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Archive for the ‘आलोक श्रीवास्तव’ Category

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यह प्रेम की कथा है
किसी दर्शन की नहीं
किसी सत्य की नहीं
किसी साधना की नहीं
न किसी मोक्ष की
वह घटी थी धरती पर
जैसे घटता है प्रेम
जिसमें समाहित हैं
दर्शन, सत्य, साधना, मोक्ष
सौंदर्य
कहां समाप्त हुई वह कथा अभी
अहर्निश वह जागती है
इस धरती पर
वह इस धरती की 
प्रेमकथा…
—–
मृत्यु को जीतने नहीं
किसने कहा कि वह संतप्त था
मृत्यु को देखकर?
वह मृत्यु को जीतने निकला था
किसने कहा?
साक्षी हैं उसके वचन कि 
उसने सिर्फ जीवन को खोजा
बस यह चाहा कि 
काया की मृत्यु से पहले 
न मरे मनुष्य….

– आलोक श्रीवास्तव

(कविता संग्रह दुख का देश और बुद्ध से)

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– प्रतिभा कटियार 
धरती के इस छोर से उस छोर तक दुख की कारा है. संसार का कोई ऐसा व्यक्ति नहीं है जो दुख की इस कारा में कैद न हो. जैसे काली अंधियारी रात में अचानक टिमटिमाता है कोई तारा, वैसे ही दुख के इस गहनतम अंधकार के बीच उदित होता है एक नाम बुद्ध. इस धरती पर जहां भी कोई अपने दुख से लड़ रहा है, बुद्ध वहीं हैं. दु:ख को समझना ही दुख से लडऩा है. बुद्ध कहते हैं अपना दीपक खुद बनो. दुख की कारा से बाहर निकलो और काया के खत्म होने से पहले मत मरो. दु:ख के देश में बुद्ध का आना एक दुर्लभ संयोग है. यह आना कविताओं के माध्यम से हो तो संयोग और भी दुर्लभ हो जाता है. आलोक श्रीवास्तव का नया कविता संग्रह दु:ख के देश में बुद्ध यह संयोग रचता है. 

