिया जिन्होंने वेब दुनिया पर मेरे ब्लॉग की सुंदरतम रूप में चर्चा की. अमर उजाला अखबार भी जिसने संपादकीय पेज पर मेरी दुनिया को जगह दी. कुछ अंतराल के बाद इसी तरह डायरी देने की योजना है. तब तक…मिलते रहेंगे.
– प्रतिभा

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>25.8.१९७६
मेरी प्रिय,
….बाहर बारिश हो रही है। एक शदीद बारिश. पूरा कस्बा अंधेरे में डूबा हुआ है-सिर्फ यही जगह रोशनी से भरी है, ऐसे जैसे सारे शहर की रोशनी ने भागकर यहां शरण पा ली है. शायद यह जगह रोशनी ही नहीं मेरे लिए भी एक टापू की तरह है, जहां मैं सृष्टि के डूबने के बाद रह जाने वाले, शेष चिन्हों की तरह हूं. कभी-कभी मैं कल्पना करता हूं, ईश्वर के उस भयावह अकेलेपन की, जब सारी सृष्टि डूब जाती होगी और वह वट के पत्ते पर अकेला बचा रहता होगा. वह जरूरत पर किसे पुकारता होगा, प्रलय शून्य सन्नाटे में? उसकी पुकार, ढूंढकर उसी के पास उदास होकर लौट आती होगी. वह अपने ही कानों से सटी उस पुकार के बारे में क्या सोचता होगा? मुझे लगता है यदि मैं उस पत्ते पर अकेला रह जाता, एट द एंड ऑफ यूनिवर्स तो मैं उस पत्ते पर से तुमको पुकारता. ऐसा मैं इसलिए सोचता हूं कि जाने क्यों मेरे शब्दों पर मंडराती है, तुम्हारे हाने और कहीं भी होने की छाया. कभी-कभी वह छाया बहुत निकट जान पड़ती है. मेरे लिखे हुए शब्दों से तब उनकी ध्वनियां जैसे बाहर बिखरती-उफनती लगने लगती हैं. जैसे, तुम्हारा नाम लिखा तो उसमें से उसके साथ अर्थ की आभा बाहर बिखर रही है. लगता है तुम्हारा नाम लिखने का अर्थ पूरे कागज पर रोशनी का फैल जाना हो. और, इस नितांत ठोस अंधेरे में डूबे कस्बे में, छोटी सी रोशन जगह का होना, जैसे तुम्हारा नाम लिख देने से ही संभव हो गया हो. वहां दूर अंधेरे में डूबे कस्बे और उसके लोगों को कहां पता होगा कि यह जो इस वक्त रोशनी का टापू टिमक रहा है, वह क्यों है? कस्बा नहीं जानता कि मैंने बस अभी तुम्हारा नाम लिखा है.बाहर अंधेरा गहरा ठोस सा है और इस जगह से बाहर बहती हवा ऐसी लग रही है, जैसे वह काली और ऊंची दीवारों को ठकठकाती हुई दरवाजा टटोल रही हो, ताकि वह अंधेरे के घेरे से बाहर हो जो. पता नहीं कि ऐसे अंधेरे-डूबे आकाश में कोई आपातकालीन द्वार हो. पर, इन दिनों तो सारा देश जैसे आपातकाल का द्वार बना हुआ है. लोग आपातकाल का स्वागत कर रहे हैं. क्या आपातकाल एक संभावना है?