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Archive for the ‘ममता कालिया’ Category

> शहर कब किसके हुए हैं, शहरयार तक के नहीं. तभी न उनके दिल से निकली थी यह नज़्म इस शहर में हर शख्स परेशान सा क्यूं है? उन्हें क्या पता हर शहर में हर शख्स परेशान सा ही रहता आया है. कितने वक्त में कोई शहर हमारा बन पाता है. हम अपने बंजारे मन से पूछते हैं. यह मन तो मानो उतावला हुआ पड़ा है कि कब हम इस पर अपनी गठरी लादें और दौड़ पड़ें. लेकिन हम मन को अपनी मजबूरियां समझाते रहे, खुक्ख् पड़ी बैंक की पासबुक दिखाते रहे और धीरज धरवाते रहे. लेखन जगत की च्यूंइगगम और चॉकलेट उसे चटाते रहे. आज फलां जगह की मुख्य अतिथिगीरी.
शहर के लिए किसी का रहना जरूरी नहीं होता. ये तो लोग होते हैं जो उससे नाता जोड़ते हैं. कुछ लोग तो अपने नाम के साथ उसे नत्थी कर लेते हैं जैसे वसीम बरेलवी, मजरूह सुलतानपुरी, कैफी आजमी. कुछ लोग नत्थी नहीं करते, फिर भी उनके साथ शहर की शोहरत चिपक जाती है जैसे म$जाज के साथ लखनऊ, गालिब के साथ दिल्ली, राही मासूम रजा के साथ अलीगढ़ कमलेश्वर के साथ मैनपुरी, राजेन्द्र यादव के साथ आगरा. रहे हैं ये सब और शहरों में भी लेकिन वह एक शहर इनका अता-पता बन गया. शहर वालों को भी इनके किस्से कहानी सुनाने में मजा आने लगा, शहर के कुछ अड्डे इनके नाम से सरनाम हुए, साल दर साल इनके हवाले से न जाने कितने सच झूठ तमाम हुए.हमने चाहा था इलाहाबाद हमें चंदन पानी, मोती धागा, सोना सुहागा जैसा अपना ले, आखिर हम तीस साल यहां रह लिये, अट्ठाइस साल नौकरी कर ली, यहां की हवाएं, सर्दी गर्मी झेल ली.
एक शाम विश्वविद्यालय के खुले मंच पर फैज, फिराक और महादेवी वर्मा को इकट्ठे देखा और सुना. तीनों ही साहित्यकार लेकिन हर एक का अंदाजेबयां और. फैज की शान में रात को विभूति राय के घर पर दावत हुई. जब वे कमरे में दाखिल हुए उन्हीं की कविताओं का हमारा रेकॉर्ड स्टीरियो पर बज रहा था. वे पहले हैरान हुए, फिर खुश हुए और एलपी के कवर पर उर्दू में लिख दिया ममता को मोहब्बत के साथ. इस मौके पर हिन्दी उर्दू लेखकों का भाईचारा भी न$जर आता रहा. सभी युवतर लिखने वाले जश्न में आए हुए थे. डा. अकील रिजवी के नेतृत्व में अली अहमद फातमी, असरार गांधी, काजमी जी, ताहिरा परवीन, आतिया निशात, गजाल जैगम, शाइस्ता फाखरी थे तो शम्सुर्रहमान फारुखी जैसे पायेदार और गंभीर आलोचक की भी उस शाम की सभा में शिरकत थी.
हिन्दी उर्दू अदब के इस तरह के संगम इलाहाबाद की खासियत तब से रहे जब प्रगतिशील लेखक संघ की बैठकें यहां होती थीं. जियाउल हक और प्रकाश चंद्र गुप्त इन बैठकों के शक्तिपीठ थे और कोई भी रचनाकार तब तक मुकम्मल नहीं माना जाता जब तक दोनों जुबानों से उसे सनद न मिले. पता नहीं तब भी हिन्दी वालों को क्या मेरी तरह यह अफसोस हुआ होगा कि उन्होंने उर्दू पढऩी-लिखनी क्यों नहीं सीखी. कितना अजीब है कि सभी उर्दू भाषी अदीब हिन्दी जानते हैं लेकिन सभी हिन्दी भाषी उर्दू की मामूली जानकारी भी नहीं रखते. एक अकेले रघुपति सहाय फिराक हिन्दी भाषी अदीबों की यह कमी पूरी करने के लिए नाकाफी थे.
फिराक साहब के क्या कहने. उनकी विनोदप्रियता के किस्से तो जग जाहिर हैं. एक बार फिराक साहब के घर चोर घुस आया. फिराक साहब को रात में ठीक से नींद नहीं आती थी. आहट से वे जाग गये. चोर इसके लिए तैयार नहीं था. उसने अपने साफे से चाकू निकाल कर फिराक के आगे घुमाया. फिराक बोले, तुम चोरी करने आये हो या कत्ल करने. पहले मेरी बात सुन लो.चोर ने कहा, फालतू बात नहीं, माल कहां रखा है?फिराक बोले, पहले चक्कू तो हटाओ, तभी तो बताऊंगा. फिर उन्होंने अपने नौकर पन्ना को आवाज दी… अरे भई पन्ना उठो, देखो मेहमान आये हैं, चाय वाय बनाओ.पन्ना नींद में बड़बड़ाता हुआ उठा, ये न सोते हैं न सोने देते हैं.चोर अब तक काफी शर्मिन्दा हो चुका था. घर में एक की जगह दो आदमियों को देख उसका हौसला भी पस्त हो गया. वह जाने को हुआ तो फिराक ने कहा, दिन निकल जाए तब जाना.चोर आया था पिछवाड़े से लेकिन फिराक साहब ने उसे सामने के दरवाजे से रवाना किया यह कहते हुए कि अब जान पहचान हो गयी है भई आते जाते रहा करो.

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