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Archive for May, 2010

> फिल्म समीक्षा लिखना मेरा काम नहीं लेकिन पढ़ती जरूर हूं. पढऩे के बाद अक्सर इस नतीजे पर पहुंचती हूं कि अगर रिव्यू फिल्म को हिट बता रहे हैं तो फिल्म मेरे देखने लायक नहीं है जैसे-माई नेम इज खान, बदमाश कंपनी, हाउसफुल वगैरह. सिर्फ कुछ हालिया फिल्मों के नाम लिये हैं जानबूझकर. लेकिन जिन फिल्मों को रिव्यू पिटा हुआ बता दें उन्हें देखने जाया जा सकता है. ऐसा करना मैंने प्रयोग के तौर पर शुरू किया था जो अब तक लगभग सफल ही जा रहा है. मैं फिल्म क्रिटिक्स पर सवाल नहीं उठा रही हूं सिर्फ अपनी पसंद की बात कर रही हूं. यही प्रयोग फिर एक बार सफल हुआ.
इस बार फिल्म थी काइट्स. लगभग सारे रिव्यू गला फाड़कर कह रहे थे कि फिल्म स्लो है, बोर है, कुछ नया नहीं है. सिर्फ डेढ़ या दो स्टार पा सकने वाली यह मूवी मुझे तो अच्छी लगी. और मैं रितिक रोशन की फैन भी नहीं हूं. अनुराग बासु ने इस लव स्टोरी को बहुत प्यार से बनाया है. कसा हुआ निर्देशन, चुस्त एडिटिंग, कमाल की सिनेमेटोग्राफी बांधे रखती है. रितिक और बारबरा की कैमेस्ट्री हो या कंगना और कबीर बेदी की प्रेजेंस सब कुछ परफेक्ट. फिल्म की लोकेशन कमाल की हैं. समुद्र के भीतर दर्शाये गये दृश्यों का तो जवाब ही नहीं. शायद ही कोई फिल्म हो जिसमें आई लव यू का इस्तेमाल न हो. लेकिन इस फिल्म में इन शब्दों का इस्तेमाल हर बार फिल्म में जान डाल देता है. बारबरा को न हिंदी आती है न अंग्रेजी. वो सिर्फ स्पेनिश बोलती है और समझती है. रितिक को स्पेनिश नहीं आती. (हालांकि दोनों एक-दूसरे की भाषाओं को पकडऩे की कोशिश करते हैं.) भाषाओं के पार दोनों किस तरह एक-दूसरे से कम्युनिकेट करते हैं यह देखने लायक है. फिल्म एक दूजे के लिए की याद ताजा हो जाती है.
ये लव स्टोरी, फूलों, पहाड़ों और झरनों के इर्द-गिर्द नहीं घूमती बल्कि गोले-बारूद, और जान बचाने की जद्दोजेहद के बीच जन्म लेती है और परवान चढ़ती है. एक-एक सांस के लिए तरस रहे घायल प्रेमी से जब उसकी प्रेमिका आंखों में सारी भावनाएं भरकर कहती है आई लव यू तब ये शब्द किसी मरहम से कम नहीं लगते. हां, फिल्म में बेहतर संगीत की गुंजाइश जरूर छूट गयी सी लगी. जिंदगी दो पल की…यही गाना गुनगुनाने को है.

