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Archive for the ‘meri fitrat’ Category

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नब्ज कुछ देर से थमी सी है...

इन दिनों आसपास ढेर सारे ख्याल घूमते रहते हैं. अजीबो-गरीब से. यूं कुछ न कुछ ख्याल तो हमेशा ही साथ होते हैं लेकिन इन दिनों इन ख्यालों में अजब सी होड़ मची हुई है. सब एक-दूसरे से टकराते हैं. लड़ते हैं, भिड़ते हैं. मेरे कब्जे में कोई नहीं. मैं बस दर्शक हूं. देख रही हूं. देखती हूं कौन करीब आता है, कितने करीब आता है. कितनी देर टिकता है. कितना और कैसा असर छोड़ जाता है. 


एक ख्याल जो ज्यादातर सारे ख्यालों को पीछे छोड़ देता है, वो है मृत्यु का ख्याल.  न..न..इसे लेकर नकरात्मक सोचने की जरूरत नहीं. बेहद रूमानी सा ख्याल है यह. कई बार अपने सपने में अपने ही शरीर को सफेद फूलों से सजा रही होती हूं. कई बार जल्दी-जल्दी काम समेट रही होती हूं कि मृत्यु से पहले कुछ छूट न जाए. मेरे जाने के बाद कहीं किसी को कोई परेशानी न हो. एक बार एक कहानी भी लिखी थी इस खामख्याली पर. 


बहुत पहले प्रियंवद की एक कहानी पढ़ते हुए मृत्यु की रूमानियत से सामना हुआ था. शांत, स्थिर, मोहक, आकर्षित करती हुई मृत्यु. उसके आसपास कोई शोर नहीं. कोई हलचल नहीं. सफेद फूलों की तरह बेहद लुभावनी. 


मृत्यु का ख्याल दो ही स्थितियों में आसपास होता है. एक….अरे वही, जिंदगी का रोना-धोना. जिंदगी से थककर, हारकर, पस्त होकर. ये काफी उबाऊ है. इसमें कहीं कोई रूमानियत नहीं. लेकिन जो दूसरी स्थिति है, वो कमाल है…जिंदगी से प्यार होने की स्थिति. कुछ ऐसा पा लेने की चरम सीमा, जिसका होना सिर्फ ख्वाब ही रहा हो अब तक. सुख की अंतिम स्थिति. जब बेसाख्ता मुंह से निकले कि काश इन पलों में दम ही निकल जाए…


दु:ख तो कभी इतना बड़ा नहीं हुआ कि मृत्यु का ख्याल करीब फटके. क्योंकि  जिसने मरीना के जीवन को छूकर देखा हो वो खुद को आसानी से दुखी तो नहीं कह सकता. 

सुख, वो न जाने किस गांव रहता है…कभी-कभी उस गांव के आसपास से गुजरी हूं शायद, लेकिन रास्ता भटक गई हूं अक्सर. ढूंढती हूं. रुक जाती हूं. फिर चल पड़ती हूं. पीछे पलट-पलट कर देखती हूं. असमंजस में हूं कि आखिर ये मृत्यु का ख्याल क्यों आसपास मंडराता है? क्यों दूसरे ख्यालों से होड़ में जीत जाता है. क्यों मुझे लुभाता है. कई बार दिल चाहता है हाथ बढ़ाकर छू लूं इस ख्याल को. गुनगुनाती हूं… दफ्न कर दो मुझे कि सांस मिले, नब्ज कुछ देर से थमी सी है…कहीं से बांसुरी की आवाज आ रही है शायद…देखूं तो कहां से…

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>एक रोज

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एक रोज
मैं पढ़ रही होऊंगी
कोई कविता
ठीक उसी वक्त
कहीं से कोई शब्द
शायद कविता से लेकर उधार
मेरे जूड़े में सजा दोगे तुम.
एक रोज
मैं लिख रही होऊंगी डायरी
तभी पीले पड़ चुके डायरी के पुराने पन्नों में

मेरा मन बांधकर
उड़ा ले जाओगे
दूर गगन की छांव में.
एक रोज
जब कोई आंसू आंखों में आकार
ले रहा होगा ठीक उसी वक्त
अपने स्पर्श की छुअन से
उसे मोती बना दोगे तुम.
एक रोज
पगडंडियों पर चलते हुए
जब लड़खड़ायेंगे कदम
तो सिर्फ अपनी मुस्कुराहट से
थाम लोगे तुम.
एक रोज
संगीत की मंद लहरियों को
बीच में बाधित कर
तुम बना लोगे रास्ता
मुझ तक आने का.
एक रोज
जब मैं बंद कर रही होऊंगी पलकें
हमेशा के लिए
तब न जाने कैसे
खोल दोगे जिंदगी के सारे रास्ते
हम समझ नहीं पायेंगे फिर भी
दुनिया शायद इसे
प्यार का नाम देगी एक रोज….

