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Archive for the ‘दुनिया के मशहूर प्रेम पत्र’ Category

>कितने असहाय, कितने कमजोर, कितने निरीह हो गये दुनिया के सारे शब्द, जब दिल के भावों को जस का तस पहुंचने की बारी आयी. दुनिया का हर शब्दकोश निरर्थक, सारी भाषायें बौनी. कांपते होठ लेकिन शब्द खामोश. कोरों पर अटका हुआ एक आंसू ही काफी. दुनिया के सारे रूमानी शब्दों ने उस अनमोल आंसू के आगे सजदा किया और कहा प्रेम! सचमुच भाषाओं में, शब्दों में कहां समा पाते हैं भाव, जब बात प्रेम की होती है. तभी तो दुनिया के बड़े से बड़े साहित्यकार प्रेम का इजहार करते समय निरे मूरख ही नजर आये. किसी ने प्रेम में अपने भीतर के भय को व्यक्त किया, किसी ने अनंत की यात्रायें कीं. किसी ने शब्दों को आत्मा की तपिश में तपाकर सोना बना दिया, ताकि वे रूह में जज्ब हो सकें सदियों तक के लिए. कोई तो गुस्से में बिफर ही पड़ा कि तुम समझ जाओ ना सब कुछ, मुझसे नहीं कहा जा रहा कुछ भी.ऊंची-नीची, टेढ़ी-मेढ़ी गलियों से गुजरते प्रेम को दुनिया के मशहूर लोगों के करीब जाकरमहसूस करने का मकसद सिर्फ इतना सा था कि देखें तो जरा इनका क्या हाल हुआ था जब ये प्रेम में थे. बात साफ नजर आई कि सब के सब औंधे मुंह ही पड़े नजर आये। अव्यक्त को व्यक्त करने की पीड़ा में उलझे हुए. अनाड़ीपन में, उलझन में जो कुछ संप्रेषित हुआ वह दरअसल प्रेम की उदात्तता का एक जरा सा हिस्सा भर है.मेरे प्रिय कथाकार प्रियंवद कहते हैं कि प्रेम मनुष्य की स्वतंत्रता की प्रखरतम अभिव्यक्ति है. लेकिन देखिये जरा ये अभिव्यक्तियां इन पत्रों में कितनी कम अभिव्यक्त हो सकी हैं. यह प्रेम ही है जो इतना उदार हो सकता है कि दे सब कुछ और मांगे कुछ भी नहीं. कैसा होता है ये प्रेम है जो ईश्वर के करीब ले जाकर खड़ा कर देता है. जितना देता है, उतना ही मन भरता जाता है. सृष्टिकर्ता खुद सर पर हाथ फेरने को व्याकुल हो उठे, ऐसे प्रेम की पात्रता आसान तो नहीं. प्रेम अतिरेक है, जोखिम है, स्वतंत्रता है. अपने क्षुद्रतम से उठकर अपने ही उच्चतम की ओर जाने का प्रयत्न. खुद से खुद का मिलन. कोई नियम नहीं, कोई बंधन नहीं. हम सब कहीं न कहीं ऐसे गहन प्रेम की एक बूंद के अभिलाषी हैं, जो हमारे जीवन के मरुस्थल को समंदर बना दे. लेकिन प्रेम तो नसीब है और नसीब सबका कहां होता है. हम बस दुआ कर सकते हैं कि जब, कभी यह नसीब हमारे करीब से होकर गुजरे, तो कहीं हमसे ही टकराकर टूट न जाये, बिखर न जाये.
प्रेम से भरे इन पत्रों का ब्लॉग जगत में जिस तरह से स्वागत हुआ, उससे एक बात साफ जाहिर होती है कि भीतर ही भीतर ऐसे सच्चे प्रेम की कामना में सब कहीं न कहीं तरस रहे हैं. कॉफी के झाग में प्रेम का असल रूप गुमा नहीं है अभी तक। ब्लॉग जगत के नये दोस्तों का आभार, जिन्होंने पढऩे में दिलचस्पी दिखाकर हौसला बनाये रखा.रवींद्र व्यास जी का खासतौर पर शुक्रिया जिन्होंने वेब दुनिया पर मेरे ब्लॉग की सुंदरतम रूप में चर्चा की. अमर उजाला अखबार भी जिसने संपादकीय पेज पर मेरी दुनिया को जगह दी. कुछ अंतराल के बाद इसी तरह डायरी देने की योजना है. तब तक…मिलते रहेंगे.
– प्रतिभा

