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Archive for May, 2009

> धरती खामोश। आसमान भी चुप. कहीं कोई आवाज नहीं. न हवाओं की ज़ुम्बिश, न परिंदों की सरगोशी ही. वादियां एकदम वीरान. जैसे सदियों से रखा हो मौन. पहाड़ ऊंचे-ऊंचे. आंख के इस छोर से, उस छोर तक पहाड़ ही पहाड़. एक घबराहट ही तारी होती महसूस हुई. जैसे कोई पहाड़ टूटकर गिरेगा अभी. जैसे यह वादियों की खामोशी गला ही दबा देगी मेरा भी. तभी एक आवाज सुनाई दी। कान खड़े हो गये. आवाजों के आदी कान, उस आवाज के लिए बेसब्र हो उठे।

अरे, यह तो मेरी ही धडकनों की आवाज थी। धक…धक…धक…कितने बरसों बाद यह आवाज सुनी थी. अपनी ही धड़कनों की आवाज शहरों के शोर में, आवाजों के सैलाब में गुम सी गई थी कहीं. या सच कहूं, हमने ही छुपा दिया था इन्हें सुभीते से बहुत अंदर कहीं. ताकि ये तो सुरक्षित रह ही सकें बाहरी सैलाब से. देखो ना, आज जब शोर के सैलाब की जगह खामोशी ने ली तो धड़कनों ने अपना आकार बढ़ाना शुरू किया. इनकी कारगुजारियां बढऩे वाली थीं. मुझे समझ में आ चुका था. वादियों में इन्होंने टहलना शुरू कर दिया था. अब ये मेरे बस के बाहर थीं।

खामोश वादियों में धड़कनें ही धड़कनें…अचानक वादियां गुलजार होती मालूम हुईं. जब धड़कनें आजाद हुईं तो मन भी आजाद हुआ और न जाने कितनी यादें…पहाड़ों से डर अब जरा कम हो रहा था, लेकिन दोस्ती अब तक नहीं हुई. जाने क्यों सदियों से वैसे के वैसे खड़े पहाड़ मुझे डराते हैं हमेशा से. बहरहाल, धड़कनों की दोस्ती वादियों से हो गई थी. चलने की बेला हुई तो नन्हे बच्चों सी रूठी धड़कनें साथ चलने को राजी ही नहीं हुईं. उन्हें तो यहीं रहना था. भला बताइये, जहां मेरा मन घबराता है, इन्हें वहीं बसना है. दिल की धड़कन से बगावत. अब क्या करूं? जाना तो है….

एक रास्ता है धड़कनों की आवाज आई।
एक हिस्सा यहीं छोड़ दो हमारा।
एक हिस्सा…?
मैं अचरज में।
हां, अपने मन के कितने हिस्से कहां-कहां छोड़ती फिरती हो, कहां-कहां अपने सपने रोपती फिरती हो, एक हिस्सा अपनी धड़कनों का नहीं छोड़ सकती क्या…?
धड़कनों ने मुझे आड़े हाथों लेना शुरू कर दिया था. मैं अब फंस चुकी थी. बुरी तरह से. कोई जवाब नहीं था. कोई भला अपनी धड़कनों से मुंह चुराए भी तो कैसे. तय हो गया. अपनी धड़कनों का एक छोटा सा हिस्सा मैं उन वादियों में ही छोड़ आई हूं।

मैं आ गयी हूं वापस. पता नहीं वापस कभी वहां जाऊंगी भी या नहीं लेकिन पता है कि मेरी तरह शरारती मेरी धड़कनें वादियों का सन्नाटा भंग करती रहेंगी. मैं रहूं ना रहूं जब भी कभी कोई मेरी धड़कनों की आवाज सुनना चाहेगा, उसे शिमला की वादियों में वो आवाज जरूर सुनाई देगी…
शिमला से लौटकर प्रतिभा

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>कबीर गर्व न कीजिए ऊंचा देख आवास
काल परौ भुंई लेटना ऊपर जमसी घास।

ज्यों नैनों में पुतली त्यों मालिक घट माहिं
मूरख लोग न जानहिं बाहिर ढूंढन जाहिं।

जब तू आया जगत में लोग हंसे तू रोए
ऐसी करनी न करी पाछे हंसे सब कोए।

पहले अगन बिरह की पाछे प्रेम की प्यास
कहे कबीर तब जाणिए नाम मिलन की आस।

कबीर यहु घर प्रेम का खाला का घर नाहिं
सीस उतारै हाथि करिसो पैसे घर माहिं।

माला तो कर में फिरे जीभ फिरे मुख माहिं
मनुआ तो चहुं दिश फिरे यह तो सिमरन नाहिं।

कबीर माला काठ की कहि समझावे तोहि
मन न फिरावै आपणां कहा फिरावे मोहि।

जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं
सब अंधियारा मिटि गया जब दीपक देख्या माहिं।

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>जैसे तिल में तेल है ज्यों चकमक में आग
तेरा सांई तुझ में है तू जाग सके तो जाग.

