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Archive for February, 2011

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आधी रात को न जाने किसने दरवाजा खटकाया था. नींद से लड़की का कोई पुराना बैर था, सो पहली ही आहट में आवाज सुन ली थी. दरवाजा खोला तो हंसी ही आ गई उसे.
‘मुझे पता था.’ उसने हंसते हुए कहा.
वो हैरत से देख रहा था.
‘क्या पता था तुम्हें?’ उसने पूछा.
‘यही कि तुम आओगे. लेकिन इस तरह आधी रात…इतना भी सब्र नहीं हुआ तुमसे कि सुबह तक रुक जाओ. अब आ गये हो तो बैठ भी जाओ.’ हंसी रुक ही नहीं रही थी लड़की की. ‘अच्छा….बाबा सॉरी.’ लड़की ने कान पकड़ते हुए कहा लेकिन उसकी हंसी अब भी तारी थी. खिली-खिली सी हंसी. मानो आसमान के सारे तारे उसकी खिलखिलाहट में गुंथ गये थे.

‘तुम्हें हैरत किस बात की है? मेरे आने की या इस तरह आधी रात को आने की?’ उसने अचकचा कर पूछा.
‘दोनों में से किसी बात की नहीं. क्योंकि ये दोनों बातें मुझे पहले से ही पता थीं.’ लड़की मुस्कुराई. अब उसकी मुस्कुराहट में ठहराव आ गया था. जो उसकी सादा मुस्कुराहट को और भी मोहक बना रहा था.
‘फिर…?’ उसने पूछा.

‘देखो, दिन…रात…का हिसाब तो मैंने कब का बिगाड़ रखा है. तो इससे कोई फर्क ही नहीं कि वक्त क्या है. यूं भी मौसमों के आने-जाने का कोई वक्त होता भी कहां है. कब गाढ़ी काली रात बरसने लगे और कब बरसती रात के आंचल में चांद खिल उठे कौन जाने. इसीलिए मैंने दिन रात समेटकर एक ही पोटली में बांधकर रख दिये हैं. सब आपस में उलझ गये हैं. मुझे पता था तुम आओगे. और जल्दी आओगे.
सारा दिन मैंने तुम्हें देखकर भी नहीं देखा. तुमसे नजरें चुराईं. तुम्हें बुरा लगा ना?’
उसने गर्दन झुका ली.
‘मैं तुम्हारे ही लिये तो आता हूं. पूरे ग्यारह महीने के इंतजार के बाद बस कुछ दिनों का साथ.’
‘जानती हूं. मैं भी तो पूरे ग्यारह महीने इंतजार करती हूं. लेकिन इस बार तुम मेरे पीछे से क्यों आये? इसीलिए नाराज हूं तुमसे. मैं शहर से बाहर थी कुछ दिन. तो मैंने जिंदगी की शतरंज समेटकर रख दी थी. हाथी घोड़ों को अलग-अलग बांध दिया था. शह को मात से टिकाकर रख दिया था कि लौटूंगी तब तक कहीं सब आपस में उलझ न पड़ें. लेकिन…’ लड़की कहते-कहते अचानक उदास हो गई.
‘क्या हुआ?’
‘कुछ नहीं.’
‘अरे, बोलो भी?’
‘जब मैं थी ही नहीं तो तुम किसके लिए आये थे बोलो तो? लौटती हूं तो सारा शहर पलाशों से भरा हुआ है. दरख्त की हार डाल पर तुम मुस्कुरा रहे हो. तुमने मुझसे छल किया. तुम मेरे लिए नहीं आये हो.’
लड़की नाराज हो गई.
‘अच्छा इसीलिए सारा दिन मुझसे बात नहीं की.’
‘हां.’
‘मैं तो तुम्हारे लिये ही आया हूं. यहां कौन है जिसे मेरी फिक्र है. कौन है जो मेरी एक झलक भर से खिल उठता है. कौन है जो ग्यारह महीने हसरत से मेरी शाखों पर कुछ टटोलता है.’

