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Archive for the ‘मेरी पसंद’ Category

सुरों के समंदर में डुबकी लगाई तो ये मोती हाथ लगे. सुरेश वाडकर की आवाज और विशाल भारद्वाज के संगीत में गुलज़ार के साहब के ये शब्द डूबते-उतराते किसी झील के कमल से मालूम हुए. इन्हें अलग से छुआ तो लगा मानो कमल को झील से तोड़कर हाथ में ले लिया हो. कोई इतने प्यार से जगाये तो उम्र भर सोये रहने को जी क्यों न चाहे…

जग जा री गुडिय़ा
मिसरी की पुडिय़ा
मीठे लगे दो नैना
नैनों में तेरे, हम ही बसे थे
हम ही बसे हैं, है ना…
ओ री रानी, गुडिय़ा
जग जा, अरी जग जा…मरी जग जा…

जग जा री गुडिय़ा
मिसरी की पुडिय़ा
मीठे लगे दो नैना…

हल्का सा कोसा
सुबह का बोसा
मान जा री, अब जाग जा
नाक पे तेरे काटेगा बिच्छू
जाग जा, तू मान जा
जो चाहे ले लो, दशरथ का वादा
नैनों से खोलो जी रैना
ओ री रानी, गुडिय़ा
जाग जा, अरी जग जा, मुई जग जा..

किरनों का सोना
ओस के मोती
मोतियों सा मोगरा
तेरा बिछौना, भर-भर के डारूं
गुलमोहर का टोकरा
और जो भी चाहो
मांगो जी मांगो
बोलो जी, मेरी मैना
ओ री रानी, गुडिय़ा
जग जा, अरी जग जा, ओए जग जा…

(http://www.youtube.com/watch?v=RozrGjt9p_w&feature=related)

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दिल में ऐसे ठहर गए हैं ग़म

जैसे जंगल में शाम के साये 
जाते-जाते सहम के रुक जाएँ 
मुडके देखे उदास राहों पर 
कैसे बुझते हुए उजालों में 
दूर तक धूल धूल उडती है…
– गुलज़ार 

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आपकी याद आती रही रात-भर
चाँदनी दिल दुखाती रही रात-भर

गाह जलती हुई, गाह बुझती हुई
शम-ए-ग़म झिलमिलाती रही रात-भर

कोई ख़ुशबू बदलती रही पैरहन
कोई तस्वीर गाती रही रात-भर

फिर सबा साय-ए-शाख़े-गुल के तले
कोई क़िस्सा सुनाती रही रात-भर

जो न आया उसे कोई ज़ंजीरे-दर
हर सदा पर बुलाती रही रात-भर

एक उमीद से दिल बहलता रहा
इक तमन्ना सताती रही रात-भर

– फैज़ अहमद फैज़ 

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पिछले दिनों सिद्धेश्वर  जी ने वेरा पाव्लोवा की कुछ कवितायेँ पढने को दीं. उन कविताओं में से ये एक अटक सी गयी है दिमाग में. तो इसे यहाँ अपने ब्लॉग पर निकालकर रखे दे रही हूँ  (सिद्धेश्वर जी की अनुमति से) ताकि इसे सहेज भी लूं और शेयर भी कर लूं…


आईने के सामने

मैं सीख रही हूँ ‘नहीं’ कहना :
ना – ना – ना।  
प्रतिबिम्ब  दोहराता है :

हाँ -हाँ – हाँ। 
(अनुवाद-सिद्धेश्वर सिंह)