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>25.8.१९७६
मेरी प्रिय,
….बाहर बारिश हो रही है। एक शदीद बारिश. पूरा कस्बा अंधेरे में डूबा हुआ है-सिर्फ यही जगह रोशनी से भरी है, ऐसे जैसे सारे शहर की रोशनी ने भागकर यहां शरण पा ली है. शायद यह जगह रोशनी ही नहीं मेरे लिए भी एक टापू की तरह है, जहां मैं सृष्टि के डूबने के बाद रह जाने वाले, शेष चिन्हों की तरह हूं. कभी-कभी मैं कल्पना करता हूं, ईश्वर के उस भयावह अकेलेपन की, जब सारी सृष्टि डूब जाती होगी और वह वट के पत्ते पर अकेला बचा रहता होगा. वह जरूरत पर किसे पुकारता होगा, प्रलय शून्य सन्नाटे में? उसकी पुकार, ढूंढकर उसी के पास उदास होकर लौट आती होगी. वह अपने ही कानों से सटी उस पुकार के बारे में क्या सोचता होगा? मुझे लगता है यदि मैं उस पत्ते पर अकेला रह जाता, एट द एंड ऑफ यूनिवर्स तो मैं उस पत्ते पर से तुमको पुकारता. ऐसा मैं इसलिए सोचता हूं कि जाने क्यों मेरे शब्दों पर मंडराती है, तुम्हारे हाने और कहीं भी होने की छाया. कभी-कभी वह छाया बहुत निकट जान पड़ती है. मेरे लिखे हुए शब्दों से तब उनकी ध्वनियां जैसे बाहर बिखरती-उफनती लगने लगती हैं. जैसे, तुम्हारा नाम लिखा तो उसमें से उसके साथ अर्थ की आभा बाहर बिखर रही है. लगता है तुम्हारा नाम लिखने का अर्थ पूरे कागज पर रोशनी का फैल जाना हो. और, इस नितांत ठोस अंधेरे में डूबे कस्बे में, छोटी सी रोशन जगह का होना, जैसे तुम्हारा नाम लिख देने से ही संभव हो गया हो. वहां दूर अंधेरे में डूबे कस्बे और उसके लोगों को कहां पता होगा कि यह जो इस वक्त रोशनी का टापू टिमक रहा है, वह क्यों है? कस्बा नहीं जानता कि मैंने बस अभी तुम्हारा नाम लिखा है.बाहर अंधेरा गहरा ठोस सा है और इस जगह से बाहर बहती हवा ऐसी लग रही है, जैसे वह काली और ऊंची दीवारों को ठकठकाती हुई दरवाजा टटोल रही हो, ताकि वह अंधेरे के घेरे से बाहर हो जो. पता नहीं कि ऐसे अंधेरे-डूबे आकाश में कोई आपातकालीन द्वार हो. पर, इन दिनों तो सारा देश जैसे आपातकाल का द्वार बना हुआ है. लोग आपातकाल का स्वागत कर रहे हैं. क्या आपातकाल एक संभावना है?बहरहाल, मैं भी इस अंधेरे से बाहर निकलने के लिए किसी आपातकालीन दरवाजे की तलाश में हूं, पर यह अंधेरा मेरे भीतर का है और तुम्हें खत लिखने की घड़ी आपातकालीन दरवाजे के, बरामद हो जाने की घड़ी जान पड़ती है. कभी-कभी तो मुझे तुम उस उपकरण की तरह लगती हो जिसे डॉक्टर्स गले में लटकाये रहते हैं. मुझे लगता है, मैं उनकी तरह तुम्हारे स्पंदन को पकड़ता रहता हूं, मसलन तुमको कानों के निकट लाकर सुनता हूं. बारिश की आवाज भी, कभी-कभी डॉक्टर्स अपने गले में लटके उस उपकरण को अपने कानों में लगाकर सुनते होंगे, अपनी ही धड़कन को. तुम तक खत के जरिये बार-बार लौटना ऐसा लगता है, जैसे हर बार कोई नया अविष्कार कर लिया हो. यह अविष्कार करने की निरंतरता ही मुझे यहां इतनी दूर जीवित बनाये रखती है. मुझे याद आती है, साइबेरिया से बार-बार भरतपुर के पोखर में उनका ऐसा क्या छूट जाता है, हर बार जिसे वे ढूंढने आते हैं-ढूंढने आते हैं या कि उस छूटे हुए को भर आंख देखने.यकीन रखो एक दिन मैं भी आऊंगा, तुम तक. यही देखने कि ऐसा क्या छूट गया था मेरा तुम्हारे पास, प्रलय से पहले. जब यह मैं लिख रहा हूं तो लगता है, तुम चुप हो. तुम्हारा मौन और-और तराश देता है मेरे उन शब्दों को, जो अभी बोले और लिखे ही नहीं गये हैं. तुम्हारे मौन की धार में तराशी भाषा को लेकर एक दिन तुम्हारे पास आकर रखूंगा और पूछूंगा, लैंगवेज का एस्थेटिक देखना चाहोगी? दरअसल, सच तो यह है कि फिलहाल तुम तक मैं सिर्फ भाषा में ही पहुंचना चाहता हूं। कभी सोचता हूं कि यदि सचमुच में ही पहुंच जाऊंगा तो भाषा का क्या होगा? एक अनुपयोगी पुल की तरह ढह जायेगी। भाषा के पुल के टूटे मलबे के दोनों छोरों पर हम होंगे। तुम्हारे कान तो नहीं सुन पायेंगे, उस पुल के ढहने की आवाज। पर मैं अपने गले में लिपटे उपकरण से जरूर सुन लूंगा, वह धड़ाम की आवाज। वक्त के तेजरफ्त बहाव में बह जायेगा पुल-और मैं वहां से लौट आऊंगा, अपने उसी सन्नाटे में। मैं तुमसे पूछ भी नहीं सकूंगा कि भाषा के मलबे को लांघकर आ सकोगी इस पार। फिर चलने से पहले पूछूंगा एक सवाल कि पुल क्यों बनते हैं और पुल क्यों ढहते हैं? फिर उदास हो जाऊंगा कि एक प्रश्न अपने असंख्य उत्तर रखता है-और कभी-कभी तो उससे एक भी उत्तर नहीं आता। और कभी-कभी आते हैं अनगिनत उत्तर।
बाकी फिर….
पुनश्च:- रात को खत लिखने के बाद, कल से लौटकर सोया और नींद में रातभर बिस्तर में लोट लगाते हुए। एक परिंदे की तरह पंख लगाकर तुम्हारे शहर पर मंडराता रहा उसकी गलियों और कूचों में मैं भागता रहा. कहां ढूंढता तुम्हें भाषा के घर में. आज भी बारिश हो रही है और हवा ऐसी बह रही है, जैसे शहर में रास्ता भटक गयी हो. मैं भी भाषा में भटककर वहां पहुंच गया, जहां मैं पहुंचूंगा भी कि नहीं.

प्रेम तो नसीब है….जारी….

