Feeds:
Posts
Comments

Archive for April, 2011

>

दिल में ऐसे ठहर गए हैं ग़म

जैसे जंगल में शाम के साये 
जाते-जाते सहम के रुक जाएँ 
मुडके देखे उदास राहों पर 
कैसे बुझते हुए उजालों में 
दूर तक धूल धूल उडती है…
– गुलज़ार 

Read Full Post »

>

कोई शब्द नहीं उगे धरती पर,
किसी भी भाषा में नहीं,
जिनके कंधों पर सौंप पाती
संप्रेषण का भार
कि पहुंचा दो
सब कुछ वैसा का वैसा
जैसा घट रहा है मेरे भीतर,
कोई भी जरिया नहीं 
जिससे पहुंचा सकूं 
अपना मन पूरा का पूरा.
उदास हूँ
ये सोचकर कि
न जानते हुए भी
मेरे दिल का पूरा सच,
न जानते हुए भी कि 
सचमुच कितना प्यार है
इस दिल में
कितने खुश हो तुम
कितनी कम हैं तुम्हारी ख्वाहिशें
और कितना विशाल
मेरी चाहत का संसार…

Read Full Post »

>


आपकी याद आती रही रात-भर
चाँदनी दिल दुखाती रही रात-भर

गाह जलती हुई, गाह बुझती हुई
शम-ए-ग़म झिलमिलाती रही रात-भर

कोई ख़ुशबू बदलती रही पैरहन
कोई तस्वीर गाती रही रात-भर

फिर सबा साय-ए-शाख़े-गुल के तले
कोई क़िस्सा सुनाती रही रात-भर

जो न आया उसे कोई ज़ंजीरे-दर
हर सदा पर बुलाती रही रात-भर

एक उमीद से दिल बहलता रहा
इक तमन्ना सताती रही रात-भर

– फैज़ अहमद फैज़ 

Read Full Post »

>

पिछले दिनों सिद्धेश्वर  जी ने वेरा पाव्लोवा की कुछ कवितायेँ पढने को दीं. उन कविताओं में से ये एक अटक सी गयी है दिमाग में. तो इसे यहाँ अपने ब्लॉग पर निकालकर रखे दे रही हूँ  (सिद्धेश्वर जी की अनुमति से) ताकि इसे सहेज भी लूं और शेयर भी कर लूं…


आईने के सामने

मैं सीख रही हूँ ‘नहीं’ कहना :
ना – ना – ना।  
प्रतिबिम्ब  दोहराता है :

हाँ -हाँ – हाँ। 
(अनुवाद-सिद्धेश्वर सिंह)

Read Full Post »

>


जब देखती हूँ तुम्हारी ओर 
तब दरअसल 
मैं देख रही होती हूँ अपने उस दुःख की ओर 
जो तुममें कहीं पनाह पाना चाहता है.
जब बढाती हूँ तुम्हारी ओर अपना हाथ
तब थाम लेना चाहती हूँ
जीवन की उस  आखिरी उम्मीद को 
जो तुममे से होकर आती है .
जब टिकाती हूँ अपना सर 
तुम्हारे कन्धों पर 
तब असल में पाती हूँ निजात 
सदियों की थकन से 
तुम्हें प्यार करना असल में 
ढूंढना है खुद को इस स्रष्टि में..
बोना है धरती पर प्रेम के बीज 
और साधना है प्रेम का राग…

Read Full Post »