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‘यह तुम्हारे लिए एकदम स्वाभाविक है कि तुम न समझो. मैं एक हजार वर्ष और उससे भी अधिक जी चुकी हूं. जो कुछ मैं आज हूं, वह एक हजार वर्ष के अनुभव का परिणाम है. तुम्हारा भूतकाल कुछ नहीं है. तुम्हारे पास वर्तमान ही है और शायद भविष्य भी. मैं शायद इसलिए नहीं कहती कि मुझे इसमें कुछ संदेह है, बल्कि इसलिए कि भविष्य के बारे में निश्चयात्मक रूप से कुछ कहा ही नहीं जा सकता.’  नोरा बोली.
ले. लेविस बेचैन होकर बोला- ‘अत्यधिक रहस्यवाद.’
‘मि. लेविस, देखो,’ नोरा बोली. ‘पेटरार्च, गेटे, बायरन, पुश्किन और त्रायन से प्रेम की बातें सुनने के बाद रीतिकालीन कवियों से प्रेम के गीत सुनने और उन्हें जैसे ईश्वर के सामने वैसे ही अपने सामने घुटने टेके देखने के बाद वैलरे, रिल्के, दातुनजियो और इलियट से प्रेम के शब्द सुनने के बाद मैं तुम्हारे किसी भी प्रस्ताव पर गंभीरतापूर्वक कैसे विचार कर सकती हूं, जिसे तुम सिगरेट के धुएं के साथ मेरे मुंह पर मारे दे रहे हो.’
‘क्या मुझे शादी का प्रस्ताव करने के लिए गेटे, बायरन या पेटरार्च बनना होगा?’
‘नहीं, मि. लेविस.’ नोरा बोली, ‘तुम्हें पुश्किन और रिल्के भी नहीं बनना होगा. लेकिन जिस औरत से तुम शादी करना चाहते हो उससे तुम्हें प्रेम करना होगा.’ 
‘स्वीकार है.’ लेविस बोला. ‘तुम्हें किसने कहा कि मैं तुम्हें प्यार नहीं करता.’
नोरा मुस्कुरा दी.
‘मि. लेविस, प्रेम एक तीव्र भावना है. हो सकता है, तुमने यह बात कहीं सुनी हो, अथवा पढ़ी हो.’
‘मैं पूर्णतया सहमत हूं,’ वह बोला, ‘प्रेम एक तीव्र भावना है. लेकिन तुम किसी भी तीव्र अनुभूति के अयोग्य हो.’ नोरा बोली, ‘और अकेले तुम्हीं नहीं, तुम्हारी सभ्यता में कोई भी आदमी तीव्र भावना का अर्थ नहीं समझता. प्रेम जैसी सर्वोपरि भावना के लिए केवल ऐसे ही संसार में स्थान हो सकता है, जहां मानव के अनुपम मूल्य में विश्वास किया जा सकता है. तुम्हारा समाज मानता है कि आदमी का स्थान आदमी ले सकता है. तुम्हारी दृष्टि में मानव और इसलिए वह स्त्री भी, जिससे तुम प्रेम करने की बात करते हो, परमात्मा अथवा प्रकृति द्वारा निर्मित एक विशेष व्यक्तित्व नहीं है. एक असाधारण कृति. तुम्हारे लिए हर व्यक्ति एक परंपरा की एक इकाई है, और कोई भी एक औरत दूसरों के समान एक इकाई है. जीवन का यह दृष्टिकोण प्रेम की जड़ काटता है.’
‘मेरे संसार के प्रेमी जानते हैं कि यदि वे उस स्त्री को नहीं पा सकते, जिससे वे प्रेम करते हैं तो पृथ्वी पर कोई दूसरी चीज उसी कमी को पूर्ण नहीं कर सकती. यही कारण है कि वे उसके लिए प्राय: अपनी जान दे देते हैं. कोई दूसरी चीज उनके प्रेम की स्थानापन्न नहीं हो सकती. यदि कोई आदमी मुझसे वास्तव में प्रेम करता है तो वह मुझे इस बात का विश्वास दिला देगा कि अकेली मैं ही उसे प्रसन्न कर सकती हूं. संसार भर में एकमात्र मैं अकेली. वह मुझे सिद्ध कर देगा कि मैं अनुपम हूं, संसार में मेरे सदृश और कोई है ही नहीं. एक आदमी जो मुझे यह विश्वास नहीं दिला सकता कि मैं असाधारण, अनुपम हूं, मेरा प्रेमी नहीं है. एक स्त्री जिसे अपने प्रेमी से यह आश्वासन नहीं मिलता, वास्तव में उसकी कोई प्रेमिका नहीं है. जो आदमी मुझसे प्रेम नहीं करता, मैं उससे विवाह नहीं कर सकती.’ 
‘मि. लेविस, क्या तुम मुझमें यह भावना जगा सकते हो? क्या तुम ईमानदारी से यह विश्वास करते हो कि पृथ्वी पर मेरे सदृश कोई दूसरी औरत नहीं? क्या तुम्हें पक्का विश्वास है कि यदि तुम काफी कोशिश करो तब भी तुम्हें कोई मेरे स्थान पर नहीं मिल सकती? नहीं, तुम्हें पूरा भरोसा है कि यदि मैं अस्वीकार कर दूं तो तुम्हें अपनी पत्नी बनाने के लिए कोई दूसरी औरत मिल जायेगी और यदि वह भी अस्वीकार कर दे, तो तीसरी मिल जायेगी. क्या मैं ठीक नहीं कह रही हूं? ‘
(आलोक श्रीवास्तव के कविता संग्रह ‘दिखना तुम सांझ तारे को ‘ की भूमिका से)

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आज विश्व रंगमंच दिवस है. हर बार की तरह इस बार भी शिम्बोर्स्का की यह कविता जेहन में दौड़ रही है. दुनिया के इस नाटक में हम अपने चेहरों पर न जाने कितने चेहरे लगाये, न जाने कितनी भूमिकाओं में हैं. इन नाटकों के दुखांत या सुखांत भी हम तय नहीं कर पाते . काश कि कर पाते…आइये अपनी भूमिकाओं में लौटते हुए अपने चेहरों पर मुखौटों को तरतीब से सजाते हुए पढ़ते हैं मेरी प्यारी शिम्बोर्स्का की यह कविता-

