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Archive for the ‘क़र्ज़ उधर’ Category

>सौगात में कुछ नहीं मिलता
जो भी है कर्ज है.
सिर से पैर तक कर्ज में डूबे हैं हम।
अपने अस्तित्व का कर्ज चुकाना है
सव्त्व देकर
िजंदगी के लिए जान देनी होगी।

यहां यही व्यवस्था है
दिल लौटाना और जिगर भी
हाथ पैर की उंगलियां तक
वापस चली जाएंगी।

अब तुम चाहो तो भी
यह करारनामा
फाड़कर फेंक नहीं सकते
चुकाने ही होंगे यह कर्ज
चाहे अपनी खाल बेचकर चुकाओ।

कर्जदारों की भीड़ में मैं
इस ग्रह परभटकने के लिए छोड़ दी गई हूँ
कोई अपने परों के कर्ज से लदा है
तो कोई परवाज की
कुछ ऐसे भी हैं, जिन्हें चाहे-अनचाहे
एक -एक फूल, एक-एक पत्ते का कर्ज चुकाना है।

हमारा रेशा-रेशा उधार है
एक कण भी नहीं बचाया जा सकता।

यह फेहरिस्त
कभी न खत्म होने वाली फेहरिस्त बताती है
की हमें खाली हाथ ही नहीं
बिना हाथों के लौटना है।

अब कुछ याद नहीं
की मैंने कब, कहां, क्यों और किसे
अपने नाम पर यह उधार-खाता खोलने दिया।

हम इसके खिलाफ आवाज उठाते हैं
शायद यह आवाज ही आत्मा है
हमारी एकमात्र चीज
जो इस फेहरिस्त में शामिल नहीं।

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