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Archive for the ‘pratibha’ Category

>वैसे तो इन दिनों ऐसे लोग ही कम मिलते हैं जो यह पूछें की अच्छा कैसे लिखा जाए क्योंकि इन दिनों हर किसी को यही लगता है की वो सर्वश्रेष्ठ लिखता है। फ़िर भी कभी किसी चेहरे पर कप्पुस के सवाल नज़र आते हैं तो अच्छा लगता है। जब सवाल कप्पुस के से हों तो जवाब भी रिल्के का ही होना चहिये।
‘एक ही काम है जो तुम्हें करना चाहिए – अपने में लौट जाओ। उस केन्द्र को ढूंढो जो तुम्हें लिखने का आदेश देता है। जानने की कोशिश करो कि क्या इस बाध्यता ने तुम्हारे भीतर अपनी जड़ें फैला ली हैं ? अपने से पूछो कि यदि तुम्हें लिखने की मनाही हो जाए तो क्या तुम जीवित रहना चाहोगे ?…अपने को टटोलो…इस गंभीरतम ऊहापोह के अंत में साफ-सुथरी समर्थ ‘हाँ” सुनने को मिले, तभी तुम्हें अपने जीवन का निर्माण इस अनिवार्यता के मुताबिक करना चाहिए।’

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कमजोरियां

कमजोरियां
तुम्हारी कोई नहीं थीं
मेरी थी एक
मैं करता था प्यार…

सुख

सुबह खिड़की से बाहर का नजारा
फिर से मिली हुई
पुरानी किताब
उल्लसित चेहरे
बर्फ, मौसमों की आवाजाही
अखबार, कुत्ता,
डायलेक्टिक्स,
नहाना, तैरना, पुराना संगीत
आरामदेह जूते
जज्ब करना नया संगीत
लेखन, बागवानी मुसाफिरी
गाना मिलजुल कर रहना…

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तुम्हें भी याद नहीं, और मैं भी भूल गया
वो लम्हा कितना हसीं था, मगर फिजूल गया….

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>’कांटों से खींच के ये आंचल….तोड़ के बंधन बांधी पायल….कोई न रोको दिल की उड़ान को…दिल वो चला…. ये गाना मुझे कभी भी अच्छा नहीं लगा. बहुत से गाने अच्छे नहीं लगते हैं हमें, लेकिन यह गाना बहुत अच्छा होते हुए भी अच्छा नहीं लगा. कारण…शैलेंद्र जैसे गीतकार के लिखे गाने में मुझे बंधनों को तोड़कर पायल बांधने वाली बात $जरा कम जंचती है. पायल भी बंधन ही तो है. खैर, फिल्म ‘गाइड जिसका यह गाना है में पायल बंधन नहीं मुक्ति का मार्ग है, यह बात काफी बाद में समझ में आई और इसके बाद गाने से थोड़ा अपनापा हो ही गया. इतना तो तय है लेकिन कि यह गाना सौंदर्यबोध का गान नहीं मुक्ति का गान है. और यही इसका सौंदर्य है.पिछले दिनों इस मामले में मेरी राय जब गीता श्री के ब्लॉग पर उनकी राय से मिलती न$जर आई तो रुकना लाजिमी था. आज के दौर में सौंदर्यबोध, सौंदर्य प्रतीकों और सौंदर्य को रीडिफाइन करने का वक्त है. कब तक नायिकाओं को चूड़ी, बिंदी, झुमके, पायल जैसे सौंदर्य के उपमानों में उलझना पड़ेगा. आज के दौर में दिन-रात काम में उलझी स्त्रियां, दौड़ती-भागती स्त्रियां यह सुनने को बेकरार नहीं हैं कि आपकी साड़ी बहुत सुंदर है, आप बहुत खूबसूरत लग रही हैं. वे यह सब सुनकर ठिठक सकती हैं, मुस्कुरा सकती हैं कभी-कभी झल्ला भी सकती हैं लेकिन इससे उनके काम पर कोई असर नहीं पड़ता. अगर कोई उनसे यह कहता है कि आपका काम शानदार है तो उनके चेहरे पर गहरे संतोष की लकीर दिखती है. उनके काम को ताकत मिलती है. गीता श्री की चिंता एकदम जायज है कि जिस वक्त में लड़कियां जींस-टॉप पहनकर दौड़ती हुई स्पीड में काम कर रही हों ऐसे में चूड़ी की खनखनाहट और पायल की रुनझुन जैसे प्रतीक बेमानी ही लगते हैं. आसमान बड़ा हो रहा है. बंधन पिघल रहे हैं. अब तो ‘आती हुई लहरों पर जाती हुई लड़की… में सौंदर्य देखना होगा. उसका सौंदर्य उसके सपनों का है, उसकी ताकत उसकी महत्वकांक्षाओं की उड़ान है. गीता श्री का यह ब्लॉग कई मायनों में महत्वपूर्ण है. इसमें कॉन्ट्रीब्यूट करने वालों के पास भी नये जमाने की नई सोच है. अगर महिलाओं को, उनके काम को उनके भीतर के संसार को समझना हो, उनके अंदर की आग को जानना हो तो गीता के नुक्कड़ पर रुककर एक कप चाय पीना अच्छा अनुभव हो सकता है. तो आइये क्लिक करते हैं http://hamaranukkad.blogspot.com– प्रतिभा कटियार

आई नेक्स्ट के एडिट पेज पर प्रकाशित

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>काश !

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क्यों मुझे बुरी लगती हैं
बुरी लगने वाली बात्तें
क्यों मेरा दिल टूट जाता है
दूसरों पर जब आती हैं विपत्तियाँ
क्यों मुझे रोना आता है….
काश ! मैं काठ का होता
काश ! मैं होता धोबी का पाट
काश ! मैं कंकर, पत्थर, पहाड़ होता…
– डॉ बद्री नारायण

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लो देख लो ये वस्ल है, ये हिज्र है, ये इश्क
अब लौट चलें आओ बहुत काम पड़ा है….

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अपनी आंखों से कहो
की हट जायें मेरी आंखों के सामने से
यूँ ही सुबह से शाम तक
रत भर, आँख आँख फिरना
मुझे जरा नहीं suhaata
कह दो की हट जायें
वे मेरे सामने से,
वे इस कदर रौशन हैं
की मेरी आँखें चुन्धियाने लगती हैं
कह दो उनसे
वे इतना शोर न मचाया करें
क्योंकि उनकी पुरजोर आवाजों के बीच
मेरी बेचैन से जिंदगी में
खलल padata है।
कह दो की वे समन्दर बन
लहराया न करें, जहाँ-तहां
उसकी saree लहरें
मेरी पलकों को नम कर जाती हैं।
वे इतनी गहरी हैं
की दिल doobta hi jata है
नहीं-नहीं, कह दो उनसे की
वे इतनी खामोश न रहा करें
उनकी चुप्पी मुझे तरसती है,
बेपनाह उदासी दे जाती है।
कहो अपनी आंखों से
की जुबान बनें
udel den अपनी भाषा के
तमाम अर्थ
मेरी आंखों में।
मैं हलके से
अपनी पलकें झांप लूँगा
उन आँखों समेत
कह दो एक बार
मनुहार करके
की मेरी आंखों के सामने से न haten
क्योंकि ख्यालों में ही सही
मुझें उन आँखों से ही
दुनिया रौशन लगती है।
मेरी आंखों में
सपने जागते हैं कह दो उनसे
की वे डटी रहें, ta-उम्र
मेरी आंखों के सामने
ताकि उम्र भर जिया जा सके।

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