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Archive for the ‘हादसा’ Category

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राज्य उत्पत्ति के सारे सिद्धांत औंधे पड़े हैं. भारतीय संविधान में लिखी मौलिक अधिकार की आयतें भी बस मुंह जोह रही थीं. जबकि जीवन जीने का अधिकार, शिक्षा और रोजगार पाने के अधिकार के नाम पर लाठियां भांजी जा रही हैं. न जाने क्यों मुझे विरोध के क्रांतिकारी ढंग से परहेज कभी नहीं रहा. लेकिन सही वक्त पर सही ढंग से किया गया विरोध. दुख होता है यह देखकर कि सही नेतृत्व का अभाव, निराशा, कुंठा, पूरी पीढ़ी को उस रास्ते पर धकेल रही है, जिस पर कदम रखते ही ऊर्जा, उत्साह, संभावनाओं से भरी-पूरी पीढ़ी अपने दामन पर उपद्रवी, बलवाई होने का दाग लगा बैठती है.
जब राज्य अपना काम ठीक से नहीं करते, जन प्रतिनिधि जनता के बारे में कम अपने बारे में ज्यादा सोचते हैं, सरकारी मशीनरी बस पल्ला झाडऩे में व्यस्त रहती है, तब ऐसे हालात बनते हैं. और इल्जाम आता है युवा पीढ़ी पर. दोस्तों, विरोध जरूर दर्ज करना है लेकिन ध्यान रहे कि कहीं आक्रोश के चलते हम अपनी जायज मांगों पर उपद्रवी, बलवाई होने का दाग न लगा बैठें.

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न जाने क्यों लोग प्याज और पेट्रोल की बढ़ती कीमतों को लेकर इतना परेशान रहते हैं. जबकि इस देश में इंसान की जान की कीमत दो कौड़ी की नहीं है. बरेली से लौट रही हूं. ओह, बरेली पहुंच ही कहां पाई. शाहजहांपुर के पास हिमगिरी एक्सप्रेस धधक रही थी. वही हिमगिरी एक्सप्रेस जिसकी छत से गिरकर खबरों की मानें तो अब तक 19 छात्रों की मौत हुई है. खौफ, खतरे की आशंका, आधी-अधूरी जानकारियों के साथ घटनास्थल से बस जरा सी दूरी पर बिताये वो पांच घंटे कभी नहीं भूलूंगी.
खबरें मिल रही थीं. बरेली सुलग रहा था. इस शहर से जब-तब धुआं उठता रहता है इसलिए मानो सबको आदत सी थी. इस बार धुआं इतना गाढ़ा होगा किसी को अंदाजा नहीं था.
रोजगार का सपना आंखों में लेकर आये छात्रों में से कइयों को नौकरी के बदले मौत मिली. ट्रेन की छत पर से लाशें बरस रही थीं. पूरी बोगी खून से लाल थी. मदद करने वाला कोई नहीं. अपने साथियों को यूं मरते देख बाकियों का खून खौल उठा. एसी बोगी से यात्रियों को उतारकर आग लगा दी गई. मातम, गुस्सा, निराशा, हताशा का वो खौफनाक मंजर. उफ!
क्या कुसूर था उनका, जो मारे गये. क्या कुसूर था उनका, जिन्हें रोजगार के लिए बुलाकर लाठियों से पीटा गया. ये सब अभ्यर्थी भारत तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) की भर्ती के लिए आये थे. क्या कुसूर था उनका कि उन्हें नौकरी के बदले मौत मिली.
प्रशासन कहता है कि उसे अंदाजा नहीं था कि इतने लोग आ जायेंगे. यानी वाकई प्रशासन को अंदाजा नहीं था कि इस देश में बेरोजगारों की कितनी बड़ी तादाद है. 416 पदों के लिए 11 राज्यों से ढाई लाख अभ्यर्थी. उन्हें वाकई अंदाजा नहीं था कि इस देश में कितने सारे युवाओं के लिए नौकरी एक ख्वाब है, जिसके लिए वे कुछ भी कर सकते हैं. प्रशासन सचमुच कितना मासूम है.
लोगों का क्या है, वे तो मरते रहते हैं. इस देश की इतनी बड़ी आबादी में से कुछ लोग न सही. हमें ऐसे हादसों की आदत है. हम हादसों से जल्दी से उबर जाने का हुनर सीख चुके हैं. देखिये ना सब सामान्य हो रहा है. हादसे के बाद की सुबह यानी आज शाहजहांपुर रेलवे स्टेशन इतना सामान्य था कि मानो कुछ हुआ ही न हो.
जिम्मेदार लोग एक-दूसरे पर आरोप लगा रहे हैं –
लाखों अभ्यर्थियों को देखते हुए राज्य सरकार को सुरक्षा व्यवस्था के पूरे इंतजाम करने चाहिए थे. पुलिस और प्रशासन की लापरवाही से यह हादसा हुआ है.– पी चिदंबरम
हादसे के लिए भारत तिब्बत सीमा पुलिस, बरेली यूनिट जिम्मेदार है. आईटीबीपी ने जिला प्रशासन से कोई समन्वय नहीं किया.–  यूपी सरकार

भर्ती अभियान के बारे में रेलवे को पहले से कोई सूचना नहीं दी गई. सूचना होती तो रेलवे विशेष इंतजाम कर सकता था.
– रेल मंत्रालय

सोचती हूं दोष उन युवाओं का ही था शायद जिन्होंने अपनी आंखों में एक अदद नौकरी का ख्वाब बुना. जो ख्वाब जिसने जिंदगी ही छीन ली. ऐसा हादसा पहली बार नहीं हुआ है. जाहिर है आखिरी बार भी नहीं. हम अपनी गलतियों से कभी सबक नहीं लेते. हादसों को बहुत जल्दी भूल जाते हैं. 

….ओह मानव कौल का इलहाम तो छूट ही गया, जिसे देखने के लिए मैं जा रही थी. सॉरी मानव, आपके इलहाम पर अव्यवस्था का यह नाटक भारी पड़ा इस बार.


 

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