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>सुप्रिय,
थोड़ा तुम्हें अजीब लग सकता है, लेकिन अब इतनी दूर तक साथ चलते हुए मुझे लगने लगा कि तुम मेरे लिए जेंडर की, नाम या जाति की सीमाओं से परे मात्र एक ऐसा वजूद हो, जिसके भीतर से मैं गुजरता हूं और नितान्त किसी और लोक में चला जाता हूं। वहां की नागरिकता को हर कोई हासिल नहीं कर सकता। हो सकता है, उस लोक का मैं ही एकमात्र अकेला नागरिक होऊं। यदि वहां रहकर मुझे किसी से बात भी करना हो तो वापस तुम में से गुजरना होगा। क्या(…), तुम किसी ऐसे संसार की कल्पना कर सकती हो, जिसका ईश्वर और जिसका नागरिक एक ही और एकमात्र व्यक्ति ही हो! यहां तक कि तुम भी उस संसार के इस छोर पर रुका रह जाने वाला कोई चिन्ह हो? क्या तुम उस व्यक्ति के अकेलेपन के सुख या उस अकेलेपन के दु:ख की कल्पना कर पाओगी? बहरहाल, यह अलग बात है कि जब मुझे बात करनी होगी, मैं तुमको रचूंगा और बात करूंगा और कहने की जरूरत नहीं है कि मैं हर खत लिखते समय तुम्हें नये ढंग से रचता हूं। उन्नीस बरस के बाद मैंने तुम्हें अपने लिए और अपनी तरह से रचा। हालांकि, मैं विधाता नहीं हूं। लेकिन मैं तुम्हें रच-रच कर खुद को भी रचता ही हूं। क्योंकि, तुम्हें बीच में रखकर मैं खुद को बार-बार छानता हूं। एक बहुत क्षीण और सूक्ष्म से तार हैं, तुम्हारे होने के जिसके बीच से मैं गुजरता रहता हूं. और, अब मैं इतना बारीक हो गया हूं कि मेरा समूचा अस्तित्व सितारों पर उड़ती धूल की तरह है. तारों भरे आकाश की तरफ देखने का कभी तुम्हें मौका मिले तो मानना, वहां रोशनी की धूल की तरह मैं ही हूं.कल मैंने एक उपन्यास पढऩा शुरू किया था. द लास्ट टेम्पटेशन. यानी क्राइस्ट बनाम यीशू प्रभु की आखिरी कामना. इसमें लेखक ने एक कल्पना की कि क्राइस्ट को जब सूली पर चढ़ाया गया होगा तो मृत्यु के आखिरी क्षणों में उनकी इच्छा मेरी के साथ शारीरिक सुख के अनुभव की रही होगी. वही पवित्र मेरी, जिसे उन्होंने धूल से उठाकर इंसान होने का सम्मान दिया था. मुझे इस उपन्यास को पढ़ते हुए लगा कि इसमें बहुत बड़ी जोखिम है. एक तो यह क्रिश्चियन बिलीफ की किरचें-किरचें उड़ा देता है, दूसरे मुझे यह महत्वपूर्ण लगता है कि क्राइस्ट की विश्वजनीन छवि के बावजूद उन्हें मनुष्य की तरह समझने की एक ईमानदार कोशिश की गयी है. यह कोशिश क्राइस्ट को गिराने और सेक्स की सनसनी बनाने के लिए नहीं है, बल्कि सत्य को ज्यों का त्यों रखकर समझने की है. अब प्रश्न यह उठता है कि सत्य क्या है? सत्य को जानने के नाम पर हम भारतीय भी यह जानते हैं कि यह नहीं, यह नहीं (अर्थात नेति-नेति) अर्थात हम केवल झूठ को पकड़ते हैं और कहते है, यह सत्य नहीं. नतीजतन, अंतहीन विश्लेषण करते जाते हैं. अत: द लास्ट टेम्पटेशन का लेखक यही जानने की कोशिश करता है कि ईसा के बियांड भी कुछ था या ईसा भी एक देह का ही नाम था. क्या कोई भी, आदमी होने को फलांगकर अवतार पुरुष हो सकता है? क्या देह को रखकर बुद्ध या महावीर नहीं बना जा सकता है? मैं बुद्ध का या महावीर का अपमान किये बगैर यह बात कहना चाहता हूं कि क्या मनुष्य हुए बगैर सीधे-सीधे कोई ईश्वर हो सकता है?मुझे उपन्यास इसलिए अच्छा लगा कि लेखक क्राइस्ट के भीतर देह की तलाश क्राइस्ट के लिए नहीं अपने लिए करता है. यह क्राइस्ट की पूज्य छवि का ध्वंस नहीं है. यह वैसा ही है कि एक साधारण आदमी और बुद्ध के देह होने में अलग कहां होते हैं? यहां सेक्स और महानता दोनों प्रश्न की तरह हैं. क्राइस्ट तो एक बहाना है. क्राइस्ट को इस सच्चाई से छानकर देखना अपनी छुद्रता से मुक्त होना है. क्या भारतीयों ने श्रीमती इन्दिरा गांधी या लता मंगेशकर के जीवन में देह के अर्थ को सामने रखकर कभी कुछ लिखने की कोशिश की? महादेवी और मीरा के जीवन में भी देह है और वे उसे लांघकर कहां और किधर गईं? हम मिथ की मीरा या मिथ के क्राइस्ट या मिथ के महावीर को लांघकर उन्हें समझने की कोशिश करें, तो पायेंगे कि सेक्स के ऊपर कैसे उठा जा सकता है? क्या साधना के दौरान बोधिवृक्ष के नीचे बैठकर उन्हें यशोधरा का स्वप्न आया होगा कभी? मुझे तो यही लगता है कि मैं चुप-चुप हमेशा आदमी होने की सीमा से जूझता रहता हूं. और जूझकर वहां चला जाता हूं, जहां सिर्फ मैं ही अकेले नागरिक की तरह टहलता रहता हूं. मुझे तो लगता है द लास्ट टेम्पटेशन एक महान कृति का दर्जा चाहे हासिल न कर पाये, लेकिन क्राइस्ट के बहाने मनुष्य होने की पीड़ा को फलांगकर देखने की कोशिश है. कभी तुमको पढऩे भेजूंगा. प्रिय, कभी-कभी इच्छा होती है, तुम्हारा घर किताबों से भर दूं. कुछ किताबें मुझे ऐसी लगती हैं, जिनकी हर लाइन पढ़कर, उसकी व्याख्या करके तुम्हें बताना चाहता हूं. मैं अच्छा लेखक चाहे न बन पाऊं पर मैं एक बहुत गहरा पाठक बनना चाहता हूं. यह ज्ञान मुझे बहुत पहले प्राप्त हो गया था. तुम्हें खत लिख-लिखकर तो और भी ज्यादा. तुम मेरा बोधिवृक्ष हो, जहां मैं आंख मूंदकर चुपचाप बैठा रहता हूं. एक दिन मैं तुम्हारे पास आऊंगा. पुस्तकों का एक बड़ा सा गट्ठर लेकर. इससे प्यारी चीज तुम्हारे लिए क्या होगी. बाकी ठीक.
तुम्हारा……..