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मौसम कुछ ज्यादा ही मेहरबान था. हवायें इठला-इठलाकर चल रही थीं. सूरज नदी में उतर रहा था, आहिस्ता-आहिस्ता. लड़का खुश था. लड़की भी खुश थी. दोनों नदी में पांव डाले बैठे थे. लड़की कंकड़ मारकर नदी की धार में व्यवधान डाल रही थी. मुस्कुरा रही थी. देखो वो मैं हूं. लड़की ने शरारत से मुस्कुराकर लड़के से कहा.
कहां?
लड़के ने पूछा.
वहां नदी की उस धार में.
देखना वहां..ऐ…ऐ…ऐ…छप्पाक.
वहां…देखो, देखो. वो खिलखिला उठी.
हवाओं में संगीत घुल गया. लड़का खुश था. उसने नदी की तरफ नहीं देखा, लड़की की ओर देखा. उसने कहा मैं तो कबसे कहता था, तुम नदी हो. तुम मानती ही नहीं थी. लड़के की आंखों में अभिसार घुल रहा था. लड़की नाराज हो गयी. मैंने वहां देखने को कहा, यहां नहीं. उसने फिर से छोटी सी कंकड़ी उछाल दी नदी की ओर. लड़का हंस दिया. तुम्हें ही तो देखना है ना? यहां देखूं या वहां. क्या फर्क पड़ता है. लड़का मुग्ध भाव से लड़की के चेहरे की ओर देख रहा था. लड़की अनमनी हो गई. उसने अपने हाथों से लड़के का चेहरा घुमाया नदी की ओर. उंगली से इशारा किया, वहां देखो. वहां…..
वहां…उसने लड़के की आंख को इस बार कंकड़ी में लपेटकर नदी में फेंका. छप्पाक्….कंकड़ी डूब गयी नदी में. नदी का प्रवाह रुका $जरा देर फिर धीरे-धीरे सामान्य होने लगा. नदी फिर एक धार में बहने लगी. लड़की हंसने लगी. देखा मैं नदी हो गयी. कैसी बही जा रही हूं…है ना?
लड़की का बचपन उसकी हंसी में खिल उठा था. उसने अपनी उम्र और समझदारी को उतारकर किनारे रख दिया था.
आओ चलें…
लड़की ने लड़के से कहा.
कहां? लड़के ने आश्चर्य से पूछा.
वहां…उसने नदी के बीचोबीच इशारा किया.
अरे, नहीं. भीग जायेंगे.
नहीं भीगेंगे…
पागल हो क्या. नदी में उतरेंगे और भीगेंगे नहीं. कोई जादू है क्या?
है ना मेरे पास जादू. तुम चलो तो सही.
अरे नहीं. तुम भी ना?
मुझे तैरना नहीं आता.
डूबना तो आता है ना?
डूबने में आना क्या होता है. तैरना न जानो तो डूबना ही तो है.
हा…हा…हा…लड़की जोर से खिलखिला पड़ी. नदी के किनारे न जाने कौन से पेड़ थे, जिन पर नन्हे-नन्हे गुलाबी फूल लदे हुए थे. फूल धीरे-धीरे धरती पर गिर रहे थे. महक भी रहे थे. लड़की पर भी कुछ फूल गिरे थे. लड़के पर भी. लेकिन लड़की जब जोर से खिलखिलाई तो उसकी खिलखिलाहट फूलों पर भारी पडऩे लगी. एक संगीत सा घुलने लगा फिजाओं में.
पगले हो तुम. लड़की ने लड़के के गालों पर मीठी सी चपत लगाई. तैरना तो आसान होता है, डूबना बहुत मुश्किल.
डूबना जतन से सीखना होता है. कितने प्यार से, कितनी खामोशी से, कितने स्नेह से, कितने अरमानों से कितनी मोहब्बत से डूबते हैं आप. जो डूबना हो तो इतने सुकून से डूबो कि आसपास की लहरों को भी पता न चले…
लड़की गुनगुनाने लगी. उसने नदी में डूबे हुए पैरों से पानी को उछालना शुरू किया.
देखो यार, ये फालतू बातें ना किताबों में अच्छी लगती हैं. सच्ची बात यही है कि अगर हम इस नदी में गये तो डूब जायेंगे…मर जायेंगे. किसी को बताने के लिए बचेंगे भी नहीं कि कितनी मोहब्बत से डूबे थे, कितने सुकून से.
तुम जरा किताबें कम पढ़ा करो. कवितायें तो बिलकुल मत पढ़ा करो. लड़का भन्ना उठा था. वो लड़की को गंभीरता से ताकीद कर रहा था. लेकिन लड़की सुन नहीं रही थी.
अरे, सुनो. देखो नदी का पानी गुनगुना हो रहा है क्या?
लड़की ने बात पलट दी. वह बहस में पडऩा नहीं चाहती थी.
पानी गुनगुना?
अब ये क्या नाटक है? लड़के ने मन ही मन सोचा. लेकिन प्रत्यक्ष में उसने मुस्कुराकर कहा, हां कुछ हुआ तो है.
क्या हुआ है?
लड़की भांप गई लड़के की चालाकी.
पानी…
गुनगुना…