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दुख जब पसारे बांहें
तो घबराना नहीं,
मुस्कुराना
सोचना कि जीवन ने
बिसारा नहीं तुम्हें,
अपनाया है.
दुख का होना
है जीवन का होना
हमेशा कहता है दुख
कि लड़ो मुझसे,
जीतो मुझे.
वो जगाता है हमारे भीतर
विद्रोह का भाव
सजाता है ढेरों उम्मीदें
कि जब हरा लेंगे दुख को
तो बैठेंगे सुख की छांव तले
दुख हमारे भीतर
हमें टटोलता है
खंगालता है हमारा
समूचा व्यक्तित्व
ढूंढता है हमारे भीतर की
संभावनाएं
दुख कभी नहीं आता
खाली हाथ.
हमेशा लेकर आता है
ढेर सारी उम्मीदों की सौगात
लडऩे का, जूझने का माद्दा
अग्रसर करता है हमें
जीवन की ओर
लगातार हमारे भीतर
भरता है आन्दोलन
दुख कभी खाली हाथ नहीं जाता
हमेशा देकर जाता है
जीत का अहसास
खुशी कि हमने परास्त किया उसे
कि जाना अपने भीतर की
ऊर्जा को
कि हम भी पार कर सकते हैं
अवसाद की गहरी वैतरणी
और गहन काली रात के आकाश पर
उगा सकते हैं
उम्मीद का चांद
दुख का होना
दुखद नहीं है.
सचमुच!
(रिल्के के कथन से प्रभावित. रिल्के कहते हैं कि अवसाद का हमारे जीवन में होना हमारा जीवन में होना है.)