‘पर अब मुझे तुम्हारे आने से क्या? मैं अब मौसमों से पार निकल आई हूं. दिन-रात, सुख-दुख, अवसाद, शह-मात इन सबको पार कर रही हूं.’
‘कहां जाओगी सबको पार करके?’ उसने पलकें झपकाकर पूछा.
‘अपने केंद्र में. कितने दिन हुए खुद से पीछा छुड़ाये. कितने दिन हुए दिये की ढिबरी की तरह अपनी ही लौ को बढ़ाये. कितने दिन हुए अपनी ही आंख में खुद को देखे. कितनी सदियों से खुद से भागती फिरती हूं. अब लौटना चाहती हूं. अपने केंद्र पर. अपना राग खुद बनना चाहती हूं. आरोह अवरोह की सीढिय़ों से मुक्त राग.’
लड़की की आंखों में शांति थी. अथाह शांति.

‘तो मैं अब कहां जाऊं…’ वो बोला. उसका स्वर उदास था.
लड़की उसकी मासूम सी ख्वाहिश पर फिदा थी.
‘तुम्हें कहीं जाने की जरूरत नहीं.’ उसने पलाश की उस शाख से एक फूल उतारा. दहकता हुआ सुर्ख फूल. उसे अपनी लंबी सी चोटी में अटका लिया. उसका चेहरा पलाश के फूलों की तरह खिल उठा.
‘अब खुश?’ वो चिहुंकी.
‘हां…’ पलाश मुस्कुराया.
‘तो मैं सो जाऊं अब?’ लड़की ने पूछा.
‘हां, लेकिन मैं यहीं तुम्हारे सिरहाने बैठा रहूंगा. इजाजत दो.’
‘चलो दी इजाजत.’ लड़की खिलखिलाई.

उसने तनहाई की चादर को खींचकर खुद को उसमें छुपा लिया…

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यह मेरा उदास बसंत है. पेड़ों से जब पत्ते झरते हैं, तो लगता है कि मेरा मन भी झर रहा है. तो क्या किसी नई शुरुआत के लिए ऐसा हो रहा है. क्योंकि पेड़ों पर तो नई कोपलें फूट रही हैं. काश ऐसा सच होता है तो मैं इस उदास बसंत का स्वागत बाहें पसार कर करती. हालांकि अब भी, जबकि मैं जानती हूं कि उम्मीद की कोई कोपल फिलहाल नहीं फूटने वाली है, मुझे बसंत से कोई शिकायत नहीं है. मैं अब भी इसे प्यार करती हूं. 
कल मास्को से एक मेहमान आये थे. उनसे पता चला कि बोरीस पास्तेनार्क ने अपनी पत्नी से तलाक ले लिया है क्योंकि वह किसी दूसरे से प्रेम करने लगे हैं. मैं बोरीस के लिए दुखी हूं. मुझे उसके लिए डर लग रहा है. इन दिनों कवियों, लेखकों में यह बीमारी कुछ ज्यादा ही देखने में आ रही है. एक पूरी सूची तैयार की जा सकती है जिसमें बड़े-बड़े नाम शामिल होंगे.
 क्या ये लोग सचमुच प्रेम को समझ पाते हैं? मुझे तो यह किसी नई मुसीबत को न्योता देने जैसा लगता है. जितना मैं बोरीस को जानती हूं, वो सुखी नहीं रहेगा. उसकी नई पत्नी बहुत सुंदर है. बोरीस उसकी सुंदरता की आग में जलता रहेगा. जबकि उसे शांति चाहिए. वो खुद को समझ ही नहीं पा रहा है. प्रेम का अर्थ संतप्त होना नहीं होता जबकि उसके लिए इसका यही अर्थ है.
1926 की गरमियों के वे दिन मुझे अब तक याद हैं. मेरी अंत की कविता पढ़कर वो कदर मेरा दीवाना हो गया था. किस कदर बेचैन था पास आने को. मैंने कितनी मुश्किल से उसे समझाया था कि मैं अपनी जिंदगी में इतनी बड़ी मुसीबत को न्योता नहीं दे सकती. मैं जानती हूं कि प्रेम और विवाह व्यक्तित्व को ध्वस्त कर देते हैं. लेकिन मैंने उसकी भावनाओं का अनादर नहीं किया. न जाने क्यों मन में यह विश्वास था कि कभी मैं उससे जरूर मिलूंगी. सोचती थी कि अपने जीवन के सबसे मुश्किल वक्त में मैं बोरीस के पास जाऊंगी. शायद अंतिम सांस लेने के लिए. उसकी भावनाओं की आंच मुझे रोशन करती रही है. लेकिन अब ऐसी कोई उम्मीद भी नहीं बची है.
कितना अजीब लग रहा है कि जो भावनाएं कभी मेरे लिए थीं, वही अब दूसरे के लिए हैं. पुरुष के लिए उन क्षणों में जब वह प्रेम करता है, प्रेम ही सब कुछ होता है. शायद इसीलिए वो उतनी ही आसानी से उससे मुक्त भी हो लेता है. संतप्ति और विरक्ति…मुझे गलत मत समझना. मुझे बोरीस से ईष्र्या नहीं हो रही है. नाराजगी भी नहीं है. कोई तीव्र पीड़ा भी नहीं है. बस एक खालीपन है….मन के सारे पत्ते झर रहे हैं…
– मरीना त्स्वेतायेवा
(20 मार्च 1931 को अन्ना अन्तोनोव्ना को पेरिस से लिखे पत्र का एक हिस्सा…)
– बोरीस पास्तेर्नाक रूस का बड़ा कवि था. 

