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Archive for February, 2010

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फूले ढेर पलाश तो लगा होली है
मचने लगा धमाल तो लगा होली है,
गोरी हुई उदास तो लगा होली है
पलकों पे सजी आस तो लगा होली है…

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ज्योति नंदा
‘माय नेम इज खान’ के रिलीज़ के एक हफ्ते बाद दर्शकों की प्रतिक्रिया स्वरुप एक अखबार में ३ स्टार दिए गए, जबकि पूरे मीडिया फिल्म आलोचकों ने इसे 5 या 4 स्टार से अलंकृत किया था. एक आम दर्शक की भाँति ही मुझे भी समझ में नहीं आया कि ऐसा इस फिल्म में क्या नवीन और अद्भुत है,जो अब से पहले कभी नहीं कहा और दिखाया गया. यदि इस फिल्म से अमेरिकी परिवेश और नज़रिया हटा दिया जाय तो यह एक औसत दर्जे की फिल्म है.

आम आदमी द्वारा आतंकवाद की पीड़ा को भोगे जाने पर हिंदी सिनेमा में ढेरों कहानियां बनायीं हैं,जो माय नेम इज खान से कहीं बेहतर और सशक्त हैं. अच्छा इन्सान बुरा इन्सान, बुरे पर अच्छे की जीत, नेकी बदी हमारी संस्कृति में यह बातें मिटटी की खुशबू की तरह घुली हुई हैं. 1947 से हम यही कहते चले आ रहे हैं.ज्यादा पीछे जाने की जरुरत नहीं है. पिछले साल आई अ वेडनेसडे कहीं ज्यादा सशक्त फिल्म है, जो बयां करती है हर उस इन्सान के दर्द को जो किसी भी मज़हब का है और बन रहा है शिकार कुछ बुरे लोगो के वहशीपन का.

नंदिता दास के निर्देशन में बनी फिल्म फिराक इस लिहाज़ से बेहतरीन फिल्म है, जो डील करती है गुजरात में हुए दंगो के बाद के बदले हुए सामजिक ताने-बाने से.इसमें एक माँ है, जो सबकी नज़र से बचा कर दंगों में अनाथ हुए मुस्लिम बच्चे को अपने घर में पनाह देती है. मध्यम वर्गीय दंपत्ति हैं-बिलकुल रिजवान खान और मंदिरा की तरह जो कभी अपनी पहचान छुपाते नज़र आते है तो कभी हालात से लड़ने की हिम्मत जुटाते हुए दिखते हैं.

रिजवान खान कहता है कि सिर्फ उसके नाम की वजह से उससे नफरत मत करो.यह सन्देश अमेरिका के लिए ही हो सकता है.जो 9/11 के बाद इतनी नफरत उगल रहा है कि पूरी दुनिया इसमें जल रही है. हमारे लिए मुसलमानों से नफरत कर पाना इतना आसान और सीधा नहीं है.हम शताब्दियों से मिलजुल कर रहे हैं. आज भी दिवाली और ईद एक ही महीने में मानते है. 1992 के मुंबई धमाके से दहल गयी दुनिया लेकिन तारीख नहीं बदली. तारीख तब इतिहास बनी जब अमेरिका ने आतंकवाद का स्वाद चखा.अमेरिका के नजरिये से आहत खान सच्चाई का रास्ता नहीं छोड़ता. तूफ़ान में फंसे अमेरिकियों की मदद करने पहुँच जाता है.भारत में जब जब साम्प्रदायिकता की आग भड़की है, तब तब मानवीय संवेदनाओं को जगाने और झकझोरने वाले कितने उदाहरण मिलते हैं, जो कितनी भी नफरत हो अच्छे का साथ नहीं छोड़ते. हम ऐसे किस्सों से रोज़ दो चार होते है.खान कुछ भी अनूठा नहीं करता. कहने का अर्थ यह नहीं कि उसे ऐसा नहीं करना चाहिए. किसी फिल्म में ऐसे मोड़ परिस्थितियां पहली बार नहीं है.यह एक घिसीपिटी सिचुएशन है.