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तुम्हें कौन सा मौसम पसंद है. लड़के ने पूछा? लड़की मुस्कुराई.
शरद. उसने कहा.
तुम्हें कौन सा फूल पसंद है?
गुलाब. लड़की ने कहा.
तुम्हें चिडिय़ा कौन सी पसंद है?
गौरेया.
प्रकृति में सबसे सुंदर तुम्हें क्या लगता है?
सूरज. लड़की ने मुस्कुरा कर कहा.
लड़की की आंखों में चमत्कार गई थी. उसकी आंखों में सूरज उग आया. उसने
अपनी हथेलियों को कटोरी की तरह बना लिया. उस कटोरी में उसने धूप भरने की कोशिश की. एक अंजुरी धूप, जिसमें वह नहा लेना चाहती थी. उसने अपने हथेलियों में भरी धूप को अपने सर पर उड़ेल लिया. लड़की ने शरारत से
पलकें झपकायीं तो लड़का हंस दिया.
उसे लड़की का यह रूप बहुत पसंद है. ऐसे समय में लड़की अपने भीतर होती है.
उसका संपूर्ण सौंदर्य छलक रहा होता है. भीतर का सौंदर्य बाहर के सौंदर्य से
होड़ लेता है. और दोनों मिलकर सारे जहां की खूबसूरती पर भारी पड़ते हैं.
लड़के के पास हमेशा सवालों का पूरा बीहड़ होता है. हमेशा. लड़की को उस बीहड़ से गुजरना कभी बुरा नहीं लगता. लड़का जवाबों से ज्यादा तल्लीन अपने सवालों में था. वो लड़की के बारे में सब कुछ जान लेना चाहता था. उसे पता था कि किसी को चाहने के लिए उसके बारे में सब कुछ जान लेना अच्छा उपाय है. यह जानना किस तरह का हो यह उसे पता नहीं था. यूं उसे लड़की से बात करना ही
बहुत पसंद था. सो उनकी मुलाकातों में अक्सर सवालों के ऐसे ही गुच्छे उगते थे.
जवाबों के भी. लड़की को लगता कि कोई अंताक्षरी चल रही है. अगर लड़का कभी सवाल न पूछे तो लड़की उदास हो जाती थी. उसे लड़के के सवालों में आनन्द आता था. इसी बहाने वो खुद को भी जान पाती थी. कई सवालों का जवाब देते हुए उसे पहली बार अपने ही बारे में पता चला. जैसे उसके जीवन की सबसे बड़ी ख्वाहिश क्या है? जिस रोज लड़के ने पूछा था यह सवाल लड़की उलझ सी गई थी. लड़का इस उम्मीद से था कि वो उसका नाम लेगी. लेकिन लड़की चुप रही. उसने इस बारे में कभी सोचा ही नहीं. उसकी ख्वाहिशें छोटी-छोटी होती थीं. तितली पकडऩा, फूलों से बातें करना, मां के गले से लिपट जाना, पापा की पसंद का खाना बनाना. जीवन की ख़्वाहिश? ऐसा तो कभी सोचा ही नहीं था उसने. कितने दिनों तक वो इस सवाल में उलझी रही थी.
ऐसे ही सवालों का चक्रव्यूह रचते हुए एक बार लड़के ने पूछा रंग कौन सा पसंद है तुम्हें?
लड़की खामोश रही.
लड़के ने फिर पूछा. तुमने बताया नहीं. तुम्हें कौन सा रंग पसंद है.
लड़की का चेहरा लाल हो उठा. सुर्ख गुलाब की तरह. उसकी आंखों के आगे न जाने कितने गुलाब खिल उठे, न जाने कितने गुलमोहर, न जाने कितने पलाश. लड़की का चेहरे पर ढेर सारे रंग आये-गये. लेकिन लाल रंग स्थायी रूप से टिक गया.
लड़की ने शरमाते हुए कहा धीरे से कहा- लाल.
अचानक लड़की घबरा उठी, नहीं-नहीं लाल नहीं.
नहीं…नहीं लाल तो बिल्कुल नहीं.
सूरज भी नहीं. शरद भी नहीं, लाल गुलाब भी नहीं. कुछ भी नहीं. लाल नहीं. नहीं,
नहीं, नहीं…
लड़की के चेहरे पर अचानक घबराहट तारी हो गई थी. उसकी आवाज कांपने लगी. उसे न$जर आने लगीं लाल खून में सनी लाशें, बिलखते बच्चे. लाल जोड़े में सजी दु:खी, आंसू बहाती औरतें, जिन्हें अर्थी में ही उस घर से निकलने की ताकीदें मिल रही थीं. उसे ध्यान आया
कि राजा ने लाल रंग के खिलाफ तो फरमान जारी किया है. जिसे पसंद होगा लाल रंग वो राजा का दुश्मन होगा. लड़की फरमान से डर गयी थी. उसने घबराते हुए कहा, लाल रंग नहीं. लाल ओढऩी भी नहीं, लाल सिंदूर भी नहीं, लाल बिंदी भी नहीं.
लड़का समझ नहीं पा रहा था कि लड़की को क्या हुआ अचानक. अच्छी खासी तो खिलखिला रही थी. अब इस कदर परेशान हो रही है. आखिर लाल रंग पसंद करने में बुराई क्या है. इतना डरने की क्या बात है. लड़के ने उसे बहुत संभालना चाहा लेकिन वह बहुत घबराई हुई थी. लाल नहीं…लाल नहीं…कहते हुए वह भाग गई
वहां से.
लड़का समझ गया. उदास हो गया. उसके बस में भी तो नहीं था, लड़की के मन से डर को निकाल फेंकना. वह लौट गया अपने घर. उसकी कोरें गीली हो उठीं. उसने गलत सवाल किया ही क्यों? उसे अपने ऊपर गुस्सा आ रहा था.
अगले दिन लड़के की आंख खुली तो उसके घर के सामने लगा गुलमोहर लाल फूलों से लदा हुआ था. जमीन पर भी इतने फूल गिरे थे कि धरती पूरी लाल हो गयी थी. उगते हुए सूरज का रंग भी लाल ही था. लड़का हैरान था. आखिर माजरा क्या है, वो समझ नहीं पा रहा था. वो घर से बाहर निकला तो उसे महसूस हुआ कि सारा शहर लाल रंग के फूलों से पट गया है. उसे एक कोने से ढेर सारी दुल्हनों का झुंड आता दिखा. उनकी आंखों में संकोच के लाल रंग की जगह आत्मविश्वास के
तेज की लाली थी. उसे लगा कुदरत ने किसी जंग का ऐलान कर दिया है. लड़का मुस्कुरा उठा. तभी उसने देखा सामने से लड़की मुस्कुराती हुई तेज कदमों से चलते हुए आ रही है उसके पास. उसने लाल रंग की ओढऩी पहनी हुई थी. लाल बिंदिया भी थी उसके माथे पर. मानो उसने पूरा सूरज उगा लिया हो. लड़का उसे खुश देखकर बहुत खुश हुआ. लड़की ने उसके करीब आकर कहा, मुझे पसंद है रंग लाल. सुना तुमने लाल. यह कहने में अब मुझे किसी का डर नहीं.
अगले दिन अखबारों में खबर थी कि जाने कौन सा हुआ चमत्कार बीती रात कि गल गई जेलों की सलाखें सारी. राजा का फरमान कहीं कोने में दुबका पड़ा था.
सपना ही सही लेकिन आंख खुलने पर लड़की अपने इस सपने को लेकर बड़ी खुश थी.

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