माया मरी न मन मरा मर -मर गए शरीर
आशा तृष्णा न मरी कह गए दास कबीर।

कबिरा खड़ा बाजार मेंमांगे सबकी खैर
ना काहू से दोस्तीना काहू से बैर।

कबीर मन निर्मल भया, जैसे गंगा नीर
पाछे -पाछे हरि फिरे कहत कबीर-कबीर।

पोथी पढि़-पढि़ जग मुआपंडित भयो न कोई
ढाई आखर प्रेम के जोपढ़े सो पंडित होए।

दु:ख में सिमरन सब करें,सुख में करे न कोय
जो सुख में सिमरन करे,तो दु:ख काहे को होय।

अकथ कहानी प्रेम की कछु कही न जाय
गूंगे केरी सरकरा बैठे मुस्काय।

चिंता ऐसी डाकिनी काट कलेजा खाए
वैद बिचारा क्या करे, कहां तक दवा लगाए।

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> कबीर उनमें से हैं जिन्हें पढऩा हमेशा सुकून देता है। बेहद सामयिक, सुलझा, सरल काव्य. कबीर के करीब जाने पर ज्ञान और सुकून की गंगा बहती नज़र आती है. फिलहाल कुछ दोहे-

बुरा जो देखन मैं चलाबुरा न मिलया कोए
जो मन खोजा आपणा तोमुझसे बुरा न कोए।

धीरे-धीरे रे मना धीरे सब कुछ होए
माली सींचे सौ घढ़ा ऋतु आए फल होए।

चलती चक्की देखकर दिया कबीरा रोए
दुई पाटन के बीच में साबुत बचा न कोए।

काल करे सो आज कर आज करे सो अब
पल में परलय होयेगीबहुरी करोगे कब।

ऐसी वाणी बोलिए मन का आपा खोए
अपना तन शीतल करे औरन को सुख होए।

सांई इतना दीजिए जा में कुटुम्ब समाए
मैं भी भूखा न रहूं साधू न भूखा जाए।

बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर
पंछी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर।

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> देखो,
आहिस्ता चलो

और भी आहिस्ता जरा
देखना, सोच समझकर
जरा पांव रखना
जोर से बज न उठे
पैरों की आवाज कहीं
कांच के ख्वाब हैं
बिखरे हुए तनहाई में
ख्वाब टूटे न कोई
जाग न जाये देखो
जाग जायेगा कोई ख्वाब
तो मर जायेगा….
– गुलज़ार

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> एक दिन एक पत्रकारिता के विद्यार्थी ने सवाल किया था किताबों को पढऩे के सलीके को लेकर. उसे जवाब देने के बाद कुछ लिखा भी था. इन दिनों रवीन्द्र व्यास जी के ब्लॉग पर किताबों पर सीरीज चल रही है। किताबों के बारे में एक छोटा सा नोट मेरा भी बिना किसी लाक्षणिकता के, कलात्मकता के….प्रतिभा

अकसर हम किताबों के पास जाते हैं, उन्हें खोलते हैं, पढऩे की कोशिश करते हैं लेकिन किताबें हमें धक्का मारकर दूर कर देती हैं। पूरी पढ़े बिना ही लौट आना पड़ता है. हम तुरंत यह बयान ज़ारी कर देते हैं, उसमें पठनीयता का संकट है. मजा नहीं आया. कुछ खास नहीं है. पढ़ा ही नहीं पाई अपने आपको. दरअसल, बात कुछ और होती है। हमारे भीतर पात्रता ही नहीं होती उन किताबों के भीतर पहुंच पाने की. किताबों का अपना एक संसार होता है, शिल्प होता है, विचार होता है वहां तक पहुंचने की पात्रता तो ग्रहण करनी ही पड़ेगी ना? मुझे याद है जब मैंने पहली बार अन्ना कैरेनिना पढ़ी थी. खूब तारीफ सुनी थी अन्ना की. एक हड़बड़ी सी थी जल्दी से पढऩे की. अन्ना ने मुझे पात्रता नहीं दी. मैं पढ़ तो गई पूरी लेकिन काफी मशक्कत के साथ. बार-बार वो मुझसे दूर जाती और मैं उसे खींचकर आंखों के सामने ले आती. कई बरस बाद फिर से जब अन्ना को उठाया तो इस बार किसी कल-कल की ध्वनि के साथ वह उतरती ही चली गई भीतर कहीं। मुझे कारण समझ में आ चुका था. किताबें भी सुपात्र ढूंढती हैं. ऐसा नहीं कि आयेगा कोई भी उठा लेगा और पढ़ ही लेगा. अगर पढ़ लिया भी तो क्या पूरा ग्रहण कर पायेगा. सचमुच हमें पढऩे के लिए सुपात्र बनना ही होगा और इसके लिए फिर किताबों के पास ही जाना पड़ेगा. एक लंबी प्रक्रिया से गुजरने के बाद ही हम सुपात्र हो पाते हैं. अगर हम सुपात्र हैं तो किताबें दोनों बाहें पसारकर हमारा स्वागत करती हैं और हमें अपना लेती हैं. वरना हम दरवाजा खटखटाते हैं, बार-बार जबरन अंदर प्रवेश करने की कोशिश करते हैं और एक अनमनी सी नाकामी के साथ लौट आते हैं. कई बार किताबें खुद चलकर भी हमारे पास आती हैं. बुक शेल्फ से हमारी ओर देखती हैं एक आवाज सी आती है, आओ हमें उठाओ, पढ़ो. हम उन्हें उठा लेते हैं. फिर से उसके सुख में जीने लगते हैं.

