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Archive for the ‘प्रवीन’ Category

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– प्रवीण शेखर
मैं तुम्हें प्रेम करना चाहता था/ जिस तरह से तुम्हें किसी ने नहीं चाहा/ तुम्हारे भाई, पिता, मां और तुम्हारे चारों तरफ के वे तमाम लोग/ जिस तरह से तुम्हें नहीं चाह सके/ मैंने चाहा था तुम्हें उस तरफ से चाहना/ चांद-सितारों की तिरक्षी पड़ती रोशनी में/ दिप-दिप हुआ तुम्हारा चेहरा/ बहुत करीब से देखना.

जिस्म और रूह को भिगो देने वाली मुहब्बत की बारिश को सुखा देती है गर्म हवा. ऐसी हवाओं के बीच प्रेम करने की चाह और चाह को प्रेम में तब्दील करना घटना ही तो है, क्योंकि प्रेम को बाहर की नर्माहटें पालती हैं, यह रेशम के झूले पर एक जोड़ा हंसी बनकर निखरता है. प्रेम रंगों में देखना, खूशबू से सोचना, सुरों में महसूसना सिखाता है.
जब प्रेम को सबसे सॉफ्ट टार्गेट मानकर घायल किया जा रहा हो, जब संस्कृति के सिपाही प्रेम को क्राइम एण्ड पनिशमेंट की बेडिय़ों में जकड़ रहे हैं, जब प्रेम समाज विरोधी कृत्य बनाया जा रहा हो, जब हर कोई क्लाउडियस बनने पर आमादा हो, तो कितना जरूरी हो जाता है प्रेम की बात करना, उसे जीना और प्रेम करना. और तब कितना गैर जरूरी हो जाता है प्रेम के प्रतिरोधों को न$जरअंदाज करना.

प्रेम अपना अलग संसार बनाता है, यह प्रति संसार होता है. अपनी खूबी से यह जब चाहे मौसम को बदल दे, सर्दियों में लू के थपेड़े चलें या गर्मियां बर्फ की सर्दी के नीचे दुबक जायें. यह चाहे तो अमावस की रात जगमग कर दे या पूर्णमासी की रात अंधेरी हो जाये. प्रेम संसार की इस खूबी को लोग मनमानापन मानते हैं. कौन समझेगा यूरोपीय रेनेसां का महान कवि दांते और बिएट्रिस के प्रेम को? चौबीस साल की उम्र में (८ जून १९२०) को बिएट्रिस को देखा था. वह लम्हा विश्व साहित्य के इतिहास की महान प्रेरणा और अद्भाुत गाथा बन गया. बिएट्रिस की मौत ने दांते को बदल दिया. उस लम्हे और बिएट्रिस के अप्रतिम सौंदर्य को दांते $िजन्दगी भर जीते रहे. उसी प्रेम का परिणाम डिवाइन कॉमेडी जैसी अमर रचना थी. प्रेम के उदात्तीकरण का असर इतना गहरा होता है कि यह विफलता के बावजूद धड़कता हुआ इमोशनल स्पेस देता है. इसकी अपूर्णता मन को सालती है लेकिन वेदना और संकल्प जीवन के दस्तावेज बन जाते हैं जैसे बम से तबाह हो चुके वियतनाम में दान कान्ह और निशीना शांजो का प्रेम उनकी मौत के बाद भी धड़क रहा है.

रोमन कवि ओविड (४३ बीसी-१७ एडी) ने एक प्रेमकथा को लिखने का विषय बनाया. मूर्तिकार पिगमैलियन यूनान का बेहद खूबसूरत मर्द था. वह आइवरी, ब्रान्ज मॉरवलकी एक से बढ़कर एक सुन्दर मूर्तियां तराशता और लोग उसके फन के जादू में समा जाते. सारे यूनान की लड़कियां उस पर जान देती थीं, लेकिन पिगमैलियन के दिल के करीब कभी कोई लड़की आ ही नहीं पाती थी. अपनी कला के प्रति समर्पित पिगमैलियन सौंदर्य का सच्चा पुजारी था और उसी सौंदर्य का अंकन मूर्तियों में करना चाहता था. इसलिए उसकी हर मूर्ति सौंदर्य को रीडिफाइन और रीइंटरप्रेट करती. उसने आइवरी की ऐसी मूर्ति बनानी शुरू की जो खुद में कम्पलीट हो. मूर्ति बन गई. वही उसकी आइडियल ब्यूटी थी. उसने मूर्ति का नाम दिया गैलेटिया. पिगमैलियन उसे अपलक निहारता रहा, जब उसकी पलकों ने अपने दरवराजे बन्द किये तो वह उसी के ख्वाबों के साथ लिपटा रहा. जब उसने आंखें खोलीं तो उस दिन यूनान में प्रेम और सौंदर्य की देवी एफ्रोडाइट की उपासना का दिन था. पिगमैलियन पूजाघर गया और देवी एफ्रोडाइट से दुआ की कि गैलेटिया में रूह और $िजन्दगी आ जाए. देवी की आंखों से रोशनी की लकीर निकलकर फिजां में समा गई. वह घर लौटा तो देखा कि देवी अपना काम कर चुकी हैं. मूर्ति गैलेटिया स्त्री रूप में पैडेस्टल से नीचे उतरी और पिगमैलियन को बाहों में भर लिया. उसका कोमल आलिंगन, गर्माहट, नर्म छुअन को वह हमेशा जीता रहा, गढ़ता रहा, रचता रहा सौंदर्य के नये-नये प्रतिमान. ऐसी चाह एफ्रोडाइट जैसी उदारता, गैलेटिया जैसा प्रेम, उसकी नर्म छुअन के लिए ह$जार-ह$जार वैलेन्टाइन्स डे चाहिए, रोज चाहिए.

