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Archive for the ‘आलोक की दो कवितायें’ Category

> वेरा उन सपनों की कथा कहो (1996) से कविताओं का सफर शुरू करने वाले आलोक श्रीवास्तव के दो कविता संग्रह आने को हैं. पहला दिखना तुम सांझ तारे को और दूसरा दु:ख का देश और बुद्ध. इस बीच उनके दो कविता संग्रह और आये. जब भी वसंत के फूल खिलेंगे (2004) और यह धरती हमारा ही स्वप्न है (2006).वेरा की कविताओं ने एक पूरी पीढ़ी पर जादुई असर किया था. उन लोगों पर भी इन कविताओं का पूरा असर हुआ, जिन्हें कविताओं में खास रुचि नहीं थी. ये प्रेम में पगी हुई कविताएं थीं. प्रेम की परिभाषा का विस्तार देते हुए इन कविताओं में न मिलन की आस थी, न विछोह की पीड़ा या शिकायत, न मनुहार कोई. इनकी अलग दुनिया थी. जो प्रेम के साथ पूरा एक नया संसार रच रही थीं. इतिहास की यात्राएं करते हुए ये कविताएं भविष्य पर न$जर टिकाये थीं. ये प्रेम कविताएं समाज और मन दोनों पर बराबर पकड़ बनाये चलती हैं. यहां जो प्रेम के अर्थ खुले तो पूरा समाज भी खुला, वो कुहासे भी खुले, जिन्होंने मन के मासूम कोने को ढंाक रखा था. वेरा के बाद दिखना तुम सांझ तारे को पढऩा एक अलग ही अनुभव है. ये कविताएं नयी भूमि पर रची गयी महत्वपूर्ण कविताएं हैं. आलोक को बधाई देते हुए आइये पढ़ते हैं इसी संग्रह से दो कविताएं-

मैं नहीं कहता तुम्हें प्यार करताहूँ
मैं तो बस वह मौसम होना चाहता हूँ
तुम्हारे केशों को बिखरा दे तुम्हारे चेहरे पर
वह आवाजजो जंजीर बन जाए तुम्हारे पांवों में
और तुम एक दृश्य बन खड़ी रह जाओ
शाम का आसमान जिसे कौतुक से देखे
मैं तो वह रंग होना चाहता हूँ
जो तुम्हारी अंाख और पलक में
सपना बनकर घुलता जाए…
———————————
तुम मुझे भूल भी जाओ
तो भी मैं सपना बन झांकूंगा
तुम्हारी आंख से
जहाँ भी तुम जाओगी
जो भी तुम करोगी
मई उसमें शामिल होऊंगादूर-दूर तक
मैं कहीं नहीं होऊंगा
पर तुम्हारी आंख
मुझे निहारेगीसूने किसी वन में
एकांत किसी राह पर
वीरान किसी मौसम में
तुम पत्तों में सुनोगी मेरी आवा$ज
हो सकता हैकिन्हीं पंखुरियों में
मुझे छुओ भी तुम
मैं तुम्हारा प्रेमी नहीं था
मैं तो बस एक मौसम था
तुम्हारी राह से गुजरा…

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>हमने भी विदा कर दिया प्रेम
रुखसत कर दीं ख़ुद को टटोलने की
कोशिश करती बातें
ख़ुद पर से उतार दिया चांदनी का जादू
यह सफर यहां खत्म होता है

अब एक नाव तट से बंधी खड़ी है
एक आदमी कहीं पगडंडियों में खो गया है

पर, एक दिल बच गया है साबुत

कितना कुछ नष्ट होने के बाद भी
एक तपिश कहीं बची रही गयी है
शायद, कम ही जानते थे हम भी
गमे इश्क को।

दुख, प्रेम और समय

बहुत से शब्द
बहुत बाद में खोलते हैं अपना अर्थ

बहुत बाद में समझ में आते हैं
दुख के रहस्य

खत्म हो जाने के बाद कोई संबंध
नए सिरे से बनने लगता है भीतर
…और प्यार नष्ट हो चुकने
टूट चुकने के बाद

पुनर्रचित करता है खुद को
निरंतर पता चलती है अपनी सीमा
अपने दुख कम प्रतीत होते हैं तब
और अपना प्रेम कहीं बड़ा…
– आलोक श्रीवास्तव

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