Feeds:
Posts
Comments

Archive for the ‘कविता’ Category

>मेरे लोगो!
दु:ख से समझौता न करना
वरना दु:ख भी कड़वाहटों की तरह तुम्हारे $जायके का हिस्सा बन जायेगा
तुम दु:ख के बारे में $गौर करना…
उसकी माहीयत जानना, उसकी तुम ड्राइंग करना
और सर जोड़कर उस तस्वीर से बातें करना
गली के बाहर मैदानों में, खेतों में,
घर की छतों के ऊपर
हर तरफ बातें करना, दु:ख की, आनेवाले सुख की
मेरे लोगो!
दु:ख को जब पहचानोगे तो उसका कर्ज उतारोगे
इक-इक पैसा जमा करना सुख की ख़ातिर
हथियार बनाना, ज़ेहनों में, तस्वीरों में तहरीरों में
फिर दु:ख के आगे डट जाना
और ऐसी दीवार बनना जिसकी तैयारी में का$फी दिन लगे हों
का$फी लोग लगे हों
सारी खूबियां उस दीवार में हो, सब सैलाबों के आगे डट जाने की
मेरे अच्छे लोगो!
क्या तुमने सोचा है के: दीवारें भी नंगी हो जाती हैं कुछ ईंटों के गिर जाने से
तुम सोच-समझ के अपने संगी साथी बनाना
ईंटों को गिरने न देना
धीमी आंच में धीमे-धीमे बातें करना दु:ख की,
सुख की तुममें जो सबसे अच्छी बात करेगा
वही तुम्हारा साथी होगा-वही तुम्हारा सूरज होगा
मेरे लोगो!
दु:ख के दिनों में सूरज के रस्ते पर चलना
उसके डूबने-उभरने के मं$जर पर $गौर करना
मेरे लोगो!
झील की मानिंद चुप न रहना
बातें करना, चलते रहना, दरिया की रवानी बनना
मेरे लोगो!
दु:ख से कभी समझौता मत करना, हंसते रहना
दु:ख के घोड़े की लगामों को पकड़ कर हवा से बातें करना
ऊंचा उडऩा.
– शाईस्ता हबीब

Advertisements

Read Full Post »

> मेरी आंखें निकाल दो

फिर भी मैं तुम्हें देख लूंगा
मेरे कानों में सीसा उड़ेल दो
पर तुम्हारी आवाज़ मुझ तक पहुंचेगी
पगहीन मैं तुम तक पहुंचकर रहूंगा
वाणीहीन मैं तुम तक अपनी पुकार पहुंचा दूंगा
तोड़ दो मरे हाथ,
पर तुम्हें मैं फिर भी घेर
लूंगा और अपने ह्दय से इस प्रकार पकड़ लूंगा
जैसे उंगलियों से
ह्दय की गति रोक दो और मस्तिष्क धड़कने लगेगा
और अगर मेरे मस्तिष्क को जलाकर खाक कर दो-
तब अपनी नसों में प्रवाहित रक्त की
बूंदों पर मैं तुम्हें वहन करूंगा।
(अनुवाद- धर्मवीर भारती )

Read Full Post »

>
बाबुल जिया मोरा घबराये
बिन बोले रहा न जाये
बाबुल जिया मोरा घबराये…
बाबुल मेरी इतनी अरज सुन लीजो
मोहे सुनार के घर न दीजो
मोहे $जेवर कभी न भाये
बाबुल जिया मोरा घबराये…
बाबुल मेरी इतनी अरज सुन लीजो
मोहे व्यापारी के घर न दीजो
मोहे धन-दौलत न सुहाये…
बाबुल जिया मोरा घबराये…
बाबुल मेरी इतनी अरज सुन लीजो
मोहे राजा के घर न दीजो
मोहे राज न करना आये
बाबुल जिया मोरा घबराये…
बाबुल मेरी इतनी अरज सुन लीजो
मोहे लुहार के घर दै दीजो
जो मेरी जंजीरें पिघलाये….
बाबुल जिया मोरा घबराये…
– प्रसून जोशी

Read Full Post »

>कैसे अपने दिल को मनाऊं मैं,
कैसे कह दूं कि तुझसे प्यार है,
तू सितम की अपनी मिसाल है,
तेरी जीत में मेरी हार है।

तू तो बांध रखने का आदी है,
मेरी सांस-सांस आजादी है,
मैं जमीं से उठता वो नग्मा हूं,
जो हवाओं में अब शुमार है।

मेरे कस्बे पर, मेरी उम्र पर,
मेरे शीशे पर, मेरे ख़्वाब पर
ये जो पर्त-पर्त है जम गया,
किन्हीं फाइलों का गुबार है।

इस गहरे होते अंधेरे में,
मुझे दूर से जो बुला रही,
वो हंसी सितारों की जादू से भरी,
झिलमिलाती कतार है।

ये रगों में दौड़ के थम गया,
अब उमडऩे वाला है आंख से,
ये लहू है जुल्म के मारों का
या फिर इंकलाब का ज्वार है।

वो जगह जहां पे दिमाग से
दिलों तक है खंजर उतर गया,
वो है बस्ती यारों खुदाओं की,
वहां इंसा हरदम शिकार है।

कहीं स्याहियां, कहीं रोशनी,
कहीं दोजख़ और कहीं जन्नतें
तेरे दोहरे आलम के लिए,
मेरे पास सिर्फ नकार है।
– गोरख पांडे

Read Full Post »

> जब गतिरोध की स्थिति

लोगों को अपने शिकंजे में
जकड़ लेती है
तो वे किसी भी प्रकार की
तब्दीली से हिचकते हैं,
इस जड़ता और निष्क्रियता
को तोडऩे के लिए
एक क्रांतिकारी स्पिरिट की
$जरूरत होती है
इस परिस्थिति को बदलने के लिए
यह $जरूरी हैकि क्रंाति की स्पिरिट
ताजा की जाए ताकि
इंसानियत की रूह में
हरकत पैदा हो।
(असेम्बली में बम फेंकने के बाद अदालत ने जब भगतसिंह से पूछा कि क्रांति क्या है,
तब उन्होंने इस कविता के ज़रिये क्रांति को परिभाषित किया था.)

Read Full Post »

>मुझे एक सीढ़ी की तलाश है
सीढ़ी दीवार पर चढऩे के लिए नहीं
बल्कि नींव में उतरने के लिए
मैं किले को जीतना नहीं
उसे ध्वस्त कर देना चाहता हूं।
– नरेश सक्सेना

Read Full Post »

>लोहे का स्वाद
लोहार से मत पूछो
उस घोड़े से पूछो
जिसके मुंह में है लगाम
– धूमिल

Read Full Post »

Older Posts »