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Archive for the ‘डायरी’ Category

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कहते हैं कि हमारा एकान्त हमें मांजता है. परिमार्जित करता है. एक समय में मैंने इस एकान्त को खूब-खूब जिया है. इतना कि मेरा ‘मैं’ मेरे सामने किसी नन्हे बच्चे की तरह अनावृत पड़ा होता था. अच्छा, बुरा सब स्पष्ट. अवसाद के ढेर सारे टुकड़ों ने उस ‘मैं’ को छलनी कर रखा था. वो लहूलुहान सा कातर सा सामने पड़ा होता था और मेरे पास उसे देखकर रो देने के सिवा कोई उपाय नहीं होता था. हम दोनों खुलकर गले मिलते. लंबी सिसकियां अक्सर सीने में छुप जातीं. जल्दी ही हमने एक-दूसरे की मजबूरियां समझ लीं और एक-दूसरे को जैसे हम थे, अपना लिया.
फिर एकान्त से भागने का सिलसिला  शुरू हुआ. तूफान की तरह काम को अपने जीवन में आने दिया और उसमें खुद को डुबो दिया. अब उस घायल ‘मैं’ को देखती नहीं थी. उससे नजरें चुराकर खुश थी कि चलो, सब ठीक ही है. लेकिन अचानक काम की रफ्तार के बीच कभी सीने में दर्द उठता तो लगता कि ये दर्द जाना पहचाना है.
हम अपने अतीत से भागकर अपना वर्तमान या भविष्य नहीं बना सकते. अतीत को अपनाकर उसे समझकर और उससे खुद को मुक्त करके जरूर आगे बढ़ सकते हैं. इसी जद्दोजहद में नींद से रिश्ता टूट चुका था. उसे मनाने की सारी कोशिशें थकी हारी कमरे में बिखरी पड़ी रहतीं. बस कुछ दवाइयों के रैपर ही अपनी जीत पर मुस्कुराते.
आज ऐसी ही उधार की एक नींद के बाद घंटों दीवार के उस खाली पड़े कोने को ताकते हुए जिस पर कभी सोचा था कि वॉन गॉग की पेंटिंग लगाऊंगी…अतीत के न जाने कितने टुकड़े सिनेमा की रील की तरह खुलने लगे . शुरुआत में अतीत के वे टुकड़े डरे-सहमे से पलकों की ओट से झांकते कि कहीं डांटकर भगा न दिए जाएं. फिर हिम्मत कर सबके सब कमरे में धमाचौकड़ी करने लगते. कोई टुकड़ा दीवार पर जाकर चिपक जाता और खुलना शुरू हो जाता.
वो भी क्या दिन थे जब कॉलेज से छूटकर अक्सर श्मशान घाट के किनारे घंटों बैठा करती थी. जीवन का अंतिम पड़ाव देखने का जाने कैसा मोह था.. कई बार डांटकर भगाई भी गई. फिर भी जाना जारी रहा…एक बार बहुत बारिश हो रही थी और एक गरीब मां सूखी लकडिय़ों के लिए एक मोटे आदमी के सामने गिड़गिड़ा रही थी. उस रोज उसके बच्चे के मरने के दु:ख पर सूखी लकडिय़ों के लिए तरसने का दुख भारी हो आया था.
आज दीवार पर न जाने क्या-क्या दर्ज हो रहा है. भीतर का गहरा खालीपन अतीत के टुकड़ों को डपटता है तो मैं उसे मना करती हूं. सब अपना ही तो हिस्सा है. रिल्के को याद करती हूं. हंस देती हूं. ‘अगर तुम्हारे भीतर अब तक के अवसाद से बड़ा अवसाद जन्म ले रहा है तो समझो कि जीवन ने तुम्हें बिसारा नहीं है. वो तुम्हारा हाथ थामे चल रहा है.’ रिल्के भी ना कसम से क्या-क्या लिखते हैं, कभी मिलें तो पूछूं कि ये जो इतना अवसाद है इसे रखें कहां यह भी तो बताइये. और जो न होना चाहूं जीवन में, बस सांस लेना चाहूं बहुत सारे लोगों की तरह तो..जीवन आसान न हो जाए…नहीं, प्रतिभा तुम अभिशापित हो जीवन में होने को. कोई आवाज आती है. मैं अवसाद से समझौता कर लेती हूं. उसका स्वाद मीठा सा लगता है.
दीवार के उस खाली कैनवास पर अतीत की तमाम डॉक्यूमेंट्रीज चल रही हैं. उधार की अधूरी सी नींद आंखें मल रही है. गंगा की लहरों में खुद को मुक्त करने की इच्छा…मणिकर्णिका घाट पर उठती ऊंची लपटों में एक उत्सव की तरह लुभाती मृत्यु. ठीक उसी वक्त प्रकाश की आवाज उभरती है… जिंदगी में तो सभी प्यार किया करते हैं, मैं तो मरके भी मेरी जान तुम्हें चाहूंगा…प्रकाश की आवाज गंगा की लहरों से धुली हुई मालूम होती है. गंगा आरती की आवाज बहुत पीछे छूट गई है कहीं…दीवार पर आसमान तक ऊंची उठती लपटें हैं, गंगा की लहरें हैं और प्रेम की असीम कामना लिए एक आवाज…अरे हां, मोगरे के फूलों की खुशबू भी है कहीं आसपास…वो दीवार पे नहीं है…
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ऑफिस पहुंचने पर हमें एक मशीन पर अपनी उंगली रखनी होती है. किर्रर्रर्र सी आवाज आती है और उंगली रखने वाले का नाम मशीन पर उभरता है. समय भी. इस तरह हम अखबार के कारखाने में अपनी आमद दर्ज करते हैं. कभी-कभी मशीन उंगली को पहचानने से इनकार कर देती है. लिखकर आता है इनवैलेड फिंगर. जब भी ऐसा होता है, अनायास मेरे चेहरे पर मुस्कान बिखर जाती है. अब मैं दूसरी उंगली कहां से लाऊं…मेरे पास तो यही है. अपनी ही उंगली को देखती हूं कहीं किसी से बदल तो नहीं गई. चेहरा टटोलती हूं, अपना नाम पुकारती हूं. सब कुछ तो है ठिकाने पर. फिर मशीन से मनुहार करती हूं, मान लो ना प्लीज. ये मेरी ही उंगली है. रोज वाली. सच्ची. मशीन मुस्कुराती है. नहीं मानती. मैं फिर मनाती हूं. मानो किसी अदालत में जज को कनविंस कर रही होऊं कि जज साहब मैं ही हूं प्रतिभा…सौ फीसद. हालांकि मेरे अपने होने के सारे प्रमाणपत्र कहीं खो गये हैं. फिर भी हूं तो मैं ही ना? मशीन काफी ना-नुकुर के बाद रहम करते हुए, इतराते हुए ‘हां’ कह देती है और मेरा नाम कारखाने के रजिस्टर में दर्ज हो जाता है…ये खेल मुझे बहुत पसंद है. 