लड़के ने शांति से जवाब दिया.
काहे का पानी. लड़की ने बच्चों की तरह एक हाथ कमर पर रखकर दूसरे हाथ को हवा में लहराकर पूछा?
अरे बॉटल का पानी. सुबह से रखे-रखे गर्म हो गया. प्यास लगी है ना तुम्हें?
लड़के ने सफाई दी.
हो…हो…हो…लड़की फिर हंस पड़ी जोर से. मुझे प्यास लगी है?
मैं नदी हूं बुद्धू. न…दी…नदियां प्यास बुझाती हैं.
उनकी प्यास कोई नहीं बुझाता.
कोई नहीं.
लड़की का स्वर मद्धिम पड़ गया.
तो कौन सा पानी गर्म होने की बात कर रही थीं तुम?
लड़का उसे वर्तमान में लौटा लाया.
नदी का.
गर्म नहीं गुनगुना. लड़की वापस लौट आई. आज वह उदासी के खोहे में जाना भी नहीं चाहती थी.
उधर देखो बुद्धू…उधर.
लड़की ने लड़के को नदी के दूसरे छोर पर दूर निशाना बनाते हुए देखने को कहा.
सूरज धीरे-धीरे नदी में उतर रहा था.
इस समय गहरे सिंदूरी रंग का सूरज का थोड़ा सा हिस्सा नदी में डूबा था, बाकी बाहर था.
लड़का मुग्ध होकर देखने लगा कुदरत का खूबसूरत न$जारा. बेहद खूबसूरत.
गजब…लड़के ने कहा.
बहुत सुंदर है ये तो.
है ना?
लड़की कुछ इस तरह खुश हुई मानो सूरज उसका ही हो और उसने ही डुबोया हो उसे नदी में. मानो कुदरत के इस नजारे को उसने ही गढ़ा हो.
ये जलता हुआ सूरज जब नदी में उतर रहा है तो नदी का पानी भी तो थोड़ा सा गुनगुना होगा ना?
महसूस करो…अपने पैरों में पानी की गुनगुनाहट.
क्या है…तुम ये अपनी फर्जी की कविताई बंद करोगी. नदी का पानी गर्म हो गया है.
अरे यार, अच्छा हुआ तुम साइंटिस्ट न हुईं वरना ग्लोबल वार्मिंग की दशा, दिशा और उसके कारण सब बदल जाते.
हूं…..और?
लड़की गंभीर होने लगी.
और क्या?
और क्या-क्या अच्छा हुआ जो मैं न हुई?
मतलब?
मतलब अगर मैं पॉलीटिशयन होती तो?
तो…तो क्या संसद में कविताएं पढ़ी जातीं भाषण की जगह. पेड़, समंदर, नदी, पहाड़ यही सब कहा-सुना जाता वहां भी.
खेत, खलिहान, पगडंडी, अलाव, चूल्हा, रोटी, चिडिय़ा, धान, मुस्कुराहटें, उगता हुआ सूरज, चमकीली रातें यह सब होता ना उन कविताओं में?
लड़की ने पांव पानी में से निकाल लिये.
हां….आं….
लड़के को और कुछ कहते ना बना. कविताओं में यह सब तब ही तो होता है जब जीवन में होता है या होने की कल्पना होती है. तो अगर संसद में पढ़ी जातीं कविताएं तो बुरा क्या होता. कम से कम फेंकी तो न जातीं कुर्सियां. दी तो न जातीं गालियां. विपक्ष की कविता और सत्ता की कविताओं पर बात होती है. देशकाल, समाज मुस्कुराता. कितना अच्छा होता ना?
लड़की फिर मुस्कुरा दी.
और…?
लड़की ने पूछा?
क्या और?
लड़के ने कहा.
और क्या ना हुई तो अच्छा हुआ?
अरे यार, तुम तो पीछे ही पड़ गईं. फिलहाल तो यही सोच रहा हूं कि तुम लड़की न होतीं तो…
तो?
तो मैं यहां तुम्हारी फिलॉसफी न झेल रहा होता.
लड़का जोर से हंस पड़ा.
हूं…तो आप हमें इसलिए झेलते हैं क्योंकि मैं लड़की हूं. लड़की ने दुपट्टे से अपने पांव पोंछते हुए कहा.
ये लो इसमें क्या शक है. तुम लड़की ना होती तो मैं तुम्हें प्यार थोड़ी ना करता. मैं नॉमर्ल लड़का हूं यार. लड़का शरारत से मुस्कुराया.
जानती हूं.
एक लड़के का लड़की से प्यार करना ही तो नॉमर्ल है. है ना?
हां, और लड़की का लड़के से प्यार करना भी. लड़के ने कहा.
लड़के को अब तक लड़की के इ$जहारे मोहब्बत का इंतजार था. हालांकि हां समझने भर को काफी कुछ था उसके पास. फिर भी इंतजार था उसे.
लड़की का लड़के को प्यार करना…
हूं…लड़की ने अब अपने पांव में पर्स ने क्रीम निकालकर मलना शुरू कर दिया था. उसके सर पर एक फूल गिर पड़ा था, जिसे लड़का जानबूझकर हटाना नहीं चाहता था.
जो लड़के नदी में डूबना नहीं चाहते. जो डूबना नहीं जानते, भला नदी कैसे उन्हें प्यार करेगी. बोलो तो?

