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कोई शब्द नहीं उगे धरती पर,
किसी भी भाषा में नहीं,
जिनके कंधों पर सौंप पाती
संप्रेषण का भार
कि पहुंचा दो
सब कुछ वैसा का वैसा
जैसा घट रहा है मेरे भीतर,
कोई भी जरिया नहीं 
जिससे पहुंचा सकूं 
अपना मन पूरा का पूरा.
उदास हूँ
ये सोचकर कि
न जानते हुए भी
मेरे दिल का पूरा सच,
न जानते हुए भी कि 
सचमुच कितना प्यार है
इस दिल में
कितने खुश हो तुम
कितनी कम हैं तुम्हारी ख्वाहिशें
और कितना विशाल
मेरी चाहत का संसार…

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आपकी याद आती रही रात-भर
चाँदनी दिल दुखाती रही रात-भर

गाह जलती हुई, गाह बुझती हुई
शम-ए-ग़म झिलमिलाती रही रात-भर

कोई ख़ुशबू बदलती रही पैरहन
कोई तस्वीर गाती रही रात-भर

फिर सबा साय-ए-शाख़े-गुल के तले
कोई क़िस्सा सुनाती रही रात-भर

जो न आया उसे कोई ज़ंजीरे-दर
हर सदा पर बुलाती रही रात-भर

एक उमीद से दिल बहलता रहा
इक तमन्ना सताती रही रात-भर

– फैज़ अहमद फैज़ 

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पिछले दिनों सिद्धेश्वर  जी ने वेरा पाव्लोवा की कुछ कवितायेँ पढने को दीं. उन कविताओं में से ये एक अटक सी गयी है दिमाग में. तो इसे यहाँ अपने ब्लॉग पर निकालकर रखे दे रही हूँ  (सिद्धेश्वर जी की अनुमति से) ताकि इसे सहेज भी लूं और शेयर भी कर लूं…


आईने के सामने

मैं सीख रही हूँ ‘नहीं’ कहना :
ना – ना – ना।  
प्रतिबिम्ब  दोहराता है :

हाँ -हाँ – हाँ। 
(अनुवाद-सिद्धेश्वर सिंह)

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जब देखती हूँ तुम्हारी ओर 
तब दरअसल 
मैं देख रही होती हूँ अपने उस दुःख की ओर 
जो तुममें कहीं पनाह पाना चाहता है.
जब बढाती हूँ तुम्हारी ओर अपना हाथ
तब थाम लेना चाहती हूँ
जीवन की उस  आखिरी उम्मीद को 
जो तुममे से होकर आती है .
जब टिकाती हूँ अपना सर 
तुम्हारे कन्धों पर 
तब असल में पाती हूँ निजात 
सदियों की थकन से 
तुम्हें प्यार करना असल में 
ढूंढना है खुद को इस स्रष्टि में..
बोना है धरती पर प्रेम के बीज 
और साधना है प्रेम का राग…

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ऑफिस पहुंचने पर हमें एक मशीन पर अपनी उंगली रखनी होती है. किर्रर्रर्र सी आवाज आती है और उंगली रखने वाले का नाम मशीन पर उभरता है. समय भी. इस तरह हम अखबार के कारखाने में अपनी आमद दर्ज करते हैं. कभी-कभी मशीन उंगली को पहचानने से इनकार कर देती है. लिखकर आता है इनवैलेड फिंगर. जब भी ऐसा होता है, अनायास मेरे चेहरे पर मुस्कान बिखर जाती है. अब मैं दूसरी उंगली कहां से लाऊं…मेरे पास तो यही है. अपनी ही उंगली को देखती हूं कहीं किसी से बदल तो नहीं गई. चेहरा टटोलती हूं, अपना नाम पुकारती हूं. सब कुछ तो है ठिकाने पर. फिर मशीन से मनुहार करती हूं, मान लो ना प्लीज. ये मेरी ही उंगली है. रोज वाली. सच्ची. मशीन मुस्कुराती है. नहीं मानती. मैं फिर मनाती हूं. मानो किसी अदालत में जज को कनविंस कर रही होऊं कि जज साहब मैं ही हूं प्रतिभा…सौ फीसद. हालांकि मेरे अपने होने के सारे प्रमाणपत्र कहीं खो गये हैं. फिर भी हूं तो मैं ही ना? मशीन काफी ना-नुकुर के बाद रहम करते हुए, इतराते हुए ‘हां’ कह देती है और मेरा नाम कारखाने के रजिस्टर में दर्ज हो जाता है…ये खेल मुझे बहुत पसंद है. 