 दुखांत 
मेरे लिए दुखांत नाटक का सबसे मार्मिक हिस्सा
इसका छठा अंक है
जब मंच के रणक्षेत्र में मुर्दे उठ खड़े होते हैं
अपने बालों का टोपा संभालते हुए
लबादों को ठीक करते हुए 
जब जानवरों के पेट में घोंपे हुए छुरे निकाले जाते हैं
और फांसी पर लटके हुए शहीद
अपनी गर्दनों से फंदे उतारकर 
एक बार फिर 
जिंदा लोगों की कतार में खड़े हो जाते हैं
दर्शकों का अभिवादन करने.
वे सभी दर्शकों का अभिवादन करते हैं
अकेले और इकट्ठे 
पीला हाथ उठता है जख्मी दिल की तरह
चला आ रहा है वह जिसने अभी-अभी खुदकुशी की थी
सम्मान में झुक जाता है
एक कटा हुआ सिर.
वे सभी झुकते हैं
जोडिय़ों में
ज़ालिम मज़लूम की बाहों में बांहें डाले
बुजदिल बहादुर को थामे हुए
नायक खलनायक के साथ मुस्कुराते हुए
एक स्वर्ण पादुका के अंगूठे तले शाश्वतता कुचल दी जाती है
मानवीय मूल्यों का संघर्ष छिप जाता है एक चौड़े हैट के नीचे.
कल फिर शुरू करने की पश्चातापहीन लालसा.
और अब चला आ रहा है वह मेहमान
जो तीसरे या चौथे अंक या बदलते हुए दृश्यों के बीच
कहीं मर गया था
लौट आए हैं
बिना नाम-ओ-निशान छोड़े खो जाने वाले पात्र
नाटक के सभी संवादों से ज्यादा दर्दनाक है यह सोचना
कि ये बेचारे
बिना मेकअप या चमकीली वेशभूषा उतारे
कब से मंच के पीछे खड़े इंतजार कर रहे थे.
सचमुच नाटक को सबसे ज्यादा नाटक बनाता है 
पर्दों का गिरना
वे बातें जो गिरते हुए पर्दे की पीछे होती हैं
कोई हाथ किसी फूल की तरफ बढ़ता है, 
कोई उठाता है टूटी हुई तलवार
उस समय, सिर्फ उस समय
मैं अपनी गर्दन पर महसूस करती हूं
एक अदृश्य हाथ,
एक ठंडा स्पर्श.
– विस्साव शिम्बोर्स्का 
अनुवाद- विजय  अहलूवालिया 

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 मोहब्बत की शदीद बारिश का मौसम है. हर कोई बसंत के रंग में रंगा जा रहा है. कोई अकेले मुस्कुरा रहा है, कोई अपने साथी के साथ है. कहीं, कोई किसी की याद में गुम है, कहीं मोहब्बत का मीठा सा गम है. मोहब्बत का जिक्र आते ही अमृता आपा का नाम याद आता है. और उनका नाम आते ही इमरोज का. आज अरसे बाद इमरोज साहब को फोन किया. वही मखमली आवाज़, वही शायराना अंदाज. मैं जब भी उनसे रू-ब-रू होती हूं, कुछ कह ही नहीं पाती. सारे सवाल न जाने कहां गुम हो जाते हैं. मानो उनसे कुछ भी पूछना हिमाकत करना होगा. उन्हें बस देखते रहो. उनके जिए हर लम्हे में वो कितना कुछ तो बोल चुके हैं.
मोहब्बत पर उनका फलसफा किसी से छुपा नहीं. अमृता आपा को उनकी आखिरी सांस तक अपनी पलकों पर सजाकर रखा. आज वो उन्हें अपने सीने में छुपाए फिरते हैं. उनका दिल यह मानने को तैयार ही नहीं कि अमृता अब नहीं है. उनकी मोहब्बत अब भी वैसी ही ताजा है, जैसे अभी-अभी कोई फूल खिला हो जिस पर ओस की बूंदों की नमी बाकी हो. उनसे हुई जो बात वो बाद में, पहले आइये पढ़ते हैं उनकी एक नज्म जो उन्होंने फोन पर सुनाई है, आप सबसे साझा करने के लिए-
वो जब भी मिलती है
एक अनलिखी नज्म नजर आती है.
मैं इस अनलिखी नज्म को
कई बार लिख चुका हूं.
फिर भी हर बार
यह अनलिखी ही रह जाती है.
हो सकता है
यह अनलिखी नज्म
लिखने के लिए
हो ही ना,
सिर्फ जीने के लिए हो.
– इमरोज

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