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Archive for the ‘गर्व’ Category

>कबीर गर्व न कीजिए ऊंचा देख आवास
काल परौ भुंई लेटना ऊपर जमसी घास।

ज्यों नैनों में पुतली त्यों मालिक घट माहिं
मूरख लोग न जानहिं बाहिर ढूंढन जाहिं।

जब तू आया जगत में लोग हंसे तू रोए
ऐसी करनी न करी पाछे हंसे सब कोए।

पहले अगन बिरह की पाछे प्रेम की प्यास
कहे कबीर तब जाणिए नाम मिलन की आस।

कबीर यहु घर प्रेम का खाला का घर नाहिं
सीस उतारै हाथि करिसो पैसे घर माहिं।

माला तो कर में फिरे जीभ फिरे मुख माहिं
मनुआ तो चहुं दिश फिरे यह तो सिमरन नाहिं।

कबीर माला काठ की कहि समझावे तोहि
मन न फिरावै आपणां कहा फिरावे मोहि।

जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं
सब अंधियारा मिटि गया जब दीपक देख्या माहिं।

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