सोचती हूं कभी यूं भी हो सकता है कि आइने के सामने खड़ी हूं और आईना पहचानने से इनकार कर दे. उसमें कोई अक्स ही न उभरे या ऐसा अक्स उभरे जिसे मैं जानती ही न होऊं. रास्तों के साथ तो ऐसा अक्सर ऐसा होता है. जिन रास्तों से रोज गुजरती हूं, किसी दिन वही रास्ते छिटककर मुझसे दूर हो जाते हैं . मैं उन्हें हैरत से, कभी हसरत से देखती हूं. इसी तरह कई बार ऑफिस के पीसी का पासवर्ड नखरे करता है. बार-बार मनुहार करवाता है और फिर एहसान जताते हुए धीरे से मान लेता है. 

अपना ही नंबर डायल करती हूं कभी तो आवाज आती है दिस नंबर डज नॉट एक्जिस्ट. या कई बार इंगेज की टोन मिलती है. कई बार ट्राई करने के बाद अचानक मिल जाता है. हालांकि इनवैलेड वाली ध्वनियां काफी जगह से मिलती रहती हैं. न जाने कितने लोग, कितने कामों को, कितनी बातों को, कितनी ख्वाहिशों को, अरमानों को इनवैलेड करार देते हैं. कोई किर्रर्रर्रर्र की आवाज भी नहीं आती. वे फिर बार-बार कोशिश करने से भी नहीं मानते. 

दिल के किसी कोने से आवाज आती है कि कभी यूं भी तो होगा कि सांसें इस देह की गली का रास्ता भूल जायेंगी या उसे पहचानने से इनकार कर देंगी. अचानक…एरर आ जायेगा और शरीर सांसों से कहेगा दिस इज एन इनवैलेड एरिया टू एक्सेस ब्रेथ…

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अपने हिस्से के सारे उदास दिन वो नदी में डालकर बुझा देती थी. सूरज सारा दिन उसके कलेजे में जलता रहा था. घड़ी की सुइयों में लड़के का चेहरा जो उग आया था. बार-बार वो घड़ी यूं देखती थी, मानो अभी घड़ी की सुइयों से निकलकर वो बाहर आ खड़ा होगा. न जाने कितनी सदियों से ये सिलसिला जारी था. इसी इंतजार में न जाने कितने सूरज इसी नदी में डूबकर मर गये. न जाने कितनी चांद रातों ने उसके सर पर हाथ फिराया.

ऐसी ही एक रात में जब वो नदी में अपना एक उदास दिन बुझा रही थी, दो हथेलियों ने उसकी आंखों को ढंक दिया था. उसकी खुशबू से उसे पहचानना कोई मुश्किल काम नहीं था. फिर भी वो उसके सिवा सारे नाम बूझती रही. लड़का नाराज हो गया. लड़की मुस्कुरा दी. उसका यूं नाराज होना उसे बहुत अच्छा लगता था. वो उसकी सारी नाराजगी को अपने आंचल में बांध लेती थी. 

लड़का फिर बड़ी मुश्किल से मानता था. ज्यादातर तब, जब लड़की रोने को हो आती थी. वो कहती, तुम इतना भी नहीं समझते कि मैं तुम्हें चिढ़ा रही थी.

मैं कोई बच्चा हूं, जो मुझे चिढ़ा रही थी? वो गुस्से में भरकर कहता. 