बहरहाल, मैं भी इस अंधेरे से बाहर निकलने के लिए किसी आपातकालीन दरवाजे की तलाश में हूं, पर यह अंधेरा मेरे भीतर का है और तुम्हें खत लिखने की घड़ी आपातकालीन दरवाजे के, बरामद हो जाने की घड़ी जान पड़ती है. कभी-कभी तो मुझे तुम उस उपकरण की तरह लगती हो जिसे डॉक्टर्स गले में लटकाये रहते हैं. मुझे लगता है, मैं उनकी तरह तुम्हारे स्पंदन को पकड़ता रहता हूं, मसलन तुमको कानों के निकट लाकर सुनता हूं. बारिश की आवाज भी, कभी-कभी डॉक्टर्स अपने गले में लटके उस उपकरण को अपने कानों में लगाकर सुनते होंगे, अपनी ही धड़कन को. तुम तक खत के जरिये बार-बार लौटना ऐसा लगता है, जैसे हर बार कोई नया अविष्कार कर लिया हो. यह अविष्कार करने की निरंतरता ही मुझे यहां इतनी दूर जीवित बनाये रखती है. मुझे याद आती है, साइबेरिया से बार-बार भरतपुर के पोखर में उनका ऐसा क्या छूट जाता है, हर बार जिसे वे ढूंढने आते हैं-ढूंढने आते हैं या कि उस छूटे हुए को भर आंख देखने.यकीन रखो एक दिन मैं भी आऊंगा, तुम तक. यही देखने कि ऐसा क्या छूट गया था मेरा तुम्हारे पास, प्रलय से पहले. जब यह मैं लिख रहा हूं तो लगता है, तुम चुप हो. तुम्हारा मौन और-और तराश देता है मेरे उन शब्दों को, जो अभी बोले और लिखे ही नहीं गये हैं. तुम्हारे मौन की धार में तराशी भाषा को लेकर एक दिन तुम्हारे पास आकर रखूंगा और पूछूंगा, लैंगवेज का एस्थेटिक देखना चाहोगी? दरअसल, सच तो यह है कि फिलहाल तुम तक मैं सिर्फ भाषा में ही पहुंचना चाहता हूं। कभी सोचता हूं कि यदि सचमुच में ही पहुंच जाऊंगा तो भाषा का क्या होगा? एक अनुपयोगी पुल की तरह ढह जायेगी। भाषा के पुल के टूटे मलबे के दोनों छोरों पर हम होंगे। तुम्हारे कान तो नहीं सुन पायेंगे, उस पुल के ढहने की आवाज। पर मैं अपने गले में लिपटे उपकरण से जरूर सुन लूंगा, वह धड़ाम की आवाज। वक्त के तेजरफ्त बहाव में बह जायेगा पुल-और मैं वहां से लौट आऊंगा, अपने उसी सन्नाटे में। मैं तुमसे पूछ भी नहीं सकूंगा कि भाषा के मलबे को लांघकर आ सकोगी इस पार। फिर चलने से पहले पूछूंगा एक सवाल कि पुल क्यों बनते हैं और पुल क्यों ढहते हैं? फिर उदास हो जाऊंगा कि एक प्रश्न अपने असंख्य उत्तर रखता है-और कभी-कभी तो उससे एक भी उत्तर नहीं आता। और कभी-कभी आते हैं अनगिनत उत्तर।
बाकी फिर….
पुनश्च:- रात को खत लिखने के बाद, कल से लौटकर सोया और नींद में रातभर बिस्तर में लोट लगाते हुए। एक परिंदे की तरह पंख लगाकर तुम्हारे शहर पर मंडराता रहा उसकी गलियों और कूचों में मैं भागता रहा. कहां ढूंढता तुम्हें भाषा के घर में. आज भी बारिश हो रही है और हवा ऐसी बह रही है, जैसे शहर में रास्ता भटक गयी हो. मैं भी भाषा में भटककर वहां पहुंच गया, जहां मैं पहुंचूंगा भी कि नहीं.