नोट: हर छपी हुई चीज किताब (रचना) नहीं होती.

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>पूरा दु:ख और आधा चाँद
हिज्र की शब और ऐसा चांद

किस मकतल से गुजऱा होगा
ऐसा सहमा-सहमा चांद

यादों की आबाद गली में
घूम रहा है तनहा चांद

मेरे मुंह को किस हैरत से
देख रहा है भोला चांद

इतने घने बादल के पीछे
कितना तनहा होगा चांद।

मकतल- जहां वध किया जाता है

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>चिराग मांगते रहने का कुछ सबब भी नहीं
कैसे बताये कि अब तो शब भी नहीं

जो मेरे शेर में मुझसे जियादा बोलता है
मैं उसकी बज्म में इक हर्फ-ए-जेर-ए-लब भी नहीं

और अब तो िजन्दगी करने के सौ तरीके हैं
हम उसके हिज्र में तनहा रहे थे जब भी नहीं

कमाल शख्स था जिसने मुझे तबाह किया
खि़लाफ उसके ये दिल हो सका है अब भी नहीं

ये दु:ख नहीं कि अंधेरों से सुलह की हमने
मलाल ये है कि अब सुबह की तलब भी नहीं

—————————————–
चेहरा मेरा था निगाहें उसकी
खामोशी में भी वो बातें उसकी

मेरे चेहरे पे गजल लिखती गयीं
शेर कहती हुई आखें उसकी

शोख़ लम्हों का पता देने लगीं
तेज होती हुईं सांसें उसकी

ऐसे मौसम भी गुजारे हमने
सुबहें अपनी थीं, शामें उसकी

ध्यान में उसके ये आलम था कभी
आंख महताब की, यादें उसकी

रंग जोइन्दा वो, आये तो सही
फूल तो फूल हैं, शाखें उसकी

फैसला मौज-ए-हवा ने लिक्खा
आंधियां मेरी, बहारें उसकी

खुद पे भी खुलती न हो जिसकी नजर
जानता कौन जबाने उसकी

नींद इस सोच से टूटी अक्सर
किस तरह कटती हैं रातें उसकी

दूर रहकर भी सदा रहती हैं
मुझको थामे हुए बांहें उसकी
जोइन्दा- जिज्ञासु

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>इश्क में भी मरना इतना आसान नही
जात को रद करना, इतना आसान नहीं

मुझमें ऐसी ही खामी देखी उसने
तर्क-ए-वफा वरना इतना आसान नहीं

एक दफा तो पास-ए-मसीहा कर जाये
जख़्म का फिर भरना इतना आसान नहीं

जाने कब शोहरत का जीना ढह जाये
पांव यहां धरना इतना आसान नहीं

मरने की दहशत तो सबने देखी है
जीने से डरना इतना आसान नहीं
जात- अस्तित्व
रद्- निरस्त
—————————————
क्या करे मेरी मसीहाई भी करने वाला
जख़्म ही ये मुझ लगता नहीं भरने वाला

उसको भी हम तिरे कूचे में गुजार आये हैं
िजन्दगी में वो जो लम्हा था संवरने वाला

उसका अंदाज-ए-सुखन सबसे जुदा था
शायद बात लगती हुई, लहजा वो मुकरने वाला

दस्तरस में हैं अनासिर के इरादे किस के
सो बिखर के ही रहा कोई बिखरने वाला

इसी उम्मीद पे हर शाम बुझाये हैं चिराग
एक तारा है सर-ए-बाम उभरने वाला।

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24 नवंबर 1952 में पाकिस्तान में जन्मी परवीन शाकिर के
अल्फाज की खुश्बू से सारी दुनिया अब तक महक रही है.

अक्स-ए-खुशबू हूं, बिखरने से न रोके कोई
और बिखर जाऊं तो मुझको न समेटे कोई

कांप उठती हूं मैं ये सोचकर तनहाई में
मेरे चेहरे पर तिरा नाम न पढ़ ले कोई

जिस तरह ख्वाब मिरे हो गये रेजा-रेजा
उस तरह से न कभी टूट के बिखरे कोई

मैं तो उस दिन से हिरासां हूं कि जब हुक्म मिले
खुश्क फूलों को किताबों में न रक्खे कोई.

अब तो इस राह से वो शख्स गुजरता ही नहीं
अब किस उम्मीद पे दरवाजे से झांके कोई

कोई आहट, कोई आवा$ज, कोई चाप नहीं
दिल की गलियां बड़ी सुनसान हैं, आये कोई.

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