लड़की सूखी सी हंसी हंस देती. 
उसकी दादी कहती थी कि ‘बिटियन का हंसी तब जादा आवत है जब वे रोओ चहती हैं…’ दादी की बात तो खैर दादी के साथ गई लेकिन लड़की की हंसी उसके साथ रह गई. उसकी उस हंसी के कारण लड़का कभी खोज नहीं पाया. वो उस हंसी में उलझ जाता था. लड़की को अक्सर लगता था कि लड़का उसके पास होकर भी उसके पास नहीं होता है. अक्सर वो कहीं और खोया रहता था. लड़की की उंगलियों से अपनी उंगलियों को उलझाते हुए वो अपना मन न जाने कहां उलझाये रहता था. नदी के किनारों पर उनके प्रेम के वो लम्हे अक्सर टूटते और बिखरते रहते थे. लड़की टूटे हुए लम्हों को भी चुन लेती थी.


लड़के की बातों में लड़की की बातें नहीं होती थीं. लड़का अपनी आंखों को कभी सितारों में उलझा लेता था, कभी दरख्तों में. वो लड़की की आंखों में आंखें डालने से अक्सर बचता था. लड़की कभी कारण नहीं पूछती थी. बस उसे देखती रहती थी. वो भी ऐसी ही एक पाकीजा सी रात थी. लड़की के आंचल में उस रोज ढेर सारी उदासी बंधी थी. उस रोज भी वो हमेशा की तरह देर से आया था. रात लगभग बीत चुकी थी. उबासियां लेता चांद जाने की तैयारी में था.


आते ही लड़के ने अपनी उलझनों का टोकरा लड़की को टिकाया. उसने लड़की की आंखों की ओर फिर से नहीं देखा. लड़के के साथ उसकी जिंदगी की न जाने कितनी छायाएं भी चली आती थीं. उसे पता ही नहीं था कि उस रोज लड़की ने अपनी मां को खोया था. वो अपनी मां की स्मृतियों में गले तक डूबी थी. उनके जाने के गम को जज्ब कर रही थी. उदासी के कुहासे वाली उस रात में भी लड़का उसे अपनी कोई कहानी सुना रहा था. जिसे लड़की सुन नहीं रही थी, सह रही थी. लड़की बता ही नहीं पाई कि वो अपनी मां की स्मृतियों को उससे बांटना चाहती थी. उसकी हथेलियों में अपना दर्द छुपा देना चाहती थी. उसके कंधों पर अपनी उदासी को कुछ पलों के लिए टिकाकर मुक्त होना चाहती थी. लेकिन लड़का वहां होकर भी वहां था ही नहीं.

 
उसी रोज लड़की ने अपने कंधे चौड़े किये थे. उसी रोज उसने अपने आंसुओं को परास्त किया था. उसी रोज वो सबसे जोर से खिलखिलाई थी. इतनी तेज हंसी थी वो कि चुपचाप एक गति से बहती जा रही नदी अचानक रुककर उसे देखने लगी थी. लड़की ने लड़के का हाथ धीरे से छोड़ दिया था. नदी के किनारे पर छप्पाक से एक आवाज आई थी. वो लड़की की आंख का आखिरी आंसू था.

लड़का अब भी अनजान है कि उस रात उसने क्या खो दिया. लड़की अब भी उससे मिलती है. नदी के किनारे अब भी  महकते हैं. लड़का समझता है कि लड़की उसके पास है लेकिन लड़की तो दूर कहीं चांद के देश में चली गयी है. यहां तो बस उसका जिस्म है जो अपने हिस्से के उदास दिनों को नदी में बुझाने के लिए रह गया है.


लड़की की मुस्कुराहटें चांद की कोरों को भिगो देती हैं. नीली नदी के किनारे भीगी पलकों वाले चांद को अब भी देखा जा सकता है…