प्रेम पत्रों की अन्तिम कड़ी कल….

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>4। 6। ७६
प्रिय….
तुम्हारे खत में यह शब्द पढ़कर मैं भीतर ही भीतर गहरे तक उदास हो गया। लेकिन बाहर से खुद को बचा ले जाने के पुराने अभ्यास ने इमदाद की और आंख को गीली होने से बचा ले गया. तुम अच्छी तरह जानती हो कि यह शब्द मेरी आत्मा का पर्याय है. कभी-कभी वहम होता है कि यह शब्द पहले जन्मा कि मैं. कहीं ऐसा तो नहीं कि इस शब्द का दूसरा नाम, मेरा ही नाम न हो. जब यह शब्द तुम्हारे पास बरामद हुआ तो मैं चौंक गया. मेरे भीतर से निकलकर कहां चला गया, तुम्हारे भीतर? इतनी छोटी उम्र में? क्या बता सकोगी, इस सवाल का उत्तर?क्या बताऊं, अभी तक भाषा का गला भरता था और शब्द की आंख डबडबा आती थी-लेकिन, आज शब्द नहीं, मैं रोया. क्योंकि आज ही तो साफ की मैंने अपने अतीत के आइने की धूल.वैसे तुम जानती हो कि अफसोस शब्द समूचे साहित्य का मूलभाव है. दुनिया की तमाम महान कृतियां किसी पश्चाताप के बोध की ही पैदाइशे हैं. दैट इज व्हाई गिल्ट इज एक इंपॉर्टेंट वर्ड. इट टेल्स अस व्हाट वी हैव डन रांग. तुम्हें क्या बताऊं होल ऑफ माई लाइफ हैज बीन द टेस्टिमोनी ऑफ माई वीकनेस. प्रेम और पश्चाताप शायद एक तरह से डिवाइन डायक्टमी हैं. दोनों एक तरह के युद्ध की किस्में हैं. अदृश्य और धारावाहिक. मैं भीतर हरदम परेशान रहता हूं. एज इफ देयर इज ग्रोइंग अ डिस्कम्फर्ट इनसाइड मी. एक किस्म की सफरिंग है. तमाम रिश्ते और खासकर ऐसे, जिनकी ठीक-ठीक सी परिभाषाओं के लिए हम परेशान रहते हैं. परिभाषा हमें अपने लिए नहीं, उन लोगों के लिए चाहिए जो एक दिन सवाल करेंगे हमसे. और तब हमारे पास चुप रह जाने के सिवा कुछ नहीं होगा. क्या कुछ रिश्तों के उत्तर सिर्फ चुप्पियों में ही होते हैं.मेरे लिए तुम क्या हो नहीं जानता पर यू आर नॉट अ सिंपल गर्ल ऑर अ पर्सन विद एन अपोजिट सेक्स, रैदर समथिंग डिफरेंट, दैट इज टु गेट डिफाइंड एज अ सोल मेट. दिस मे नॉट बि द न्यू एंड अनयूजुअल वर्ड फॉर दैट यू हैव टु टर्न द पेजेस ऑफ डिक्शनरी. द कॉमनली यूज्ड वड्र्स कैन ऑफेन मिसडिफाइंड, सो मे कॉज कनफ्यूजन्स.पश्चाताप को लेकर शायद दॉस्तोएव्स्की ने ही सबसे सुंदर कहानियां लिखी हैं. कहते हैं दॉस्तोएवस्की ने किसी कच्ची उम्र की बालिका के साथ शारीरिक सलूक जैसा कर लिया था और इसी कारण एक गिल्ट उसके भीतर कहीं जगह कर गयी थी. मुझे लगता है कि कुन्ती की आंख में अर्जुन नहीं, कर्ण को लेकर आंसू कहीं ज्यादा गाढ़े और मोटे आये होंगे. बहरहाल, मेरे भीतर तो अफसोस या पश्चाताप जैसा शब्द बहुत पहले से है, वजह यह कि मैंने बहुत से जरूरी काम या तो वक्त से बहुत पहले कर लिए या वक्त के बहुत बाद-और दोनों ही स्थितियों में एक ही शब्द हाथ लगता है और वह शब्द है अफसोस. इसका एक बड़ा कारण यह भी रहा कि मेरी आंखों की साइज सपनों के हिसाब से उपयुक्त नहीं थी. तुम ही सोचो जख्मी आंखों से सपने देखना सपनों को लहूलुहान कर लेना होता है, और मेरे भीतर यह भय हमेशा बना रहा है. मैं गहरी झिझक के साथ कहना चाहता हूं कि तुम्हें खत लिखते हुए हरदम एक संदेह बना रहता है कि मालूम नहीं कि मैं कितना हूं तुम्हारे भीतर. हूं भी कि नहीं. वैसे, बाहर भी कितना हूं मैं अपने से और अपने लिए. एक सन्नाटा चलहकदमी करता रहता है मेरे भीतर और मेरे बाहर भी, जिसके बीच अकसर चूकने की चीखें भी गूंजती रहती हैं. ऐसे में पूरा का पूरा घर भी मुझमें अपनी सांस ले रहा लगता है, क्योंकि अभी भाइयों की पढ़ाई और नौकरियां लगना शेष है, एक अंधेरा है, जिसके भीतर भी अंधेरा ही छुपा हुआ है. इसीलिए हर बार तुम्हें खत लिखते हुए कुछ जरूरी शब्द लिखने से इरादतन बाहर रह जाते हैं. सैकड़ों ऐसे वाक्य ज़ेहन में आये, मगर वे लिखे जाने के पहले ही गुमशुदा की फेहरिस्त में शामिल हो गये.बस मुझे लिखना ही बिखरने से बचाता रहा है. तुम्हारे खतों की निरंतरता भी इसमें बहुत इमदाद करती है लेकिन यह सोचकर डर जाता हूं कि कहीं यह लड़की खत लिख-लिखकर मुझ पर परोक्ष दया तो नहीं कर रही हूं. मुझे कीर्केगार्द की याद आ रही है, जिसे एक लड़की के दयाबोध ने तोड़ दिया था. पर मैं ऐसे ख्याल को झटककर सोचता रहा हूं. माई ग्रेटेस्ट वेल्थ इज दैट यू लाइक टु लिसन मी, यू रीड माई राइटिंग्स एंड अडोर मी. आई डोंट वांट एनी अवॉर्ड ऑर रिवॉर्ड फॉर माईसेल्फ, सिंस आई एम कान्सटेंटली चाज्र्ड बाई द रेसपेक्ट, लव, अफेक्शन, आई रिसीव फ्रॉम यू. दैट इज व्हाई आई एम क्रिएटिवली अलाइव अमंग टीज सरकमस्टांसेस. नहीं जानता हम कहां होंगे. टाइम विल टेल, हू इज अराउंड, व्हेन इयर्स विल रोल बाई. तुम्हारे नाम का अर्थ चाहे बहुत कीमती चीज का पर्याय हो-लेकिन वह एक धीमी और आत्मदीप्त-सी रोशनी का नाम भी तो है. यह मेरे भीतर एक कांपती लौ की तरह धीमे-धीमे टिमकता रहता है हर क्षण, बाकी ठीक. आई एम फिटेड टु स्टे अलोन इन द लाइफ.
तुम्हारा………….
सिलसिला जारी….