किसी एक का नजरिया पूरी दुनिया की सोच कैसे बन सकती है.उसे अन्तरराष्ट्रीय नजरिया और फिल्म भी करार दिया गया है.अन्तरराष्ट्रीय होने का पैमाना यही रह गया है.अमेरिका में जाकर फिल्म बनाएं, उनके राष्ट्रपति की तारीफ़ कीजिये.जबकि सही मायनों में 9/11 के बाद कोई फिल्म इस्लाम को सही ढंग से समझने की कोशिश करती है तो वह है पाकिस्तानी फिल्म खुदा के लिए.खान अपने धर्म को गलत अर्थो में समझने पर एक दृश्य में बयां करता है.खुदा के लिए न सिर्फ अमेरिकी ज्यादतियों को दर्शाती है बल्कि पढ़े लिख मुस्लिम नौजवानों को किस तरह बहकाया जाता है, इस पर भी रौशनी डालती है.खान की भाभी अपमानित होने पर कहती है कि हिजाब उसका वजूद है. इस संवाद का क्या मतलब है. इस्लाम में हिजाब ही औरत का वजूद है. जबकि खुदा के लिए की नायिका अपने हक के लिए पूरे कट्टरपंथी समाज से लड़ जाती है.कानूनी लड़ाई में हदीस की आयतों का एक ज़हीन मौलाना द्वारा सही इन्टरपिटेशन कर झूठे बदनियतों को मुंहतोड़ जवाब देती है.

माय नेम इज खान देखने के बाद ज़हन में रह जाता है एक माँ का दर्द और औटिस्टिक खान की मासूमियत.जो अपनी इमानदारी से कभी हंसाता है रुलाता और अचंभित भी करता है,जो खुद इन सारे भावों को व्यक्त नहीं कर पाता.और यही रोमांटिसिज्म शायद शाहरुख़ खान के फैन को भाता है. लेकिन इस बार मीडिया भी शाहरुख़ के मोहपाश में बंधा नज़र आता है.

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>हर मंज़िल इक मंज़िल है नयी और आख़िरी मंज़िल कोई नहीं
इक सैले-रवाने-दर्दे-हयात और दर्द का साहिल कोई नहीं

हर गाम पे ख़ूँ के तूफ़ाँ हैं, हर मोड़ पे बिस्मिल रक़्साँ हैं
हर लहज़ा है क़त्ले-आम मगर कहते हैं कि क़ातिल कोई नहीं

– अली सरदार जाफरी

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– प्रवीण शेखर
मैं तुम्हें प्रेम करना चाहता था/ जिस तरह से तुम्हें किसी ने नहीं चाहा/ तुम्हारे भाई, पिता, मां और तुम्हारे चारों तरफ के वे तमाम लोग/ जिस तरह से तुम्हें नहीं चाह सके/ मैंने चाहा था तुम्हें उस तरफ से चाहना/ चांद-सितारों की तिरक्षी पड़ती रोशनी में/ दिप-दिप हुआ तुम्हारा चेहरा/ बहुत करीब से देखना.

जिस्म और रूह को भिगो देने वाली मुहब्बत की बारिश को सुखा देती है गर्म हवा. ऐसी हवाओं के बीच प्रेम करने की चाह और चाह को प्रेम में तब्दील करना घटना ही तो है, क्योंकि प्रेम को बाहर की नर्माहटें पालती हैं, यह रेशम के झूले पर एक जोड़ा हंसी बनकर निखरता है. प्रेम रंगों में देखना, खूशबू से सोचना, सुरों में महसूसना सिखाता है.
जब प्रेम को सबसे सॉफ्ट टार्गेट मानकर घायल किया जा रहा हो, जब संस्कृति के सिपाही प्रेम को क्राइम एण्ड पनिशमेंट की बेडिय़ों में जकड़ रहे हैं, जब प्रेम समाज विरोधी कृत्य बनाया जा रहा हो, जब हर कोई क्लाउडियस बनने पर आमादा हो, तो कितना जरूरी हो जाता है प्रेम की बात करना, उसे जीना और प्रेम करना. और तब कितना गैर जरूरी हो जाता है प्रेम के प्रतिरोधों को न$जरअंदाज करना.