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पिछले बरस मेरे हाथों एक किताब की नींव पड़ी थी. किताब का नाम था ‘चर्चा हमारा.’ स्त्री विमर्श की इस किताब में मेरी भूमिका को पढ़कर आज एक दोस्त का भावुक सा फोन आया. उसी के आग्रह पर यह भूमिका आज ब्लॉग पर दे रही हूं.- प्रतिभा
वो खुरदुरा था, बेडौल था. किसी भद्र जगह पर, भद्रजनों के बीच रखने के लायक नहीं था. उसे देखते ही लोग मुंह बिदकाते और न$जर फेर लेते. वो विचार था. स्त्री के मन में उपजा विचार. स्त्री और विचार पहले तो यही बात गले में अटकती है. इतनी सुंदर, नाजुक, ममतामयी, समर्पण और त्याग की देवी स्त्री का विचार जैसी चीजों से क्या लेना-देना. उसकी दुनिया तो चांद की रूमानियत, फूलों की सरगोशियों और ब्यूटी पार्लरों के दारीचों में सिमटी अच्छी लगती है. मर्दों ने समझाया तुम नाहक हलकान हुई जाती हो प्रिये, आराम करो. थक गई होगी. देखो तो आज गार्डन में कितना सुंदर फूल खिला है और हां कल बिट्टू का टेस्ट है. देखना तैयारी अधूरी न रह जाये. उसके अव्वल आने पर तुम्हारे चेहरे का जो संतोष होता है ना, वही मेरी जागीर है. स्त्री बहक गई. चली गई घर के दारीचों में खुशी-खुशी. फुलकों के फूलने का सुख उसे पुकारने लगा. लेकिन फुलके फुलाते, फूलों और बच्चों की परवरिश करते-करते, पतियों के लिए सजते-संवरते, जाने कब और कैसे उसकी निगाहें आसमान की ओर उठने लगीं. उसे माथे पर बिंदी नहीं, सूरज उगाने का जी चाहा. सूरज की आग को पकडऩे का मन हुआ. तारे गिनने का नहीं, चांद ताकने का नहीं, चांद तक पहुंचने का ख्याल आया. तब उसे अहसास हुआ कि जब-जब वह आसमान देखना चाहती है, दरवाजे बंद कर दिये जाते हैं. उसके परमेश्वर रूपी पति खुद आसमान बनकर छा जाते हैं उसके ऊपर. वह फिर बहक जाती है.
कोई हवा को झोंका बाहर से आकर उसे सहलाता है तो उसके भीतर न जाने क्या-क्या उगने लगता है. अखबार पर न$जर जाती है तो उसे अंदर कुछ मजबूत होता लगता है. उसे महसूस होता है कि बैठक में पुरुष जिन विषयों पर बात कर रहे हैं, वहां उसकी भूमिका सिर्फ चाय पहुंचाने भर की क्यों है? वह भी वहां होना चाहती है, बात करना चाहती है. तुम अंदर चलो ये सब औरतों की बातें नहीं कहकर उसे फिर से चूल्हे, पार्लर और सीरियल्स की दुनिया में धकेल दिया जाता.
लेकिन जो उसके भीतर है वो उसे जीने नहीं देता बेचैन किये रहता है. उसके अंदर का विचार, उसकी समझ, उसका दिमाग. उसे ऊब होने लगी है लिपिस्टिक, बिंदी, चूड़ी, साड़ी से. सास-बहू, ननद की कलह में सर खपाने से बेहतर मानती है वह पढऩा या फिर बच्चों को पढ़ाना. फिर भी वो अंदर डोलता, खुरदुरा, बेडौल बेढब सा विचार उसे बेचैन किये रहता है.
गलती से एक दिन स्त्री बाजार से साड़ी के पैसों से ‘चाक’ उठा लाई. पढऩा शुरू किया तो पढ़ती ही गई. हैरान, परेशान, उलझी हुई. उसकी आंखें फटी की फटी. उसके भीतर के चलते और सदियों से दबाये जाते सवाल यहां निर्विघ्न घूम रहे थे. कितनी बेखौफ थी सारंग. और मैत्रेयी…बाप रे!
