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Archive for the ‘तन्हाई’ Category

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24 नवंबर 1952 में पाकिस्तान में जन्मी परवीन शाकिर के
अल्फाज की खुश्बू से सारी दुनिया अब तक महक रही है.

अक्स-ए-खुशबू हूं, बिखरने से न रोके कोई
और बिखर जाऊं तो मुझको न समेटे कोई

कांप उठती हूं मैं ये सोचकर तनहाई में
मेरे चेहरे पर तिरा नाम न पढ़ ले कोई

जिस तरह ख्वाब मिरे हो गये रेजा-रेजा
उस तरह से न कभी टूट के बिखरे कोई

मैं तो उस दिन से हिरासां हूं कि जब हुक्म मिले
खुश्क फूलों को किताबों में न रक्खे कोई.

अब तो इस राह से वो शख्स गुजरता ही नहीं
अब किस उम्मीद पे दरवाजे से झांके कोई

कोई आहट, कोई आवा$ज, कोई चाप नहीं
दिल की गलियां बड़ी सुनसान हैं, आये कोई.

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