सोचती हूं कभी यूं भी हो सकता है कि आइने के सामने खड़ी हूं और आईना पहचानने से इनकार कर दे. उसमें कोई अक्स ही न उभरे या ऐसा अक्स उभरे जिसे मैं जानती ही न होऊं. रास्तों के साथ तो ऐसा अक्सर ऐसा होता है. जिन रास्तों से रोज गुजरती हूं, किसी दिन वही रास्ते छिटककर मुझसे दूर हो जाते हैं . मैं उन्हें हैरत से, कभी हसरत से देखती हूं. इसी तरह कई बार ऑफिस के पीसी का पासवर्ड नखरे करता है. बार-बार मनुहार करवाता है और फिर एहसान जताते हुए धीरे से मान लेता है. 

अपना ही नंबर डायल करती हूं कभी तो आवाज आती है दिस नंबर डज नॉट एक्जिस्ट. या कई बार इंगेज की टोन मिलती है. कई बार ट्राई करने के बाद अचानक मिल जाता है. हालांकि इनवैलेड वाली ध्वनियां काफी जगह से मिलती रहती हैं. न जाने कितने लोग, कितने कामों को, कितनी बातों को, कितनी ख्वाहिशों को, अरमानों को इनवैलेड करार देते हैं. कोई किर्रर्रर्रर्र की आवाज भी नहीं आती. वे फिर बार-बार कोशिश करने से भी नहीं मानते. 

दिल के किसी कोने से आवाज आती है कि कभी यूं भी तो होगा कि सांसें इस देह की गली का रास्ता भूल जायेंगी या उसे पहचानने से इनकार कर देंगी. अचानक…एरर आ जायेगा और शरीर सांसों से कहेगा दिस इज एन इनवैलेड एरिया टू एक्सेस ब्रेथ…

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