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4.12.76

प्रिय….

तुम्हारे खत में यह शब्द पढ़कर मैं भीतर ही भीतर गहरे तक उदास हो गया. लेकिन बाहर से खुद को बचा ले जाने के पुराने अभ्यास ने इमदाद की और आंख को गीली होने से बचा ले गया. तुम अच्छी तरह जानती हो कि यह शब्द मेरी आत्मा का पर्याय है. कभी-कभी वहम होता है कि यह शब्द पहले जन्मा कि मैं. कहीं ऐसा तो नहीं कि इस शब्द का दूसरा नाम, मेरा ही नाम न हो. जब यह शब्द तुम्हारे पास बरामद हुआ तो मैं चौंक गया. मेरे भीतर से निकलकर कहां चला गया, तुम्हारे भीतर? इतनी छोटी उम्र में? क्या बता सकोगी, इस सवाल का उत्तर?क्या बताऊं, अभी तक भाषा का गला भरता था और शब्द की आंख डबडबा आती थी-लेकिन, आज शब्द नहीं, मैं रोया. क्योंकि आज ही तो साफ की मैंने अपने अतीत के आइने की धूल.वैसे तुम जानती हो कि अफसोस शब्द समूचे साहित्य का मूलभाव है. दुनिया की तमाम महान कृतियां किसी पश्चाताप के बोध की ही पैदाइशे हैं. दैट इज व्हाई गिल्ट इज एक इंपॉर्टेंट वर्ड. इट टेल्स अस व्हाट वी हैव डन रांग. तुम्हें क्या बताऊं होल ऑफ माई लाइफ हैज बीन द टेस्टिमोनी ऑफ माई वीकनेस. प्रेम और पश्चाताप शायद एक तरह से डिवाइन डायक्टमी हैं. दोनों एक तरह के युद्ध की किस्में हैं. अदृश्य और धारावाहिक. मैं भीतर हरदम परेशान रहता हूं. एज इफ देयर इज ग्रोइंग अ डिस्कम्फर्ट इनसाइड मी. एक किस्म की सफरिंग है. तमाम रिश्ते और खासकर ऐसे, जिनकी ठीक-ठीक सी परिभाषाओं के लिए हम परेशान रहते हैं. परिभाषा हमें अपने लिए नहीं, उन लोगों के लिए चाहिए जो एक दिन सवाल करेंगे हमसे. और तब हमारे पास चुप रह जाने के सिवा कुछ नहीं होगा. क्या कुछ रिश्तों के उत्तर सिर्फ चुप्पियों में ही होते हैं.मेरे लिए तुम क्या हो नहीं जानता पर यू आर नॉट अ सिंपल गर्ल ऑर अ पर्सन विद एन अपोजिट सेक्स, रैदर समथिंग डिफरेंट, दैट इज टु गेट डिफाइंड एज अ सोल मेट. दिस मे नॉट बि द न्यू एंड अनयूजुअल वर्ड फॉर दैट यू हैव टु टर्न द पेजेस ऑफ डिक्शनरी. द कॉमनली यूज्ड वड्र्स कैन ऑफेन मिसडिफाइंड, सो मे कॉज कनफ्यूजन्स.पश्चाताप को लेकर शायद दॉस्तोएव्स्की ने ही सबसे सुंदर कहानियां लिखी हैं. कहते हैं दॉस्तोएवस्की ने किसी कच्ची उम्र की बालिका के साथ शारीरिक सलूक जैसा कर लिया था और इसी कारण एक गिल्ट उसके भीतर कहीं जगह कर गयी थी. मुझे लगता है कि कुन्ती की आंख में अर्जुन नहीं, कर्ण को लेकर आंसू कहीं ज्यादा गाढ़े और मोटे आये होंगे. बहरहाल, मेरे भीतर तो अफसोस या पश्चाताप जैसा शब्द बहुत पहले से है, वजह यह कि मैंने बहुत से जरूरी काम या तो वक्त से बहुत पहले कर लिए या वक्त के बहुत बाद-और दोनों ही स्थितियों में एक ही शब्द हाथ लगता है और वह शब्द है अफसोस. इसका एक बड़ा कारण यह भी रहा कि मेरी आंखों की साइज सपनों के हिसाब से उपयुक्त नहीं थी. तुम ही सोचो जख्मी आंखों से सपने देखना सपनों को लहूलुहान कर लेना होता है, और मेरे भीतर यह भय हमेशा बना रहा है. मैं गहरी झिझक के साथ कहना चाहता हूं कि तुम्हें खत लिखते हुए हरदम एक संदेह बना रहता है कि मालूम नहीं कि मैं कितना हूं तुम्हारे भीतर. हूं भी कि नहीं. वैसे, बाहर भी कितना हूं मैं अपने से और अपने लिए. एक सन्नाटा चलहकदमी करता रहता है मेरे भीतर और मेरे बाहर भी, जिसके बीच अकसर चूकने की चीखें भी गूंजती रहती हैं. ऐसे में पूरा का पूरा घर भी मुझमें अपनी सांस ले रहा लगता है, क्योंकि अभी भाइयों की पढ़ाई और नौकरियां लगना शेष है, एक अंधेरा है, जिसके भीतर भी अंधेरा ही छुपा हुआ है. इसीलिए हर बार तुम्हें खत लिखते हुए कुछ जरूरी शब्द लिखने से इरादतन बाहर रह जाते हैं. सैकड़ों ऐसे वाक्य ज़ेहन में आये, मगर वे लिखे जाने के पहले ही गुमशुदा की फेहरिस्त में शामिल हो गये.बस मुझे लिखना ही बिखरने से बचाता रहा है. तुम्हारे खतों की निरंतरता भी इसमें बहुत इमदाद करती है लेकिन यह सोचकर डर जाता हूं कि कहीं यह लड़की खत लिख-लिखकर मुझ पर परोक्ष दया तो नहीं कर रही हूं. मुझे कीर्केगार्द की याद आ रही है, जिसे एक लड़की के दयाबोध ने तोड़ दिया था. पर मैं ऐसे ख्याल को झटककर सोचता रहा हूं. माई ग्रेटेस्ट वेल्थ इज दैट यू लाइक टु लिसन मी, यू रीड माई राइटिंग्स एंड अडोर मी. आई डोंट वांट एनी अवॉर्ड ऑर रिवॉर्ड फॉर माईसेल्फ, सिंस आई एम कान्सटेंटली चाज्र्ड बाई द रेसपेक्ट, लव, अफेक्शन, आई रिसीव फ्रॉम यू. दैट इज व्हाई आई एम क्रिएटिवली अलाइव अमंग टीज सरकमस्टांसेस. नहीं जानता हम कहां होंगे. टाइम विल टेल, हू इज अराउंड, व्हेन इयर्स विल रोल बाई. तुम्हारे नाम का अर्थ चाहे बहुत कीमती चीज का पर्याय हो-लेकिन वह एक धीमी और आत्मदीप्त-सी रोशनी का नाम भी तो है. यह मेरे भीतर एक कांपती लौ की तरह धीमे-धीमे टिमकता रहता है हर क्षण, बाकी ठीक. आई एम फिटेड टु स्टे अलोन इन द लाइफ.तुम्हारा………….सिलसिला जारी….