ऐसा कोई लिख सकता है क्या? वह भी एक औरत करवे की लौ में प्रेमी का अक्स…धर्म न भ्रष्ट हो गया सारंग का…मैत्रेयी का…ये औरत क्या सचमुच औरत है वो भी इसी दुनिया की…ऐसा नहीं हो सकता है. वह किताब को छुपा देती है. लेकिन दूसरी चाक का इंतजार करने लगती है. चाक, इदन्नमम, अल्मा कबूतरी, गुडिय़ा…एक के बाद एक स्त्री को किताबों के रूप में अपनी बेचैनी के साझीदार मिलने लगते हैं. मैत्रेयी जिनसे वह मिली नहीं, उसे सचमुच सहेली लगने लगती है. कितना सच्चा, साफ लिखती हैं आप?
डर नहीं लगता?
डर…हां, यहीं से शुरू होती है हमारी इस किताब की अवधारणा. डर लगता है हम स्त्रियों को. बहुत डर लगता है सिर्फ इतना कहने में कि हम जीना चाहती हैं. सिर्फ इतना कहने में कि एक टुकड़ा आसमान हमें भी दो ना.. जरा उड़कर देखें. डर लगता है कि कैसे कहें हम कि एक बार खुलकर जीने दो हमें, हटा लो बंदिशें…कि हम आजाद सांस का स्वाद ले सकें. जिसे सचमुच प्रेम करते हैं, उसे कम से कम जी भरकर याद तो कर सकें. डर तो बहुत लगता है हमें. कुछ भी सोचना वर्जित है. हम सेवा, समर्पण के लिए बने हैं. संस्कार, परंपरा रिवाज सब हमारे खिलाफ हैं. हम पुरुष की संपत्ति हैं, उसकी जागीर हैं. संपत्ति क्या खुद सोचती है कभी? हमारी इच्छा, अनिच्छा, हमारी सोच का कोई मतलब नहीं. चूड़ी, गहना, कपड़ा और बच गया तो सास-बहू का ड्रामा काफी है हमारी जिंदगी को पूरने के लिए. पर ये स्त्री तो डरती ही नहीं. आंखों में आंखें डालकर सवाल करती है, पूछती है अगर तुम देर रात तक घूमकर आ सकते हो तो मैं क्यों नहीं? वही काम जब तुम करते हो तो परंपरायें नहीं टूटतीं, हम करते हैं तो क्यों कोहराम मच जाता है? रिवाजों का बोझ हमारे ही सीने पर क्यों, थोड़ा सा तुम भी क्यों नहीं उठाते और हमारे $जरा से संास लेते ही परिवार भला क्यों टूटने लगते हैं? मैत्रेयी कहती हैं, टूट जाने दो ऐसे परिवार जिनकी नींव तुम्हारी घुटन पर रखी गई हो. बड़ी अहमक औरत है यह तो, इसके खिलाफ फतवा जारी नहीं हुआ अब तक मैत्रेयी पुष्पा पहली ऐसी लेखिका हैं, जो इतनी साफगोई से बात कहती हैं ऐसा मैं नहीं मानती क्योंकि इसके पहले भी, कृष्णा सोबती, इस्मत चुगताई, कुर्तुल ऐन हैदर का लेखन जेहन में है. यहां मैं भाषा की दीवारों को गिराकर सिर्फ भारतीय स्त्रियों की बात पर ही फोकस कर रही हूं.
अब यह मैत्रेयी जी का सोच-समझकर गढ़ा गया ढंग है या उनका स्वाभाविक तरीका कि उनके किरदार ऐसे लगते हैं जैसे पास में बैठकर बात कर रहे हों. उनकी रचनाओं में लेखकीय विद्वता, प्रवीणता या कुशलता, किस्सागोई कम हकीकत ज्यादा है. जैसे वो चाहती हों कि बहुत हुई चुतराई, कला कौशल, चलो अब सीधी बात करें. क्या झिझक है यह कहने में कि मुझ भूख लगी है…प्यास लगी है…कि मैं जीना चाहती हूं…खुले आकाश में उडऩा चाहती हूं.