प्रेम तो नसीब है….जारी….

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>सुप्रिय,
थोड़ा तुम्हें अजीब लग सकता है, लेकिन अब इतनी दूर तक साथ चलते हुए मुझे लगने लगा कि तुम मेरे लिए जेंडर की, नाम या जाति की सीमाओं से परे मात्र एक ऐसा वजूद हो, जिसके भीतर से मैं गुजरता हूं और नितान्त किसी और लोक में चला जाता हूं। वहां की नागरिकता को हर कोई हासिल नहीं कर सकता। हो सकता है, उस लोक का मैं ही एकमात्र अकेला नागरिक होऊं। यदि वहां रहकर मुझे किसी से बात भी करना हो तो वापस तुम में से गुजरना होगा। क्या(…), तुम किसी ऐसे संसार की कल्पना कर सकती हो, जिसका ईश्वर और जिसका नागरिक एक ही और एकमात्र व्यक्ति ही हो! यहां तक कि तुम भी उस संसार के इस छोर पर रुका रह जाने वाला कोई चिन्ह हो? क्या तुम उस व्यक्ति के अकेलेपन के सुख या उस अकेलेपन के दु:ख की कल्पना कर पाओगी? बहरहाल, यह अलग बात है कि जब मुझे बात करनी होगी, मैं तुमको रचूंगा और बात करूंगा और कहने की जरूरत नहीं है कि मैं हर खत लिखते समय तुम्हें नये ढंग से रचता हूं। उन्नीस बरस के बाद मैंने तुम्हें अपने लिए और अपनी तरह से रचा। हालांकि, मैं विधाता नहीं हूं। लेकिन मैं तुम्हें रच-रच कर खुद को भी रचता ही हूं। क्योंकि, तुम्हें बीच में रखकर मैं खुद को बार-बार छानता हूं। एक बहुत क्षीण और सूक्ष्म से तार हैं, तुम्हारे होने के जिसके बीच से मैं गुजरता रहता हूं. और, अब मैं इतना बारीक हो गया हूं कि मेरा समूचा अस्तित्व सितारों पर उड़ती धूल की तरह है. तारों भरे आकाश की तरफ देखने का कभी तुम्हें मौका मिले तो मानना, वहां रोशनी की धूल की तरह मैं ही हूं.कल मैंने एक उपन्यास पढऩा शुरू किया था. द लास्ट टेम्पटेशन. यानी क्राइस्ट बनाम यीशू प्रभु की आखिरी कामना. इसमें लेखक ने एक कल्पना की कि क्राइस्ट को जब सूली पर चढ़ाया गया होगा तो मृत्यु के आखिरी क्षणों में उनकी इच्छा मेरी के साथ शारीरिक सुख के अनुभव की रही होगी. वही पवित्र मेरी, जिसे उन्होंने धूल से उठाकर इंसान होने का सम्मान दिया था. मुझे इस उपन्यास को पढ़ते हुए लगा कि इसमें बहुत बड़ी जोखिम है. एक तो यह क्रिश्चियन बिलीफ की किरचें-किरचें उड़ा देता है, दूसरे मुझे यह महत्वपूर्ण लगता है कि क्राइस्ट की विश्वजनीन छवि के बावजूद उन्हें मनुष्य की तरह समझने की एक ईमानदार कोशिश की गयी है. यह कोशिश क्राइस्ट को गिराने और सेक्स की सनसनी बनाने के लिए नहीं है, बल्कि सत्य को ज्यों का त्यों रखकर समझने की है. अब प्रश्न यह उठता है कि सत्य क्या है? सत्य को जानने के नाम पर हम भारतीय भी यह जानते हैं कि यह नहीं, यह नहीं (अर्थात नेति-नेति) अर्थात हम केवल झूठ को पकड़ते हैं और कहते है, यह सत्य नहीं. नतीजतन, अंतहीन विश्लेषण करते जाते हैं. अत: द लास्ट टेम्पटेशन का लेखक यही जानने की कोशिश करता है कि ईसा के बियांड भी कुछ था या ईसा भी एक देह का ही नाम था. क्या कोई भी, आदमी होने को फलांगकर अवतार पुरुष हो सकता है? क्या देह को रखकर बुद्ध या महावीर नहीं बना जा सकता है? मैं बुद्ध का या महावीर का अपमान किये बगैर यह बात कहना चाहता हूं कि क्या मनुष्य हुए बगैर सीधे-सीधे कोई ईश्वर हो सकता है?मुझे उपन्यास इसलिए अच्छा लगा कि लेखक क्राइस्ट के भीतर देह की तलाश क्राइस्ट के लिए नहीं अपने लिए करता है. यह क्राइस्ट की पूज्य छवि का ध्वंस नहीं है. यह वैसा ही है कि एक साधारण आदमी और बुद्ध के देह होने में अलग कहां होते हैं? यहां सेक्स और महानता दोनों प्रश्न की तरह हैं. क्राइस्ट तो एक बहाना है. क्राइस्ट को इस सच्चाई से छानकर देखना अपनी छुद्रता से मुक्त होना है. क्या भारतीयों ने श्रीमती इन्दिरा गांधी या लता मंगेशकर के जीवन में देह के अर्थ को सामने रखकर कभी कुछ लिखने की कोशिश की? महादेवी और मीरा के जीवन में भी देह है और वे उसे लांघकर कहां और किधर गईं? हम मिथ की मीरा या मिथ के क्राइस्ट या मिथ के महावीर को लांघकर उन्हें समझने की कोशिश करें, तो पायेंगे कि सेक्स के ऊपर कैसे उठा जा सकता है? क्या साधना के दौरान बोधिवृक्ष के नीचे बैठकर उन्हें यशोधरा का स्वप्न आया होगा कभी? मुझे तो यही लगता है कि मैं चुप-चुप हमेशा आदमी होने की सीमा से जूझता रहता हूं. और जूझकर वहां चला जाता हूं, जहां सिर्फ मैं ही अकेले नागरिक की तरह टहलता रहता हूं. मुझे तो लगता है द लास्ट टेम्पटेशन एक महान कृति का दर्जा चाहे हासिल न कर पाये, लेकिन क्राइस्ट के बहाने मनुष्य होने की पीड़ा को फलांगकर देखने की कोशिश है. कभी तुमको पढऩे भेजूंगा. प्रिय, कभी-कभी इच्छा होती है, तुम्हारा घर किताबों से भर दूं. कुछ किताबें मुझे ऐसी लगती हैं, जिनकी हर लाइन पढ़कर, उसकी व्याख्या करके तुम्हें बताना चाहता हूं. मैं अच्छा लेखक चाहे न बन पाऊं पर मैं एक बहुत गहरा पाठक बनना चाहता हूं. यह ज्ञान मुझे बहुत पहले प्राप्त हो गया था. तुम्हें खत लिख-लिखकर तो और भी ज्यादा. तुम मेरा बोधिवृक्ष हो, जहां मैं आंख मूंदकर चुपचाप बैठा रहता हूं. एक दिन मैं तुम्हारे पास आऊंगा. पुस्तकों का एक बड़ा सा गट्ठर लेकर. इससे प्यारी चीज तुम्हारे लिए क्या होगी. बाकी ठीक.
तुम्हारा……..

प्रेम पत्रों की अन्तिम कड़ी कल….

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