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Archive for the ‘मरीना की कविता’ Category

> फासले…, कोसों, मीलों लम्बे…

हमें अलग किया गया,
भेजा गया बहुत दूर
ताकि चुपचाप जीते चले जाएं हम
पृथ्वी के दो अलग-अलग हिस्सों में।
फासले…, कोसों, मीलों लम्बे…
उखाड़ा गया हमें,
पटका गया इधर-उधर
बांधे गये हाथ,
ठोंकी उन पर कीलें
पर मालूम नहीं था उन्हें
अंत:करण और धड़कती नसों का…
किस तरह होता है मिलन…
अनुवाद: डा: वरयाम सिंह
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