प्रेम अपना अलग संसार बनाता है, यह प्रति संसार होता है. अपनी खूबी से यह जब चाहे मौसम को बदल दे, सर्दियों में लू के थपेड़े चलें या गर्मियां बर्फ की सर्दी के नीचे दुबक जायें. यह चाहे तो अमावस की रात जगमग कर दे या पूर्णमासी की रात अंधेरी हो जाये. प्रेम संसार की इस खूबी को लोग मनमानापन मानते हैं. कौन समझेगा यूरोपीय रेनेसां का महान कवि दांते और बिएट्रिस के प्रेम को? चौबीस साल की उम्र में (८ जून १९२०) को बिएट्रिस को देखा था. वह लम्हा विश्व साहित्य के इतिहास की महान प्रेरणा और अद्भाुत गाथा बन गया. बिएट्रिस की मौत ने दांते को बदल दिया. उस लम्हे और बिएट्रिस के अप्रतिम सौंदर्य को दांते $िजन्दगी भर जीते रहे. उसी प्रेम का परिणाम डिवाइन कॉमेडी जैसी अमर रचना थी. प्रेम के उदात्तीकरण का असर इतना गहरा होता है कि यह विफलता के बावजूद धड़कता हुआ इमोशनल स्पेस देता है. इसकी अपूर्णता मन को सालती है लेकिन वेदना और संकल्प जीवन के दस्तावेज बन जाते हैं जैसे बम से तबाह हो चुके वियतनाम में दान कान्ह और निशीना शांजो का प्रेम उनकी मौत के बाद भी धड़क रहा है.

रोमन कवि ओविड (४३ बीसी-१७ एडी) ने एक प्रेमकथा को लिखने का विषय बनाया. मूर्तिकार पिगमैलियन यूनान का बेहद खूबसूरत मर्द था. वह आइवरी, ब्रान्ज मॉरवलकी एक से बढ़कर एक सुन्दर मूर्तियां तराशता और लोग उसके फन के जादू में समा जाते. सारे यूनान की लड़कियां उस पर जान देती थीं, लेकिन पिगमैलियन के दिल के करीब कभी कोई लड़की आ ही नहीं पाती थी. अपनी कला के प्रति समर्पित पिगमैलियन सौंदर्य का सच्चा पुजारी था और उसी सौंदर्य का अंकन मूर्तियों में करना चाहता था. इसलिए उसकी हर मूर्ति सौंदर्य को रीडिफाइन और रीइंटरप्रेट करती. उसने आइवरी की ऐसी मूर्ति बनानी शुरू की जो खुद में कम्पलीट हो. मूर्ति बन गई. वही उसकी आइडियल ब्यूटी थी. उसने मूर्ति का नाम दिया गैलेटिया. पिगमैलियन उसे अपलक निहारता रहा, जब उसकी पलकों ने अपने दरवराजे बन्द किये तो वह उसी के ख्वाबों के साथ लिपटा रहा. जब उसने आंखें खोलीं तो उस दिन यूनान में प्रेम और सौंदर्य की देवी एफ्रोडाइट की उपासना का दिन था. पिगमैलियन पूजाघर गया और देवी एफ्रोडाइट से दुआ की कि गैलेटिया में रूह और $िजन्दगी आ जाए. देवी की आंखों से रोशनी की लकीर निकलकर फिजां में समा गई. वह घर लौटा तो देखा कि देवी अपना काम कर चुकी हैं. मूर्ति गैलेटिया स्त्री रूप में पैडेस्टल से नीचे उतरी और पिगमैलियन को बाहों में भर लिया. उसका कोमल आलिंगन, गर्माहट, नर्म छुअन को वह हमेशा जीता रहा, गढ़ता रहा, रचता रहा सौंदर्य के नये-नये प्रतिमान. ऐसी चाह एफ्रोडाइट जैसी उदारता, गैलेटिया जैसा प्रेम, उसकी नर्म छुअन के लिए ह$जार-ह$जार वैलेन्टाइन्स डे चाहिए, रोज चाहिए.

(लेखक इलाहाबाद के सक्रिय रंगकर्मी हैं. उनका अपना थियेटर ग्रुप बैकस्टेज है)

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एक याद
सपने की मानिंद
उतरती है
रोज पलकों में,
नींद की चाप
सुनते ही
पंखुड़ी सी खुलने लगती है
आंखों में
रात भर गुनगुनाती है
मिलन के गीत,
दिखाती है सुंदर सपने
जिनमें होते हैं
न धरा, न आकाश
न फूल कोई, न मौसम
न पहाड़, न नदियां
बस एक टुकड़ा मैं
और एक टुकड़ा तुम.
हर सुबह
मैं इसे ख्वाब का
नाम देती हूं.

– प्रतिभा

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