>


ऑफिस पहुंचने पर हमें एक मशीन पर अपनी उंगली रखनी होती है. किर्रर्रर्र सी आवाज आती है और उंगली रखने वाले का नाम मशीन पर उभरता है. समय भी. इस तरह हम अखबार के कारखाने में अपनी आमद दर्ज करते हैं. कभी-कभी मशीन उंगली को पहचानने से इनकार कर देती है. लिखकर आता है इनवैलेड फिंगर. जब भी ऐसा होता है, अनायास मेरे चेहरे पर मुस्कान बिखर जाती है. अब मैं दूसरी उंगली कहां से लाऊं…मेरे पास तो यही है. अपनी ही उंगली को देखती हूं कहीं किसी से बदल तो नहीं गई. चेहरा टटोलती हूं, अपना नाम पुकारती हूं. सब कुछ तो है ठिकाने पर. फिर मशीन से मनुहार करती हूं, मान लो ना प्लीज. ये मेरी ही उंगली है. रोज वाली. सच्ची. मशीन मुस्कुराती है. नहीं मानती. मैं फिर मनाती हूं. मानो किसी अदालत में जज को कनविंस कर रही होऊं कि जज साहब मैं ही हूं प्रतिभा…सौ फीसद. हालांकि मेरे अपने होने के सारे प्रमाणपत्र कहीं खो गये हैं. फिर भी हूं तो मैं ही ना? मशीन काफी ना-नुकुर के बाद रहम करते हुए, इतराते हुए ‘हां’ कह देती है और मेरा नाम कारखाने के रजिस्टर में दर्ज हो जाता है…ये खेल मुझे बहुत पसंद है. 

सोचती हूं कभी यूं भी हो सकता है कि आइने के सामने खड़ी हूं और आईना पहचानने से इनकार कर दे. उसमें कोई अक्स ही न उभरे या ऐसा अक्स उभरे जिसे मैं जानती ही न होऊं. रास्तों के साथ तो ऐसा अक्सर ऐसा होता है. जिन रास्तों से रोज गुजरती हूं, किसी दिन वही रास्ते छिटककर मुझसे दूर हो जाते हैं . मैं उन्हें हैरत से, कभी हसरत से देखती हूं. इसी तरह कई बार ऑफिस के पीसी का पासवर्ड नखरे करता है. बार-बार मनुहार करवाता है और फिर एहसान जताते हुए धीरे से मान लेता है. 

अपना ही नंबर डायल करती हूं कभी तो आवाज आती है दिस नंबर डज नॉट एक्जिस्ट. या कई बार इंगेज की टोन मिलती है. कई बार ट्राई करने के बाद अचानक मिल जाता है. हालांकि इनवैलेड वाली ध्वनियां काफी जगह से मिलती रहती हैं. न जाने कितने लोग, कितने कामों को, कितनी बातों को, कितनी ख्वाहिशों को, अरमानों को इनवैलेड करार देते हैं. कोई किर्रर्रर्रर्र की आवाज भी नहीं आती. वे फिर बार-बार कोशिश करने से भी नहीं मानते. 

दिल के किसी कोने से आवाज आती है कि कभी यूं भी तो होगा कि सांसें इस देह की गली का रास्ता भूल जायेंगी या उसे पहचानने से इनकार कर देंगी. अचानक…एरर आ जायेगा और शरीर सांसों से कहेगा दिस इज एन इनवैलेड एरिया टू एक्सेस ब्रेथ…

Read Full Post »

>

अपने हिस्से के सारे उदास दिन वो नदी में डालकर बुझा देती थी. सूरज सारा दिन उसके कलेजे में जलता रहा था. घड़ी की सुइयों में लड़के का चेहरा जो उग आया था. बार-बार वो घड़ी यूं देखती थी, मानो अभी घड़ी की सुइयों से निकलकर वो बाहर आ खड़ा होगा. न जाने कितनी सदियों से ये सिलसिला जारी था. इसी इंतजार में न जाने कितने सूरज इसी नदी में डूबकर मर गये. न जाने कितनी चांद रातों ने उसके सर पर हाथ फिराया.

ऐसी ही एक रात में जब वो नदी में अपना एक उदास दिन बुझा रही थी, दो हथेलियों ने उसकी आंखों को ढंक दिया था. उसकी खुशबू से उसे पहचानना कोई मुश्किल काम नहीं था. फिर भी वो उसके सिवा सारे नाम बूझती रही. लड़का नाराज हो गया. लड़की मुस्कुरा दी. उसका यूं नाराज होना उसे बहुत अच्छा लगता था. वो उसकी सारी नाराजगी को अपने आंचल में बांध लेती थी. 

लड़का फिर बड़ी मुश्किल से मानता था. ज्यादातर तब, जब लड़की रोने को हो आती थी. वो कहती, तुम इतना भी नहीं समझते कि मैं तुम्हें चिढ़ा रही थी.

