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Archive for February 17th, 2011

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तुमने मुझे याद किया. मुझे बेहद खुशी हुई. कितना अच्छा है यह अहसास कि हम अपना श्रेष्ठतम यानी अपना मन दूसरे को देते हैं. उसे, जो हमें अच्छा लगता है. बदले में उसका मन लेते हैं. यह सब कुछ इतनी आसानी से बिना किसी कठिनाई और प्रेम की अपेक्षा के होता है.

मेरी बचपन से ही यह इच्छा रही है कि मुझे लोग खूब प्यार करें. लेकिन अब मैं इसके मायने समझ पाई हूं. अब मैं हर एक से कहती हूं कि मुझे प्यार नहीं चाहिए. मुझे पारस्परिक समझ चाहिए. मेरे लिए यही प्यार है. जिसे आप प्रेम की संज्ञा देते हैं- बलिदान, वफादारी, ईष्र्या…उसे दूसरों के लिए बचाकर रखिये. किसी दूसरे के लिए. मुझे यह नहीं चाहिए. मुझे सिर्फ ऐसे आदमी से प्रेम हो सकता है जो वसंत के किसी दिन में मुझसे अधिक मौसम को, खिलते हुए फूलों को पसंद करे.

मैं कभी यह भूल नहीं पाऊंगी कि किस तरह बहार के दिनों में एक सुंदर कवि, जिसे मैं बहुत प्यार करती थी ने मुझे कितना गुस्सा दिलाया था. वह मेरे साथ क्रेमलिन के पास से गुजरते हुए मास्को नदी और गिरजाघरों की ओर देखे बिना लगातार मुझसे और मेरे बारे में बातें करता रहा. मैंने उसे कहा, जरा सिर उठाइये. आसमान की ओर देखिये. वह मुझसे हजार गुना बड़ा है, क्या मैं ऐसे दिन में तुम्हारे प्रेम के बारे में सोचूंगी. ऐसे वक्त तो मैं अपने बारे में भी नहीं सोचती.

बातचीत करने वालों के साथ मेरी दूसरी भी मुसीबतें हैं. मैं व्यक्ति के जीवन में अविलम्ब प्रवेश कर जाती हूं, जो किसी कारण मुझे अच्छा लगता है. मेरा मन उसकी सहायता करने को कहता है. मुझे उस पर दया आती है कि वह डर रहा है कि मैं उससे प्रेम करती हूं. या वह मुझसे प्रेम करने लगेगा और इस तरह उसका पारिवारिक जीवन तहस-नहस हो जायेगा.

यह बात कही नहीं जाती पर मैं यह चीखकर कहना चाहती हूं, महोदय, मुझे आपसे कुछ भी नहीं चाहिए. आप जा सकते हैं. फिर आ सकते हैं. फिर कभी नहीं भी लौट सकते हैं. मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता. मैं ताकतवर हूं. मुझे कुछ भी नहीं चाहिए सिवाय आपकी अच्छी भावनाओं के.

मैं समझ, सहजता और स्वच्छंदता चाहती हूं. किसी को पकड़कर नहीं रखना चाहती और न ही कोई मुझे पकड़कर रखे. मैं खुद से प्रेम करना सीख रही हूं. उस शहर से जहां मैं रहती हूं. सड़क के आखिरी छोर के पेड़ से और हवा से मुझे सुख है, असीम सुख.

– मरीना त्स्वेतायेवा
(रूस की महत्वपूर्ण कवियत्री मरीना के उस पत्र का अंश जो उसने 21 जुलाई 1916 को अपने मित्र इवानोविच को लिखा था.)

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