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मेरा जीवन बहुत बुरी तरह चल रहा है. मैं लोगों से घिरी हूं. बहुत सारे लोगों से. कुछ भी लिख पाने में असमर्थ हूं. एक बूंद एकांत को तरस रही हूं. कितना मुश्किल है यह. बहुत बुरा लग रहा है. अजीब-अजीब से ख्याल आ रहे हैं. एक मामूली से व्यंग्य लिखने वाले को या स्तंभकार को भी (जो संभवत: अपने लिखे को दोबारा पढ़ता तक नहीं के पास भी) लिख पाने का समय और सहूलियतें हैं. और मेरे पास यह एकदम नहीं. दो मिनट तक की खामोशी भी नहीं. हर समय लोगों से घिरी हुई हूं.
जीवन जैसा है, वह मुझे पसंद नहीं. मेरे लिए वह कुछ अर्थ रखना तभी शुरू करता है, जब वह कला या साहित्य में रूपान्तरित होता है. इसके बिना जीवन का कोई महत्व नहीं. अगर मुझे कोई सागर के किनारे ले जाये, या फिर स्वर्ग में ही क्यों न ले जाए और लिखने की मनाही कर दे तो मैं दोनों को अस्वीकार कर दूंगी. मेरे लिए इन चीजों का कोई महत्व नहीं है.
बहुत सारे लोग हैं, चेहरे हैं, मुलाकातें हैं. लेकिन सभी सतही. कोई भी व्यक्ति प्रभाव नहीं छोड़ता. सब चेहरे एक-दूसरे से टकराते हैं. शोर-शराबे के बीच, लोगों की भीड़ के बीच एकदम अकेली हूं. जीना एकदम अच्छा नहीं लग रहा है.

– मरीना त्स्वेतायेवा

(30 नवंबर 1925 को पेरिस से अन्ना अन्तोनोव्ना को लिखे पत्र से)

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तुमने मुझे याद किया. मुझे बेहद खुशी हुई. कितना अच्छा है यह अहसास कि हम अपना श्रेष्ठतम यानी अपना मन दूसरे को देते हैं. उसे, जो हमें अच्छा लगता है. बदले में उसका मन लेते हैं. यह सब कुछ इतनी आसानी से बिना किसी कठिनाई और प्रेम की अपेक्षा के होता है.

मेरी बचपन से ही यह इच्छा रही है कि मुझे लोग खूब प्यार करें. लेकिन अब मैं इसके मायने समझ पाई हूं. अब मैं हर एक से कहती हूं कि मुझे प्यार नहीं चाहिए. मुझे पारस्परिक समझ चाहिए. मेरे लिए यही प्यार है. जिसे आप प्रेम की संज्ञा देते हैं- बलिदान, वफादारी, ईष्र्या…उसे दूसरों के लिए बचाकर रखिये. किसी दूसरे के लिए. मुझे यह नहीं चाहिए. मुझे सिर्फ ऐसे आदमी से प्रेम हो सकता है जो वसंत के किसी दिन में मुझसे अधिक मौसम को, खिलते हुए फूलों को पसंद करे.

