Feeds:
Posts
Comments

Archive for the ‘कशी की कहानी’ Category

>

काशीनाथ सिंह
लड़ाइयां ढेर सारी लड़ी गईं वीरों की इस धरती पर और धरती पर ही क्यों, पानी पर भी और आसमान में भी, यहां तक कि घर-घर में. चाहे वह राजपूतों का जमाना रहा हो, चाहे मुगलों का, चाहे अंग्रेजों का, लेकिन गली में लड़ाई केवल एक लड़ी गई है और वह भी इस नगर में, यह उसी लड़ाई की दास्तान है।
देश को आजाद हुए, मुश्किल से चार-पांच साल हुई थे, उन्हीं दिनों इस गली में कोई खानदानी रईस रहते थे, जिनका नाम राणा से शुरू होता था और चंदेल पर जाकर खत्म होता था. इतने लंबे नाम से उन्हें कोई नहीं जानता था, लोग जानते थे उनके तखल्लुस शौक से. उन्हें इस बात का बखूबी इल्म था कि उर्दू के जितने भी बड़े-बड़े शायर वगैरह हुए हैं, ज्यादातर के तखल्लुस दो हर्फों के रहे हैं-मसलन मीर, सौदा, जौक, जोश, वगैरह. इसी की देखादेखी जब उन्होंने शायरी शुरू की थी तो अपना नाम शौक रखा था और यह नाम और कहीं चला हो या न चला हो, कोठे पर खूब चला. लेकिन जब उम्र के साथ-साथ यह शौक छूटा तो उन पर ऐसा शौक चढ़ा जिसने उनकी शोहरत देश के कोने-कोने तक फैलाई. जिसे देखो, वही उसी गली की तरफ चला जा रहा है, जिधर शौक साहब का गरीबखाना है।
शौक साहब चार मरातिम वाली अपनी कोठी में तीसरी अंटारी की उस खिड़की के पास बैठे रहते थे, जो गली की तरफ खुलती थी. उनके पास सारा कुछ था लेकिन सब उनके लेखे माटी के मोल था. हाथी था, लेकिन चढ़ते नहीं थे. घोड़े थे लेकिन दौड़ाते नहीं. बग्घी और कार भी थी, लेकिन हुआ करे. यह सारा कुछ इसलिए था कि रईस कि पास होना चाहिए. ये सब कोठी के पिछवाड़े वाले बगीचे में, जहां नौकरों-चाकरों के लिए दड़बे बने हुए थे, पड़े-पड़े चिंग्घाड़ा या हिनहिनाया करते थे. कहीं दूर देहात में उनके सैकड़ों एकड़ के फार्म भी थे, जिनमें अच्छी पैदावार होती थी, लेकिन शौक साहब को इन सबसे नहीं, सिर्फ पान, कत्था, सुपारी और चूने से मतलब था.शौक साहब जिस खिड़की के पास बैठते थे, उसके बगल में चांदी की पन्नियों में लिपटी पान की गिलौरियों से एक तश्तरी सजी रहती, जिसमें महंगी से महंगी खुशबूदारी जर्दे की डिब्बियां पड़ी रहतीं. वे मूड के मुताबिक गिलौरी और तंबाकू मुंह में डालते, देर तक तबियत से घुलाते और ताक-तूककर खिड़की के बाहर गली में थूक मारते.जब भी उनकी पीक खिड़की के बाहर आती, किसी न किसी के सिर और कपड़ों पर पड़ती. इतिहास बताता है कि मुंह का ऐसा सटीक निशानेबाज इस नगर में कभी नहीं हुआ. कहने वाले तो कहते हैं कि कभी-कभी लोग उनके अचूक निशाने का इम्तिहान लेने के लिए नीचे से इकन्नी या अधन्नी उछालते थे, लेकिन जब वह टनटनाती हुई सड़क पर गिरती थी, तो पीक में भीगी न$जर आती थी.