मैत्रेयी की रचनाएं पुराने उपमानों, बिम्बों को तोड़ती हैं. कथा तत्व नये रूप में उभरते हैं. कहीं कोई सास किसी बहू का दमन नहीं कर रही है उनकी रचनाओं में. कहीं कोई औरत, किसी औरत की दुश्मन नहीं है. कहीं कोई औरत समाज का विनाश नहीं कर रही है. वह समाज को गढ़ रही है. स्कूल संस्था को बचाने के लिए अपनी देह की परवाह न करने वाली सारंग के रूप में उभर रही है. पति से बेवफाई नहीं करती लेकिन प्रेमी का सम्मान करना भी नहीं छोड़ती. वह जीती है पूरी ताकत से, जुल्म से थककर आंसू नहीं बहाती…जूझती है, सामना करती है. ऐसी स्त्री जब सामने आकर खड़ी हुई तो खलबली होना तो तय था. बवंडर, विशाल प्रलय, त्राहिमाम जैसी आवाजें उठीं लेकिन उन स्त्रियों के चेहरे की मुस्कुराहटों ने इस रचना प्रक्रिया को गले से लगा लिया जो अपने भीतर की कुलबुलाहटें पकड़ नहीं पा रही थीं.
कहानी, कविता, उपन्यास विधा कोई भी हो विचार उसका आधार होता है. लेखक का विचार उसकी विविध रचनाओं में, कैरेक्टर्स में डिजॉल्व होता रहता है. चूंकि मैत्रेयी का सारा लेखन शिल्प, बिम्ब, प्रतीक, उपमान आदि से परे है इसलिये उनके विचार कुछ ज्यादा मुखर होकर सामने आते हैं उन्हें पढ़ते हुए लगता है कि हां, यही तो हम कहना चाहते थे. ऐसा ही तो हम सोच रहे थे…तो उन सारे विचारों को एकत्र करना ही इस किताब का मकसद है. यानी कभी अल्मा, कभी सारंग कभी कलावती चाची, कभी श्रीधर की देह में भटकते विचारों को एक छत के नीचे सुरक्षित कर देना.
एक मकसद और है इस पुस्तक को लाने का कि वे सारे सवाल जो अकसर बड़े बेढब होते हैं और बहुत ही आक्रामक ढंग से पूछे या उठाये जाते हैं उनके जवाब तलाशना. मसलन, क्यों ये माना जाता है कि स्त्री की स्वतंत्रता ही उसकी स्वच्छंदता है? कितनी ही स्त्रियां स्वयं इस बात को माने बैठी हैं कि स्त्रियां ही स्त्रियों की दुश्मन होती हैं. वे इस बात की तह में जाना ही नहीं चाहतीं कि दरअसल, यह सारी व्यूह रचना पुरुषों ने इस चालाकी से की कि हमें एक-दूसरे के दुश्मन के रूप में आमने-सामने खड़ा कर दिया और खुद निकल गया चौसर खेलने या बाहर आनन्द करने. आप आपस में जूझते रहिये ताकि बाकी दुनिया में उनका वर्चस्व कायम रहे. 
कुछ लोग सवाल करते हैं कि स्त्री आजाद होकर अश्लीलता के घेरे में, बाजार के घेरे में फंस गई है. आखिर क्या फायदा हुआ ऐसी स्वतंत्रता का? स्वंत्रता और स्वछंदता का भेद हमें पता है मान्यवर इसमें हमें न उलझाइये…

महिलाओं के  मुद्दे सिर्फ मंच पर डिस्कस करने भर के या नारी विमर्श के झंडे के नीचे पलने भर के नहीं रह गये हैं. उन्हें अब हर घर में, हर स्त्री और पुरुष में भी पनपना होगा. स्त्रियों की चुनौतियां नये दौर में और बढ़ी हैं. नौकरी, घर, समाज सबको संभालते हुए वह टूटने की स्थिति में आ जाती है. पर हिम्मत नहीं हारती. इस किताब के $जरिये हम दो औरतें (मैं और मैत्रेयी) सिर्फ इतना कहना चाहती हैं कि हमको दुश्मन की निगाहों से देखना बंद कीजिये. आरोपों, प्रत्यारोपों और अपेक्षाओं की प्रत्यंचा उतार दीजिये. हम साथी हैं, मित्र हैं. तुम्हारी ताकत बनना चाहते है. तुम्हारे साथ चलना चाहते हैं, तुमसे अलग नहीं. समाज…परिवार …जोडऩा चाहते हैं..तोडऩा नहीं लेकिन अपने टूटने की कीमत पर अब और नहीं….
– प्रतिभा कटियार