मैं कभी यह भूल नहीं पाऊंगी कि किस तरह बहार के दिनों में एक सुंदर कवि, जिसे मैं बहुत प्यार करती थी ने मुझे कितना गुस्सा दिलाया था. वह मेरे साथ क्रेमलिन के पास से गुजरते हुए मास्को नदी और गिरजाघरों की ओर देखे बिना लगातार मुझसे और मेरे बारे में बातें करता रहा. मैंने उसे कहा, जरा सिर उठाइये. आसमान की ओर देखिये. वह मुझसे हजार गुना बड़ा है, क्या मैं ऐसे दिन में तुम्हारे प्रेम के बारे में सोचूंगी. ऐसे वक्त तो मैं अपने बारे में भी नहीं सोचती.

बातचीत करने वालों के साथ मेरी दूसरी भी मुसीबतें हैं. मैं व्यक्ति के जीवन में अविलम्ब प्रवेश कर जाती हूं, जो किसी कारण मुझे अच्छा लगता है. मेरा मन उसकी सहायता करने को कहता है. मुझे उस पर दया आती है कि वह डर रहा है कि मैं उससे प्रेम करती हूं. या वह मुझसे प्रेम करने लगेगा और इस तरह उसका पारिवारिक जीवन तहस-नहस हो जायेगा.

यह बात कही नहीं जाती पर मैं यह चीखकर कहना चाहती हूं, महोदय, मुझे आपसे कुछ भी नहीं चाहिए. आप जा सकते हैं. फिर आ सकते हैं. फिर कभी नहीं भी लौट सकते हैं. मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता. मैं ताकतवर हूं. मुझे कुछ भी नहीं चाहिए सिवाय आपकी अच्छी भावनाओं के.

मैं समझ, सहजता और स्वच्छंदता चाहती हूं. किसी को पकड़कर नहीं रखना चाहती और न ही कोई मुझे पकड़कर रखे. मैं खुद से प्रेम करना सीख रही हूं. उस शहर से जहां मैं रहती हूं. सड़क के आखिरी छोर के पेड़ से और हवा से मुझे सुख है, असीम सुख.

– मरीना त्स्वेतायेवा
(रूस की महत्वपूर्ण कवियत्री मरीना के उस पत्र का अंश जो उसने 21 जुलाई 1916 को अपने मित्र इवानोविच को लिखा था.)

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नब्ज कुछ देर से थमी सी है...

इन दिनों आसपास ढेर सारे ख्याल घूमते रहते हैं. अजीबो-गरीब से. यूं कुछ न कुछ ख्याल तो हमेशा ही साथ होते हैं लेकिन इन दिनों इन ख्यालों में अजब सी होड़ मची हुई है. सब एक-दूसरे से टकराते हैं. लड़ते हैं, भिड़ते हैं. मेरे कब्जे में कोई नहीं. मैं बस दर्शक हूं. देख रही हूं. देखती हूं कौन करीब आता है, कितने करीब आता है. कितनी देर टिकता है. कितना और कैसा असर छोड़ जाता है. 


एक ख्याल जो ज्यादातर सारे ख्यालों को पीछे छोड़ देता है, वो है मृत्यु का ख्याल.  न..न..इसे लेकर नकरात्मक सोचने की जरूरत नहीं. बेहद रूमानी सा ख्याल है यह. कई बार अपने सपने में अपने ही शरीर को सफेद फूलों से सजा रही होती हूं. कई बार जल्दी-जल्दी काम समेट रही होती हूं कि मृत्यु से पहले कुछ छूट न जाए. मेरे जाने के बाद कहीं किसी को कोई परेशानी न हो. एक बार एक कहानी भी लिखी थी इस खामख्याली पर. 


बहुत पहले प्रियंवद की एक कहानी पढ़ते हुए मृत्यु की रूमानियत से सामना हुआ था. शांत, स्थिर, मोहक, आकर्षित करती हुई मृत्यु. उसके आसपास कोई शोर नहीं. कोई हलचल नहीं. सफेद फूलों की तरह बेहद लुभावनी. 


मृत्यु का ख्याल दो ही स्थितियों में आसपास होता है. एक….अरे वही, जिंदगी का रोना-धोना. जिंदगी से थककर, हारकर, पस्त होकर. ये काफी उबाऊ है. इसमें कहीं कोई रूमानियत नहीं. लेकिन जो दूसरी स्थिति है, वो कमाल है…जिंदगी से प्यार होने की स्थिति. कुछ ऐसा पा लेने की चरम सीमा, जिसका होना सिर्फ ख्वाब ही रहा हो अब तक. सुख की अंतिम स्थिति. जब बेसाख्ता मुंह से निकले कि काश इन पलों में दम ही निकल जाए…


दु:ख तो कभी इतना बड़ा नहीं हुआ कि मृत्यु का ख्याल करीब फटके. क्योंकि  जिसने मरीना के जीवन को छूकर देखा हो वो खुद को आसानी से दुखी तो नहीं कह सकता. 

