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Archive for February 5th, 2010

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एक याद
सपने की मानिंद
उतरती है
रोज पलकों में,
नींद की चाप
सुनते ही
पंखुड़ी सी खुलने लगती है
आंखों में
रात भर गुनगुनाती है
मिलन के गीत,
दिखाती है सुंदर सपने
जिनमें होते हैं
न धरा, न आकाश
न फूल कोई, न मौसम
न पहाड़, न नदियां
बस एक टुकड़ा मैं
और एक टुकड़ा तुम.
हर सुबह
मैं इसे ख्वाब का
नाम देती हूं.

– प्रतिभा

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