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>पिछले पत्र के आगे का अंश…..

………सुनो मैंने मृत्यु को नहीं देखा। शायद रिल्के ने देखा था। अपनी टेबल पर। लेकिन इन दिनों मुझे वह निरंतर घेरे रहती है। कभी-कभी तो लगता है वह मेरे साथ मेरे कमरे में रह रही है और किसी भी दिन नींद में मुझे दबोच लेगी. अपने ऐसे और इतने निष्करुण अंत की कल्पना से डर जाता हूं. कच्ची नींद टूट जाती है, आधी रात. और मैं तुम्हें खत लिखने बैठ जाता हूं. शायद मेरे भीतर कुछ है, जो धीरे-धीरे मर रहा है. एक खूंखार मृत्युबोध से निबटने की तैयार की एक भोली किस्म है, तुम्हें खत लिखना. काफ्का यही किया करता था शायद. देखा, खत एक एस्थेटिक से शुरू किया था और केयॉस पर खत्म होने जा रहा है. ऐसा क्यों होता है? कई बार हम फूलों को हाथ में लेकर चलने का संकल्प बनाते हैं और चाकू आ जाता है जाने कहां से, जो मुझे ही लहू-लुहान करने लगता है. क्या मेरी मृत्यु का समय निकट आ रहा है?वैसे यह सारा समय ही मृत्यु का समय है. चारों तरफ चुप्पी है लेकिन यह भविष्य के लिए खौलता-बदबदाता वर्तमान है, जो एक दिन पोलिंग बूथ को प्रयोगशाला में बदल देगा. चुप्पी के नीचे चीख है जो अंधेरे में भरे ठसाठस आकाश में एक दिन छेद कर देगी और रोशनी फूटेगी ऐसी जैसे मुक्तिबोध की कविता अंधेरे में के अंत में कमरे में फूटती है. लेकिन दुर्भाग्यवश अभी तमाम लोग हाथों को जेबों में खोंसकर चुपचाप खड़े हैं. जेबें हथकडिय़ों की नयी किस्म हैं. कोई मुट्ठी बांधकर नहीं चीख और कहूं क्राई माय बिलेविड कंट्री क्राई. इमरजेंसी इसी से ही चिंदा-चिंदा हो पायेगी, वरना तो वह एक सफेद कफन की तरह जनतंत्र की देह पर लिपटी रहेगी. यह कफनग्रस्त समय है. जबकि असलियत में ये समय पूरी देह पर नहीं, सिर्फ सर पर कफन बांधने का है. लेकिन कफन को हमारा बुद्धिजीवी वर्ग टुकड़े-टुकड़े कर के रुमालों की तरह हवा में हिला रहा है. लोग अभिव्यक्ति को विदाई दे रहे हैं. ऐसे में मुझे बार-बार मुक्तिबोध की कविता अंधेरे में याद रही है. मुझे तो डोमाजी उस्ताद की शक्ल दिखाई देती है. एक शीर्ष नेता के बेटे के चेहरे में.देख ही रही होगी कि मैं लिखते-लिखते कैसे वह किस तरह तथा किस तरफ भटक जाता हूं. डायरी लिखने का इरादा बनाता हूं और तुम्हें खत लिखने की तरफ मुड़ जाता हूं, जबकि तुम कितना संतुलित लिखती हो. तुमसे लिखते वक्त एक भी हर्फ हलाक नहीं होता, लिखे जाने के बाद. मैं कितने-कितने तो शब्दों को लिखने के बाद काट देता हूं, जैसे उस पर से भरोसा उठ गया है और तुम्हारे पास पहुंचकर कोई दूसरा अर्थ प्रकट कर देगा. यह संदेह है भीतर का. बेचैनी है जो शब्दों को हताहत कर डालती