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Archive for the ‘जिंदगी’ Category

> दा…दा…दा…करके बोलना शुरू भी नहीं किया कि एक तलाश साथ हो चली। पूरे घर में कुछ न कुछ ढूंढते फिरना। कभी कुछ गिराना, कुछ उठाना। कुछ चीजों को मुंह में डालकर स्वाद लेकर परखना…कान उमेठे जाना। फिर वही करना…फिर बड़े होना…तलाश जारी। अनजानी तलाश…जाने क्या ढूंढता है ये मेरा दिल…जैसे ख्यालों में घिर जाना।

सुख…हां शायद यही होगा…सब तो इसे ही ढूंढते हैं। लेकिन ऐसा भी तो हुआ है कई बार कि जब सुख या खुशी से सामना हुआ तो दिल का कोई कोना बेतरह भीग गया। जाने किस $गम की कसक हर खुशी में घुल जाती, चुपके से।
फूल, पत्ती, नदियां, पहाड़, चिडिय़ा, संगीत कुछ भी नहीं भाता। जी चाहता रबर से मिटा ही डालूं सब कुछ। एकदम खाली हो जाये कैनवास। या फिर आसमान के उस पार झांककर देखूं, कहीं वहां मेरा कोई हिस्सा तो नहीं। वजूद का कौन सा हिस्सा न जाने कब, कहां गिर गया हो। अगर तलाश है, तो $जरूर कुछ तो होगा ना जिसकी तलाश है। इसी तलाश के दरम्यिान कभी किसी पल में जिं़दगी को बेहद करीब पाया भी है…यह तस्वीर ऐसे ही पलों में से एक है। लाइफ इज अ सर्च….
(हमारे साथी फोटोग्राफर अतुल हुंडू की एक फोटो $िजंदगी झांकती है जहाँ )
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> िजंदगी में तो सभी प्यार किया करते हैं
मैं तो मर कर भी मेरी जान तुम्हें चाहूंगा।

तू मिला है तो एहसास हुआ है मुझको
ये मेरी उम्र मोहब्बत के लिए थोड़ी है,

इक $जरा सा $गमे दौरा का भी है ह$क है जिस पर
मैंने वो सांस भी तेरे लिए रख छोड़ी है

तुझ पे हो जाऊंगा कुर्बान तुझे चाहूंगा
मैं तो मरकर भी मेरी जान तुझे चाहूंगा…

अपने जज़्बात में नग़्मात रचाने के लिए
मैंने धड़कन की तरह दिल में बसाया है तुझे,

मैं तस्सवुर भी जुदाई का भला कैसे करूं
मैंने $िकस्मत की लकीरों से चुराया है तुझे,

प्यार का बनके निगहेबान तुझे चाहूंगा
मैं तो मरकर भी मेरी जान तुझे चाहूंगा…

तेरी हर चाप से जलते हैं ख्य़ालों में चिरा$ग
जब भी तू आये जगाता हुआ जादू आये

तुझको छू लूं तो फिर ऐ जाने तमन्ना मुझको
देर तक अपने बदन से तेरी खुश्बू आये

तू बहारों का है उन्वान तुझे चाहूंगा
मैं तो मरकर भी मेरी जान तुझे चाहूंगा…

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>चिराग मांगते रहने का कुछ सबब भी नहीं
कैसे बताये कि अब तो शब भी नहीं

जो मेरे शेर में मुझसे जियादा बोलता है
मैं उसकी बज्म में इक हर्फ-ए-जेर-ए-लब भी नहीं

और अब तो िजन्दगी करने के सौ तरीके हैं
हम उसके हिज्र में तनहा रहे थे जब भी नहीं

कमाल शख्स था जिसने मुझे तबाह किया
खि़लाफ उसके ये दिल हो सका है अब भी नहीं

ये दु:ख नहीं कि अंधेरों से सुलह की हमने
मलाल ये है कि अब सुबह की तलब भी नहीं

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चेहरा मेरा था निगाहें उसकी
खामोशी में भी वो बातें उसकी

मेरे चेहरे पे गजल लिखती गयीं
शेर कहती हुई आखें उसकी

शोख़ लम्हों का पता देने लगीं
तेज होती हुईं सांसें उसकी

ऐसे मौसम भी गुजारे हमने
सुबहें अपनी थीं, शामें उसकी

ध्यान में उसके ये आलम था कभी
आंख महताब की, यादें उसकी

रंग जोइन्दा वो, आये तो सही
फूल तो फूल हैं, शाखें उसकी

फैसला मौज-ए-हवा ने लिक्खा
आंधियां मेरी, बहारें उसकी

खुद पे भी खुलती न हो जिसकी नजर
जानता कौन जबाने उसकी

नींद इस सोच से टूटी अक्सर
किस तरह कटती हैं रातें उसकी

दूर रहकर भी सदा रहती हैं
मुझको थामे हुए बांहें उसकी
जोइन्दा- जिज्ञासु

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