(लेखक इलाहाबाद के सक्रिय रंगकर्मी हैं. उनका अपना थियेटर ग्रुप बैकस्टेज है)

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>– प्रवीण शेखर
तो क्या जिंदगी फिर उसी धुरी पर घूमेगी, गोल-गोल, जहां पिछली शाम तक थी? आधी रात को कैलेंडर धीरे से फडफ़ड़ाया और इतिहास के माथे पर एक साल और लटक गया है. अब न वो घर, न वो शाम का तारा, अब न वो रात, न वो सपना. पिछली रात की तेज और सर्द हवा में आधी रात के बाद कैलेंडर का कागज बोल रहा था-गये दिनों का सुराग लेकर किधर से आया किधर गया वो, अजीब मानूस अजनबी था, मुझे तो हैरां कर गया वो.आगे साल भर का स$फर. तीन सौ पैंसठ दिनों और इतनी रातों का सफर. इसी सफर की किसी गली में मिलेगा वो बेनवां रात का मुसाफिर जिसे गये रात तेरी गली तक तो हमने देखा था, फिर न जाने किधर गया वो. वही मुसाफिर हमें पहुंचायेगा नये साल की आखिरी शाम तक, रात तक।

नये साल के पहले अंधेरे में वो भी कुरकुरेव गांव के पहले अध्यापक, पहले कम्युनिस्ट दूइशिन जैसा लगा था और देर रात सवाल साथ-साथ चलते रहे कि संघर्षों, तरह-तरह के भाग्यों, इंसानी आवेगों से भरी जिंदगी क्या रंगों में ढाली जा सकती है? कैसे किया जाये कि भावनाओं का यह जाम छलके नहीं और आप तक पहुंच जाये? कैसे किया जाये कि मेरी सोच, मेरे दिल का दर्द आपके दिल का दर्द बन जाये? लेकिन बहुत सी बातें अमली शक्ल ले पाती हों यह जरूरी तो नहीं, फिर भी इतना तो तय है कि रास्ता इसी के बीच से बनेगा. नए साल की सुबह सपने पालने, बुनने और रास्तों को जन्म देने के लिए सबसे सही वक्त है, शायद. इसी समय धूप सबसे करीने के सात रंगों में फैलती है आंखों पर. रात का सपना होठों पर आता है और सबसे बड़ी बात यह कि इस वक्त रोशनी नहीं बुझती या नहीं हो तो भी. बीती शाम अपना हैंगओवर धुंध, कुहासे, बदली की शक्ल में आये तो भी।

परवीन शाकिर एक मंत्र देती हैं रास्ता काटने के लिए-निकले हैं तो रास्ते में कहीं शाम भी होगी, सूरज भी मगर आयेगा इस राहगु$जर से.अच्छा किसी एक फूल का नाम लो. उसका रंग कैसा है? खुशबू कैसी है? उसकी शक्ल कैसी है? यह शक्ल किससे मिलती है? किसी बच्चे का चेहरा ही याद कर लें, उसके बालों की छुअन को महसूस लें. या फिर उस ख़त को याद कर लें जिसे आपने पहली बार किसी को लिखा था या फिर किसी ने आपको आखिरी बार लिखा था. उन अक्षरों को पढ़ लें, उसके मानी एक बार और समझ लें जैसा वह लिखा गया था. आज नहीं तो ये सारे सवाल कल के लिए सहेज कर रख लें, फिर पूछें. कल नहीं तो परसों या फिर उसके बाद कभी. या फिर बार-बार नहीं तो साल भर. आपको नहीं लगता कि भविष्य में भरोसा, आस्था और जिंदगी की गहन अंदरूनी खूबसूरती की कहानी, उसकी चमक ऐसे ही हल्के -फुल्के और बेतुके भी सवालों उसके जवाबों में छिपी है।