है. तुमसे ईष्र्या होती है कि तुम्हारी अभिव्यक्ति कितनी सधी और संतुलित है. जैसे किसी बारीक तार पर चलकर आती हो तुम मुझ तक. बिना कदम डगमगाये. धर्मयुग में प्रकाशित तुम्हारी कविता पर मैंने कितने हिंस्र मुहावरे में टीका-टिप्पणी कर दी थी. उन निष्करुण शब्दों के उपयोग पर आज भी अफसोस होता है. इधर सारिका में वह कहानी स्वीकृत हो गयी है तथा भारती जी की चिट्ठी आयी है, ताजा कहानी भेजने के लिए. वैसे, मैंने पिछले हफ्ते ही एक प्रेम कहानी पूरी की है. कहानी छपेगी तो तुम पढ़कर हंसोगी. तुम्हारी हंसी के नीचे दब जायेंगी दोस्तों की आलोचनाएं. तुम उसमें खुद को बरामद करके क्या सोचोगी?तुम्हें कैसे बताऊं कि कहानी लिखने के दौरान मैंने तुम्हें कहां-कहां से बटोरा. बटोरते हुए आंखों को गीली होने से रोक नहीं पाया. प्रेम हंसते हुए होठों पर नहीं गीली आंख से कहीं ज्यादा बाहर आता है. कहानी पूरी करने के बाद मैं तसल्ली से रोना चाहता था. कमरे में नहीं, संसार की सबसे ऊंची इमारत पर खड़ा होकर. तुम ही बताओं जब लोग हिंसा, हत्या खुलेआम कर सड़कों पर करते हैं तो खुले में या सड़क पर रोया क्यों नहीं जा सकता? लिखने के बाद मैं देर रात गये, धीमी-धीमी बारिश में, गीली सड़कों पर दूर तक बिना छतरी के भीगता हुआ चलता रहा. गीली आंख के साथ. कहानी बीच बारिश के बारह दिनों में लिखी. तुम्हारा पिछले जन्म में कहीं वर्षा नाम तो नहीं था. अगर रहा तो आओ और बरस जाओ इस जंगल पर. धारो-धार. मैं भीग जाना चाहता हूं.आज लिखने के पहले चाहा यही गया था कि पत्र छोटा लेकिन प्यारा हो. मगर जब कलम उठाकर लिखने लगता हूं तो भाषा की सतह को भेदकर धीरे-धीरे नीचे जाने लगते हैं. अपने अर्थों के साथ. तुम जानती हो कि तुम्हें लिखे गये तमाम खत बहुत चौकन्नी भाषा में नहीं लिखे गये हैं. वह सावधानी एक सिरे से नदारद है. अत: तुम्हारे साथ बदसलूकी भी करते होंगे. पर, अब मुझे इसकी चिंता नहीं है. मुझे वर्जीनिया वुल्फ की याद आ रही है. उसने ऐसे ही बौराये शब्दों को नाथकर शायद लिखा था- लीव द लेटर्स टिल वी आर डेड. देखा, फिर मृत्यु के निकट जाकर ठिठक गया. शायद भीतर ही भीतर मैं किसी असाध्य से जान पडऩे वाले रोग से घिरने वाला हूं….को खत लिखा था, उसने कहा है कि किसी मेडिकल टीचिंग इंस्टीट्यूट में एक दफा सारे इंवेस्टिगेशन करवाये जाने जरूरी हैं. बट आई हैव बीन ग्रॉपिंग डीप इनटु द अनइंवेस्टिगेटेड डेप्थ ऑफ माई ओनसेल्फ. रात बहुत बीत चुकी है. ईश्वर भी अपने सारे काम निबटाकर सोने चला गया है. अब मैं सोऊं या कि ईश्वर के छूटे काम की निगरानी अपने मत्थे पर लेकर, ये रात जागती आंखों में काट दूं?
तुम्हारा …….

सिलसिला जारी ….