मैं कोई बच्चा हूं, जो मुझे चिढ़ा रही थी? वो गुस्से में भरकर कहता. 

लड़की सूखी सी हंसी हंस देती. 
उसकी दादी कहती थी कि ‘बिटियन का हंसी तब जादा आवत है जब वे रोओ चहती हैं…’ दादी की बात तो खैर दादी के साथ गई लेकिन लड़की की हंसी उसके साथ रह गई. उसकी उस हंसी के कारण लड़का कभी खोज नहीं पाया. वो उस हंसी में उलझ जाता था. लड़की को अक्सर लगता था कि लड़का उसके पास होकर भी उसके पास नहीं होता है. अक्सर वो कहीं और खोया रहता था. लड़की की उंगलियों से अपनी उंगलियों को उलझाते हुए वो अपना मन न जाने कहां उलझाये रहता था. नदी के किनारों पर उनके प्रेम के वो लम्हे अक्सर टूटते और बिखरते रहते थे. लड़की टूटे हुए लम्हों को भी चुन लेती थी.


लड़के की बातों में लड़की की बातें नहीं होती थीं. लड़का अपनी आंखों को कभी सितारों में उलझा लेता था, कभी दरख्तों में. वो लड़की की आंखों में आंखें डालने से अक्सर बचता था. लड़की कभी कारण नहीं पूछती थी. बस उसे देखती रहती थी. वो भी ऐसी ही एक पाकीजा सी रात थी. लड़की के आंचल में उस रोज ढेर सारी उदासी बंधी थी. उस रोज भी वो हमेशा की तरह देर से आया था. रात लगभग बीत चुकी थी. उबासियां लेता चांद जाने की तैयारी में था.


आते ही लड़के ने अपनी उलझनों का टोकरा लड़की को टिकाया. उसने लड़की की आंखों की ओर फिर से नहीं देखा. लड़के के साथ उसकी जिंदगी की न जाने कितनी छायाएं भी चली आती थीं. उसे पता ही नहीं था कि उस रोज लड़की ने अपनी मां को खोया था. वो अपनी मां की स्मृतियों में गले तक डूबी थी. उनके जाने के गम को जज्ब कर रही थी. उदासी के कुहासे वाली उस रात में भी लड़का उसे अपनी कोई कहानी सुना रहा था. जिसे लड़की सुन नहीं रही थी, सह रही थी. लड़की बता ही नहीं पाई कि वो अपनी मां की स्मृतियों को उससे बांटना चाहती थी. उसकी हथेलियों में अपना दर्द छुपा देना चाहती थी. उसके कंधों पर अपनी उदासी को कुछ पलों के लिए टिकाकर मुक्त होना चाहती थी. लेकिन लड़का वहां होकर भी वहां था ही नहीं.

 
उसी रोज लड़की ने अपने कंधे चौड़े किये थे. उसी रोज उसने अपने आंसुओं को परास्त किया था. उसी रोज वो सबसे जोर से खिलखिलाई थी. इतनी तेज हंसी थी वो कि चुपचाप एक गति से बहती जा रही नदी अचानक रुककर उसे देखने लगी थी. लड़की ने लड़के का हाथ धीरे से छोड़ दिया था. नदी के किनारे पर छप्पाक से एक आवाज आई थी. वो लड़की की आंख का आखिरी आंसू था.

लड़का अब भी अनजान है कि उस रात उसने क्या खो दिया. लड़की अब भी उससे मिलती है. नदी के किनारे अब भी  महकते हैं. लड़का समझता है कि लड़की उसके पास है लेकिन लड़की तो दूर कहीं चांद के देश में चली गयी है. यहां तो बस उसका जिस्म है जो अपने हिस्से के उदास दिनों को नदी में बुझाने के लिए रह गया है.


लड़की की मुस्कुराहटें चांद की कोरों को भिगो देती हैं. नीली नदी के किनारे भीगी पलकों वाले चांद को अब भी देखा जा सकता है…

Read Full Post »

Older Posts »