तो जिस आदमी के कपड़े-कुरता और धोती लाल होते, उस पर होने वाली प्रतिक्रिया शौक साहब बड़े गौर से देखते क्या वह बाएं-दाएं ताककर चुपचाप निकल जाना चाहता है? क्या वह खिड़की की ओर सिर उठाता है, भुनभुनाता या उन्हें कोसता है? और अंत में कपड़े झाड़कर चल देता है? ऐसे शरीफ और कायर किस्म के आदमियों से उन्हें घिन आती और बची-खुची पीक की सिट्टी पीकदान में थूक देते. उन्हें ऐसे बहादुरों की तलाश रहती, जो कपड़े खराब होते ही मां-बहन की धुआंधार गालियां बकना शुरू करें, उछलें-कूदें, आसमान सिर पर उठा लें, रो-रोकर मोहल्ले और राह चलतों को अपना इर्द-गिर्द जुटा लें, फिर बिलखें-बिलबिलाएं और दया की भीख मांगते हुए, इंसाफ का वास्ता देते हुए बताएं कि अब वे क्या पहनेंगे, उनका क्या होगा?ऐन इसी वक्त, जब वे माथा पीट-पीटकर ऊपरवाले की गालियां दे रहे होते, उसी कोठी से दो नौकर निकलते और आदर के साथ उस ऊपर ले जाते, उसे चंदन के साबुन से मल-मलकर नहलाया जाता, नया कुरता और नई धोरी पहनाई जाती, इत्र से शरीर को सुवासित किया जाता, अच्छा से अच्छा खाना खिलाया जाता और अंत में उसे हाथी या घोड़े पर जो उसके लिए सपना होते-बिठाकर गली के नुक्कड़ तक विदा कर दिया जाता.ऐसे मेहमानों को पाकर नाम गांव-नगर के बाहर दूर-दूर तक पहुंचने लगा. लोग हर जगह चर्चा करते कि गरीब निवाज की एक कोठरी धोतियों से भरी हुई है और दूसरी अद्धी और तांजेब के कुरतों से. बरामदे में बराबर दो-तीन दर्जी सिलाई का काम करते रहते हैं।
इन खबरों का अंजाम यह हुआ कि लोग तरह-तरह की गालियां सीखते, रोने-कलपने की आदत डालते और फिर गली का चक्कर लगाना शुरू कर देते. पता नहीं, कब सरकार का मन बन जाए और थूक बैठें.लिहाजा अपने पर थुकवाने वालों की जो भीड़ बढऩी शुरू हुई, उसका कोई अंत नहीं था.लेकिन साहब, तारीफ कीजिए शौक साहब की, पीक की तरह उनकी नजर भी अचूक थी. आप दो चार दिन तो क्या महीनों तक उस गली में टहला कीजिए वे आप पर नहीं नहीं थूकेंगे, सो नहीं थूकेंगे. वे उस आदमी को उसकी चाल से पहचान लेते हैं-एसी काबिलियत किस शख्स में है? कौन गालियां देते-देते रो सकता है? यही नहीं, कोई लाख अनजान बनकर खिड़की को अनदेखा करते हुए नीचे से गुजरने की कोशिश करे, वे समझ जाते कि अभी कितने रोज या हफ्ते या महीने पहले यह कम्बख्त सुअर, अपने पर थुंकवा चुका है? कभी-कभी तो, जब बर्दाश्त के बाहर हो जाता, झल्लाकर बोल भी पड़ते, अबे हरामखोर, अभी महीना भी नहीं बीता कि फिर आ पहुंचा? या तैं कैसे आ गया रे? मैंने क्या कहा था? तेरे को ठीक से गालियां भी नहीं आतीं? आ गईं क्या? या अरे, यह कौन है चिथडू का बाप, ससुर नहीं तो! मैंने कोई ठेका लिया है तेरे घर-भर का. भाग यहां से.कुछ दिन तक तो कई ऐसे लोग भी जो कभी घरानेदार थे, लेकिन वक्त की मार से खस्ताहाल हो रहे थे, पगड़ी के नीचे अपना चेहरा छिपाए और सिर झुकाए उसी गली से गुजरते और पीक की उम्मीद में खिड़की के नीचे पहुंचते ही अपनी चाल धीमी कर देते. शौक साहब की पकड़ में आ जाते और वे बेमुरौव्वत होकर टोक देते, क्यों मुझे नरक में ठेल रहे हो महाराज. मैं तो ऐसे भी कुरता धोती दे देता. लेकिन क्या करूं अपने कौल से हारा हूं. या बस करो बाबू साहब. गालियां तो दे लोगे मगर रो कैसे पाओगे? आदत तो डाली नहीं. और खामखाह ऊपर से मुझे बदनाम करोगे कि शौक अपनी ही जात पर थूंकता है.इस तरह शौक साहब ने जनता को अहसास करा दिया कि उनकी पीक के सच्चे हकदार कौन हैं?
क्रमश…
Advertisements

Read Full Post »