मनुष्य की संभावनाओं के प्रतीक बुद्ध की प्रासंगिकता लगातार बढ़ रही है. आलोक की कविताओं में आम आदमी के जीवन के कष्ट और उनसे लडऩे के लिए बुद्ध का दर्शन बेहद सहज ढंग से आता है. कोई राजपुत्र, कोई विरागी महात्मा नहीं, दु:ख के विरुद्ध संघर्ष की जनगाथा है बुद्ध. बुद्ध को समझना खुद को समझना है और मुक्त होना है दु:ख से. प्रस्थान करना है जीवन की ओर. आलोक की कविताएं हमारा ये काम बेहद आसान करती हैं. वे हमारा हाथ पकड़कर बुद्ध के हाथ में थमा देती हैं और हम मुक्त होता महसूस करते हैं. गहरी शांति का अनुभव करते हैं. महसूस होता है अपने भीतर प्रदीप्त होता उजास, जिसकी खोज में न जाने कितने साधू, सन्यासी घूमते फिरते हैं जंगल और पहाड़ों पर. कितना कम जानते हैं हम जीवन को. कितना कम समझते हैं हम खुद को. यह पथ बुद्ध की ओर नहीं, जीवन की ओर ले जाता है, तृष्णा के पार, जहां न कोई धर्म है, न चीवर, कोई शरण न कोई बुद्ध…बुद्ध खुद को स्थापित नहीं करते जीवन को स्थापित करते हैं. जीवन का होना बुद्ध का होना है, दु:ख से लडऩा बुद्ध का होना है…
इंसान जान भी नहीं पाता स्रोत दु:ख के, थकता-टूटता, हारता फिर भी पूजता, नवाता शीष, दुख के निर्माताओं के सम्मुख, कैसी है यह कारा दु:ख की…इस संग्रह से गुजरते हुए दुख की यह कारा टूटती न$जर आती है. जब हर रोज कोई न कोई कारण जीवन के सम्मुख चुनौती बनकर खड़ा हो ऐसे में यह संग्रह उम्मीद की लौ बनकर उभरता है. साक्षी हैं उसके वचन कि उसने सिर्फ जीवन को खोजा, बस यह चाहा कि काया की मृत्यु से पहले, न मरे मनुष्य…यह कोई मामूली विचार नहीं है. आलोक वरिष्ठ कवि हैं. उनके पहले भी चार कविता संग्रह आ चुके हैं. अपनी पिछली कविताओं में जहां वो प्रेम का एक खूबसूरत रूमान गढ़ते हैं, वहीं इस संग्रह में उनका यही रूमान बौद्ध दर्शन में ढलता है. मनुष्य को बचाये रखने की कल्पना, मनुष्यता को सहेजकर रखने की कामना और उसे दु:ख से दूर करने की सदेच्छा इस संग्रह की हर कविता में झलकती है. यूं ही नहीं लिख देता है कोई कि दु:ख को समझना ही दु:ख को जीतना है…सुजाता हो या यशोधरा बुद्ध एक आम आदमी की तरह दोनों के प्रति आभारी हैं. यशोधरा के दु:ख से अनजान नहीं हैं वे. ‘जिस तरह उसने मणि मााणिक, मुकुट, गवाक्ष और रथ छोड़े, ज्ञानीजनों, उसी तरह नहीं छोड़ गया था वह, इस स्त्री यशोधरा को, सुनो नीरांजना का शोर, शायद उनके किनारे, उस दिन, कोई रोया था…वो यशोधरा के प्रति क्षमाप्रार्थी रहे जीवन भर. यशोधरा विश्वास करना, जब जर्जर हो गई मेरी देह, दीठ मंद, पांव शिथिल, तब भी तुम्हें नहीं भूला..तप और ज्ञान नहीं, बहुत सारी रातों में रोने के बाद वह अच्छी तरह जानता था, आंसुओं के बारे में…’ 
बुद्ध के जाने के बाद भी उनका होना मिटा नहीं पृथ्वी से. कविता विश्वास जगाती है कि वह तुम्हें मुक्ति देने नहीं, दीप बनाने लौटेगा, तुम सुनना उसकी आवाज, खुले रखना द्वार. इस संग्रह से गुजरते हुए महसूस होती है दरवाजे पर दस्तक कि मानो बुद्ध लौट आये हैं. अचानक टूटने लगती है दुख की कारा, खिल उठते हैं तमाम फूल क्योंकि बुद्ध का होना, धरती का, रंगों का, ऋतुओं का, राग का होना है…यह संग्रह आज के दौर की जरूरत है. इसे जरूर पढ़ा जाना चाहिए कविता संग्रह के तौर पर भी और दु:ख की कारा को तोडऩे के हथियार के तौर पर भी. 
पुस्तक- दुख का देश और बुद्ध- कविता संग्रह
कवि- आलोक श्रीवास्तव
मूल्य- रुपये 75 
प्रकाशन- संवाद प्रकाशन, शास्त्रीनगर, मेरठ. 
(दैनिक जागरण में २ मई को प्रकाशित  )
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आइये इसी संग्रह से पढ़ते हैं एक कविता- 


बुद्ध का होना 
एक फूल का खिलना  है
हवा में महक का बिखरना
और दिशाओं में रंगों का छा जाना है

बुद्ध का होना 
अपने भीतर होना है
 दु:ख को समझते हुए जीना

पता नहीं पृथ्वी पर 
कितने कदम चले बुद्ध ने
कितने वचन कहे
कितनी देशना  दी 
पर बुद्ध का होना 
मनुष्य में बुद्ध की संभावना  का होना है
दु:ख की सहस्र पुकारों के बीच
दु:ख से मुक्ति की एक वचनश्रुति का होना है

बुद्ध का होना
धरती का, रंगों का, ऋतुओं का
राग का होना है…
(कवितायेँ जारी….)

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