सुख, वो न जाने किस गांव रहता है…कभी-कभी उस गांव के आसपास से गुजरी हूं शायद, लेकिन रास्ता भटक गई हूं अक्सर. ढूंढती हूं. रुक जाती हूं. फिर चल पड़ती हूं. पीछे पलट-पलट कर देखती हूं. असमंजस में हूं कि आखिर ये मृत्यु का ख्याल क्यों आसपास मंडराता है? क्यों दूसरे ख्यालों से होड़ में जीत जाता है. क्यों मुझे लुभाता है. कई बार दिल चाहता है हाथ बढ़ाकर छू लूं इस ख्याल को. गुनगुनाती हूं… दफ्न कर दो मुझे कि सांस मिले, नब्ज कुछ देर से थमी सी है…कहीं से बांसुरी की आवाज आ रही है शायद…देखूं तो कहां से…

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कब याद में तेरा साथ नहीं कब हाथ में तेरा हाथ नहीं
सद शुक्र के अपनी रातों में अब हिज्र की कोई रात नहीं

मुश्किल हैं अगर हालात वहाँ दिल बेच आयेँ जाँ दे आयेँ
दिल वालो कूचा-ए-जानाँ में क्या ऐसे भी हालात नहीं

जिस धज से कोई मक़्तल में गया वो शान सलामत रहती है
ये जान तो आनी जानी है इस जाँ की तो कोई बात नहीं

मैदान-ए-वफ़ा दरबार नहीं याँ नाम-ओ-नसब की पूछ कहाँ
आशिक़ तो किसी का नाम नहीं कुछ इश्क़ किसी की ज़ात नहीं

गर बाज़ी इश्क़ की बाज़ी है जो चाहो लगा दो डर कैसा
गर जीत गए तो क्या कहना हारे भी तो बाज़ी मात नहीं.

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 मोहब्बत की शदीद बारिश का मौसम है. हर कोई बसंत के रंग में रंगा जा रहा है. कोई अकेले मुस्कुरा रहा है, कोई अपने साथी के साथ है. कहीं, कोई किसी की याद में गुम है, कहीं मोहब्बत का मीठा सा गम है. मोहब्बत का जिक्र आते ही अमृता आपा का नाम याद आता है. और उनका नाम आते ही इमरोज का. आज अरसे बाद इमरोज साहब को फोन किया. वही मखमली आवाज़, वही शायराना अंदाज. मैं जब भी उनसे रू-ब-रू होती हूं, कुछ कह ही नहीं पाती. सारे सवाल न जाने कहां गुम हो जाते हैं. मानो उनसे कुछ भी पूछना हिमाकत करना होगा. उन्हें बस देखते रहो. उनके जिए हर लम्हे में वो कितना कुछ तो बोल चुके हैं.
मोहब्बत पर उनका फलसफा किसी से छुपा नहीं. अमृता आपा को उनकी आखिरी सांस तक अपनी पलकों पर सजाकर रखा. आज वो उन्हें अपने सीने में छुपाए फिरते हैं. उनका दिल यह मानने को तैयार ही नहीं कि अमृता अब नहीं है. उनकी मोहब्बत अब भी वैसी ही ताजा है, जैसे अभी-अभी कोई फूल खिला हो जिस पर ओस की बूंदों की नमी बाकी हो. उनसे हुई जो बात वो बाद में, पहले आइये पढ़ते हैं उनकी एक नज्म जो उन्होंने फोन पर सुनाई है, आप सबसे साझा करने के लिए-
वो जब भी मिलती है
एक अनलिखी नज्म नजर आती है.
मैं इस अनलिखी नज्म को
कई बार लिख चुका हूं.
फिर भी हर बार
यह अनलिखी ही रह जाती है.
हो सकता है
यह अनलिखी नज्म
लिखने के लिए
हो ही ना,
सिर्फ जीने के लिए हो.
– इमरोज

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