लड़के ने चौंककर देखा लड़की की ओर.
बोला कुछ नहीं.
नहीं समझे.
नहीं?
तो मत समझो…लड़की फिर खिलखिला पड़ी. उसने पर्स उठाया. वो चल पड़ी. लड़का भी उसके पीछे-पीछे चल पड़ा. सूरज इत्मीनान से नदी में डूबता रहा.

– प्रतिभा कटियार

(17 मई को दैनिक जागरण में प्रकाशित)

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>Photo- Atul hundoo

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>सचमुच कई बार भद्र लोगों से बात करना, दीवार पर सर मारने जैैसा मालूम होता है. इनसे बात करना, हर बार खुद को लहूलुहान करने जैसा ही तो होता है. ऐसे में बना रहे बनारस पर शुभा की यह कविता दिखी. लगा कि सब कुछ कह दिया इस छोटी सी कविता ने-

सवर्ण प्रौढ़ प्रतिष्ठित पुरुषों के बीच
मानवीय सार पर बात करना
ऐसा ही है
जैसे मुजरा करना
इससे कहीं अच्छा है
जंगल में रहना
पत्तियां खाना और
गिरगिटों से बातें करना
-शुभा

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असली इन्सान की तरह जियेंगे

कठिनाइयों से रीता जीवन
मेरे लिए नहीं

नहीं, मेरे तूफानी मन को यह नहीं स्वीकार
मुझे तो चाहिए एक महान ऊंचा लक्ष्य
और उसके लिए
उम्र भर संघर्षों का अटूट क्रम

ओ कला! तू खोल
मानवता की धरोहर, अपने अमूल्य कोशों के द्वार
मेरे लिए खोल
अपने प्रज्ञा और संवेगों के आलिंगन में
अखिल विश्व को बांध लूँगा मैं

आओ
हम बीहड़ और सुदूर यात्रा पर चलें
आओ, क्योंकि हमें स्वीकार नहीं
छिछला निरुदेश्य और लक्ष्यहीन जीवन

हम ऊंघते, कलम घिसते
उत्पीडन और लाचारी में नहीं जियेंगे
हम आकांचा, आक्रोश, आवेग और
अभिमान से जियेंगे.

असली इन्सान की तरह जियेंगे.
– कार्ल मार्क्स

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