यह समय अजीब है. बदन में चुपके से धंस जाने वाली किरचें हैं. धूल है, शूल है, खुशबू है, रंग है, सुर है वो आंखें हैं, जहां खुदा पनाह लेता है. अब घात या बेवफाई पर टूटकर बिखर जाने, नशे में गर्क होकर मर जाने का रिवाज नहीं है. अब कमजोरियों और दारुण स्थितियों से लडऩे और जीतने का समय है. जीवन की सक्रियता में डूबने का समय है जो किसी नशे में नहीं मिलता. यह छोटी-छोटी बातों में लिपटे बड़े सुखों से लिपटने का समय है.पीटर स्क्रीवन की कठपुतलियों में सुपरस्टार था सामी. 25 सेंटीमीटर के चेहरे पर अचरज के भाव थे. तीखी नाक, माथे पर लाल रंग के बालों के बीच झूलती लट थी जिसे बार-बार संवारने की जरूरत महसूस होती. सामी लोगों का लोकप्रिय पात्र था. उसे लेकर पीटर ने साहस और रोमांच के कई नाटक बनाये. हर कहानी में वह विकट परिस्थितियों में फंसता लेकिन असंभव ढंग से बच निकलता. समुद्री जहाज टूटने पर वह ऑक्टोपस से लड़ा और मत्स्य कन्या ने उसकी जान बचाई. वह हमेशा भचकती चाल से चलता, वजह थी उसके घुटनों के जोड़ सरके हुए थे और उन्हें ठीक करना बड़े-बड़े सर्जन के बस की बात नहीं थी. हर शो के बाद सामी दर्शकों के बीच बैठ बच्चों से अभिवादन करता. थियेटर से बाहर निकलते बच्चे उदास हो जाते कि अब सामी से कब मुलाकात होगी?

उस दिन पीटर हैमिल्टन में शो के बाद सामी को चुन्नटदार थैले में रख रहे थे कि एक बच्ची झिझकती हुई आयी. उसे ठंड लग जायेगी, यह थैला तो झीना है. उसने सामी की ओर संकेत करते हुए कहा. बच्ची ने पीटर की हथेलियों पर कुछ रखते हुए फिर कहा, यह सामी के लिए है, मैंने इसे खुद बुना है, अब इसे सर्दी नहीं लगेगी. वह बड़ी खूबसूरती से तह किया हुआ स्वेटर था. स्वेटर पर नीले रंग की कढ़ाई कर एस अंकित था यानी सामी के नाम का पहला अक्षर. तकरीबन बीस साल बाद न्यू ईयर के मेले में चल रहे शो के बाद पीटर सामी को थैले में रख रहे थे कि आवाज आई, इतनी मुद्दत बाद भी इस पर उम्र का असर नहीं हुआ. कठपुतलियां कभी बूढ़ी नहीं होतीं? पीटर ने मुड़कर देखा तो 30 के ऊपर की एक औरत 10-11 साल की बच्ची का हाथ थामे खड़ी थी.वह कुछ देर सामी के सिर पर थपकियां देती रही. फिर उसकी उंगलियां सामी के चेहरे पर गले से फिसलती हुई पुराने बदरंग स्वेटर पर रुक गई. आंसू छलछला आये. वह पीटर से बोली, आप मुझे पहचानते नहीं हैं. आपके मुझे एक ऐसी अनमोल निधि दी है जिसे मैंने हमेशा संजोकर रखा है. मेरी जिंदगी ऊबड़-खाबड़ रही. घोर दु:ख के दिनों में भी मैं सामी को भूली नहीं और कोई न कोई कहानी बुनकर अपनी बेटी को सुनाती रही. फिर वह बेटी से बोली, यह है सामी. पीटर ने उस बच्ची को गोद में उठा लिया और एक और नन्ही बच्ची की कहानी सुनाई, जिसने अरसा पहले एक कठपुतली के लिए स्वेटर बुनकर काठ से बने तन-मन को बहुत राहत पहुंचाई थी. नए साल में किसी सामी से दोस्ती भी तो हो सकती है. ऊबड़-खाबड़ जिंदगी में कहानी बुनने के लिए और किसी को राहत पहुंचाने के लिए।
अरे हां, आपको नया साल मुबारक!
(लेखक इलाहाबाद के सक्रिय रंगकर्मी हैं. उनका अपना थियेटर ग्रुप बैकस्टेज है)

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