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28।8।७६
प्रिय…….
एक चिरन्तन सी जान पडऩे वाली बदहवासी के दरम्यान जब तुम्हारा कोई खत नहीं मिलता, तो मैं यहां चुपचाप अजनबी शहर में किताबों के बीच दबे तुम्हारे पुराने खतों को खोलकर पढऩे लगता हूं। उन्हें पढ़ते हुए इस अंधेरे में भी सहसा फैल जाती है, अपने छूटे हुए शहर की धूप। जिसके हाशिए में छोड़ जाता था, पोस्टमैन तुम्हारे खत। खत और धूप एकमएक लगते.बहरहाल, आज की इस मटमैली उदासी की धज्जियां उड़ाने के इरादे से मैंने तुम्हारे पिछले खत खोले, जिनमें छोटे वाक्य और बड़े पूर्ण विराम हैं. खोलकर बनिस्बत पहले से कुछ और अधिक ही उदास हो आया. खत पढ़ते हुए तुम्हारे तमाम लिखे गये शब्द, बोले गये बनने लगे. पूर्ण विरामों के बीच ऐसा लगा, जैसे तुम सांस लेने को ठिठकी हुई हो. एक ब्रीदिंग स्पेस है वहां. जहां तुम्हारी झिझक और तुम एक साथ हो. तुम्हारे द्वारा बोलने से रह गये शब्दों को सिर्फ मैं ही सुन सकता हूं. पहले और कई बीत गये दिनों में उठने वाली इच्छा इस समय फिर मेरे सामने है कि मैं तुम्हारी आवाज को सुनूं. पर यह तभी संभव हो सकता था जब फोन होता. सोचो तब क्या होगा, जब मैं फोन के इस छोर पर तथा दूसरे छोर पर तुम होओगी. कुछेक क्षणों तक तो हम आपस में ऐसी भाषा में बात करेंगे कि जो मौन में गिरती जायेगी. उसे कोई भी नहीं पढ़ पायेगा. न उपकरण और न उपकरण वाले लोग. यदि कोई उसे सुनकर लिखना चाहेगा भी, तो बताओ भला लिखेगा ही कैसे? कभी-कभी सोचता हूं, मैं तुम्हारे और अपने संबंधों पर लिखूं एक किताब, जिसमें एक भी हर्फ न हो. जब हम दोनों एक के बाद एक पढ़ेंगे वह किताब, तो उसके पारायण के बीच खाली हो जायेगा संसार. सिर्फ हम भर रह जायेंगे किताब को पढ़ते हुए. सिर्फ हमारी आवाज रह जायेगी अन्तरिक्ष में. एक-दूसरे को पहचानती हुई. एक-दूसरे में समाती हुई. अभी जब मैंने तुम्हारे लिखे गये को बोले गये की तरह सुना तो यही लगा. जैसे सिर्फ यह एक रेसोनेंस है, जिसकी तरफ मेरे कान खुल गये हैं. तुम्हारे खतों को पढ़ते हुए याद नहीं रहा कि मैं किस समय में हूं. ऑलमोस्ट लाइक पास्ट इन प्रेजेंट एंड प्रेजेंट इन पास्ट. एक अनवरत और गड्मगड्ड समय, जिसमें तुम्हारा होना भर रह गया है चारों तरफ.दरअसल, बारह दिनों की शदीद बारिश के बाद आज दस मिनट के लिए धूप खिली, पेड़ हंसे और मैं बेतरह उदास हो गया. इसलिए कि प्रकृति की इस खूबसूूरती को देखने के लिए इस जंगल से जान पडऩे वाले शहर में मैं अकेला था. कहीं कोई आंख नहीं, इस सुख को बांटने के लिए. तुम भी इतनी दूर और अमूर्त कि कहीं किसी किस्म के कोई संवाद की संभावना ही नहीं. पर धीरे-धीरे अब एक बेसब्री उतरती जा रही है, लगातार. तुमसे संवाद करने की. मगर चाहता हूं तुमसे संवाद सर्वश्रुत शब्दों में बिलकुल नहीं हों. कभी-कभी अकेले में सोचता हूं कि तुम्हारे पास भेज दूं अपने ढेर सारे शब्द जो मेरी आत्मा की आंच में लगातार तपते रहे हैं. तवील वक्फे से. ट्यून्ड ऑन लेटेंट हीट ऑफ माई ब्लड. ऐसे शब्द अचानक एक दिन किसी जुनून में भेज दूंगा, तुम्हारे पास. किसी दिन जब तुम काम करते-करते थक जाओगी, तो तुम्हारे पास अचानक पहुंचेंगे मेरे वे ढेर सारे शब्द. एक शब्द तुम्हारा चश्मा उतारकर रख देगा टेबल पर. एक शब्द भिड़ जायेगा चुपचाप तुम्हारा जूड़ा ठीक करने में, एक शब्द पोछने में लग जायेगा तुम्हारी उदासी. एक शब्द पोछेगा तुम्हारी बरौनियों को…और सुनो, एक शब्द गोता लगाकर तुम्हारी नम सांस के सहारे पहुंच जायेगा तुम्हारे भीतर. जहां जाने कितने दिनों से दबी पड़ी होगी तुम्हारी कुम्हलाई हंसी. हो सकता है वह शब्द उस हंसी के पास पहुंचकर वहीं उसी के साथ खिलखिलाता रह जाये. ऊपर और बाहर आये ही नहीं. पता नहीं चले, तुम्हारे होठों को कि वह शब्द भीतर रुका हुआ है. तुम्हारी हंसी से बात करता हुआ. और….सचमुच एक शब्द ऐसा भी होगा, जो तुम्हारी नब्ज के भीतर उतरेगा और कभी भी बाहर नहीं आयेगा. वहीं पड़ा रहेगा. जब तुम अपनी सौ साल की उम्र पूरी करने के बाद विदा लोगी इस संसार से. राख में चिता से फूल चुनते हुए अचानक तुम्हारे बेटे की अंगुली में कुछ अटक जायेगा. वह राख झाड़कर देखेगा. और विस्मय से भरकर सबको दिखाकर पूछेगा-ये क्या है? कोई उत्तर नहीं दे पायेगा उसके प्रश्न का. देह की धीमी आंच में सौ बरस तक तपते रहने वाला शब्द, चिता की लकडिय़ों की आग में इतना रूप बदल लेगा कि उसे किसी की भी आंख नहीं पहचान पायेगी. आकाश में से झांकता ईश्वर उदास होकर पछतायेगा अपने गूंगेपन पर. तब तुम हवा में अदेह सी चलती हुई जाओगी और अपनी चिता के पास ठिठककर कहोगी-प्रेम. बुझी चिता को घेरे खड़ी खामोश भीड़ में से किसी के भी कान नहीं सुन पायेंगे तुम्हारे द्वारा बोले गये उस शब्द को. मैं मृत्यु की तरफ देखकर मुस्कुराऊंगा और मृत्यु अपनी असफलता पर दांत पीसकर ईष्र्या के साथ कहेगी-प्रेम…., प्रेम…उफ्फ प्रेम…!

यही पत्र कल भी जारी….

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